कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७ / २०४ № 7 of 204 रचना ७ / २०४
१३ जुलाई २०१३ 13 July 2013 १३ जुलाई २०१३

गगन में छाए हैं बादल gagan men chaae hain baadal गगन में छाए हैं बादल

गगन में छाए हैं बादल,

निकल के देखते हैं।

उड़ी सुगंध फिज़ाओं में चल के देखते हैं।

सुदूर गोद में वादी की,

गुल परी उतरी

प्रियम! हो साथ तुम्हारा,

तो चल के देखते हैं।

उतर के आई है आँगन, बरात बूँदों की

बुला रहा है लड़कपन,

मचल के देखते हैं।

अगन ये प्यार की कैसी,

कोई बताए ज़रा

मिला है क्या, जो पतंगे यूँ जल के देखते हैं।

नज़र में जिन को बसाया था मानकर अपना

फरेबी आज वे नज़रें,

बदल के देखते हैं।

चले तो आए हैं, महफिल में शायरों की सखी

अभी कुछ और करिश्में,

ग़ज़ल के देखते हैं।

विगत को भूल ही जाएँ,

तो ‘कल्पना’ अच्छा

सुखी वही जो सहारे,

नवल के देखते हैं।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

gagan men chaae hain baadal,

nikal ke dekhate hain

·

udee sugandh phizaaon men chal ke dekhate hain

·

sudoor god men waadee kee,

gul paree utaree

·

priyam! ho saath tumhaaraa,

to chal ke dekhate hain

·

utar ke aaee hai aangan, baraat boondon kee

·

bulaa rahaa hai ladakapan,

machal ke dekhate hain

·

agan ye pyaar kee kaisee,

koee bataae zaraa

·

milaa hai kyaa, jo patange yoon jal ke dekhate hain

·

nazar men jin ko basaayaa thaa maanakar apanaa

·

pharebee aaj we nazaren,

badal ke dekhate hain

·

chale to aae hain, mahaphil men shaayaron kee sakhee

·

abhee kuch aur karishmen,

gazal ke dekhate hain

·

wigat ko bhool hee jaaen,

to ‘kalpanaa’ achchaa

·

sukhee wahee jo sahaare,

nawal ke dekhate hain

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

गगन में छाए हैं बादल,

निकल के देखते हैं।

उड़ी सुगंध फिज़ाओं में चल के देखते हैं।

सुदूर गोद में वादी की,

गुल परी उतरी

प्रियम! हो साथ तुम्हारा,

तो चल के देखते हैं।

उतर के आई है आँगन, बरात बूँदों की

बुला रहा है लड़कपन,

मचल के देखते हैं।

अगन ये प्यार की कैसी,

कोई बताए ज़रा

मिला है क्या, जो पतंगे यूँ जल के देखते हैं।

नज़र में जिन को बसाया था मानकर अपना

फरेबी आज वे नज़रें,

बदल के देखते हैं।

चले तो आए हैं, महफिल में शायरों की सखी

अभी कुछ और करिश्में,

ग़ज़ल के देखते हैं।

विगत को भूल ही जाएँ,

तो ‘कल्पना’ अच्छा

सुखी वही जो सहारे,

नवल के देखते हैं।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗