कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७३ / २०४ № 73 of 204 रचना ७३ / २०४
९ मार्च २०१५ 9 March 2015 ९ मार्च २०१५

ज़रा सा मुस्कुराइए zaraa saa muskuraaie ज़रा सा मुस्कुराइए

है

ज़िंदगी का फलसफ़ा, ज़रा सा मुस्कुराइये

बनेगा

दर्द भी दवा, ज़रा सा मुस्कुराइये

विगत

को क्यों गले लगा, बिसूरते हैं रात दिन

बिसार

के जो हो चुका, ज़रा सा मुस्कुराइये

कोई श्रम न दाम है, ये मुफ्त का इनाम है

जो

रहना चाहें चिर युवा, ज़रा सा मुस्कुराइये

भुलाके

रब की रहमतें, क्यों झेलते हैं ज़हमतें

रहम

की माँगकर दुआ, ज़रा सा मुस्कुराइये

हिलाएँगे

जो होंठ तो, खिलेगा चेहरा भोर सा

कटेगा

दिन हरा-भरा, ज़रा सा मुस्कुराइये

विकल्प

तो अनेक हैं, अगर खुशी अज़ीज़ हो

तो

मान लें मेरा कहा, ज़रा सा मुस्कुराइये

जो ज़िंदगी के शेष दिन, जिएँगे हँस के “कल्पना”

ये

करके खुद से वायदा, ज़रा सा मुस्कुराइये

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

hai

zindagee kaa phalasafaa, zaraa saa muskuraaiye

·

banegaa

dard bhee dawaa, zaraa saa muskuraaiye

·

wigat

ko kyon gale lagaa, bisoorate hain raat din

·

bisaar

ke jo ho chukaa, zaraa saa muskuraaiye

·

n

koee shram n daam hai, ye mupht kaa inaam hai

·

jo

rahanaa chaahen chir yuwaa, zaraa saa muskuraaiye

·

bhulaake

rab kee rahamaten, kyon jhelate hain zahamaten

·

raham

kee maangakar duaa, zaraa saa muskuraaiye

·

hilaaenge

jo honth to, khilegaa cheharaa bhor saa

·

kategaa

din haraa-bharaa, zaraa saa muskuraaiye

·

wikalp

to anek hain, agar khushee azeez ho

·

to

maan len meraa kahaa, zaraa saa muskuraaiye

·

jo zindagee ke shesh din, jienge hans ke “kalpanaa”

·

ye

karake khud se waayadaa, zaraa saa muskuraaiye

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

है

ज़िंदगी का फलसफ़ा, ज़रा सा मुस्कुराइये

बनेगा

दर्द भी दवा, ज़रा सा मुस्कुराइये

विगत

को क्यों गले लगा, बिसूरते हैं रात दिन

बिसार

के जो हो चुका, ज़रा सा मुस्कुराइये

कोई श्रम न दाम है, ये मुफ्त का इनाम है

जो

रहना चाहें चिर युवा, ज़रा सा मुस्कुराइये

भुलाके

रब की रहमतें, क्यों झेलते हैं ज़हमतें

रहम

की माँगकर दुआ, ज़रा सा मुस्कुराइये

हिलाएँगे

जो होंठ तो, खिलेगा चेहरा भोर सा

कटेगा

दिन हरा-भरा, ज़रा सा मुस्कुराइये

विकल्प

तो अनेक हैं, अगर खुशी अज़ीज़ हो

तो

मान लें मेरा कहा, ज़रा सा मुस्कुराइये

जो ज़िंदगी के शेष दिन, जिएँगे हँस के “कल्पना”

ये

करके खुद से वायदा, ज़रा सा मुस्कुराइये

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗