कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६ / २०४ № 6 of 204 रचना ६ / २०४
९ जुलाई २०१३ 9 July 2013 ९ जुलाई २०१३

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते//गज़ल// wishv men aakaa hamaare yash kamaanaa chaahate//gazal// विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते//गज़ल//

वे सुना है चाँद पर बस्ती बसाना चाहते।

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते।

लात सीनों पर जनों के, रख चढ़े थे सीढ़ियाँ,

शीश पर अब पाँव रख, आकाश पाना चाहते।

भर लिए गोदाम लेकिन, पेट भरता ही नहीं,

दीन-दुखियों को निवाला, अब बनाना चाहते।

बाँटते वैसाखियाँ, जन-जन को पहले कर अपंग,

दर्द देकर बेरहम, मरहम लगाना चाहते।

खूब दोहन कर निचोड़ा, उर्वरा भू को प्रथम,

अब जनों के कंठ ही, शायद सुखाना चाहते।

शहरियत से बाँधकर, बँधुआ किये ग्रामीण जन,

निर्दयी, गाँवों की अब, जड़ ही मिटाना चाहते।

सिर चढ़ी अंग्रेज़ियत, देशी दफन कर बोलियाँ,

बदनियत फिर से, गुलामी को बुलाना चाहते।

देश जाए या रसातल, या हो दुश्मन के अधीन,

दे हवा आतंक को, कुर्सी बचाना चाहते।

कोशिशें नापाक उनकी, खाक कर दें "कल्पना",

खाक में जो स्वत्व जन-जन का मिलाना चाहते।

-----कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

we sunaa hai chaand par bastee basaanaa chaahate

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wishv men aakaa hamaare yash kamaanaa chaahate

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laat seenon par janon ke, rakh chढ़e the seeढ़iyaan,

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sheesh par ab paanv rakh, aakaash paanaa chaahate

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bhar lie godaam lekin, pet bharataa hee naheen,

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deen-dukhiyon ko niwaalaa, ab banaanaa chaahate

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baantate waisaakhiyaan, jan-jan ko pahale kar apang,

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dard dekar beraham, maraham lagaanaa chaahate

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khoob dohan kar nichodaa, urvaraa bhoo ko pratham,

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ab janon ke kanth hee, shaayad sukhaanaa chaahate

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shahariyat se baandhakar, bandhuaa kiye graameen jan,

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nirdayee, gaanvon kee ab, jad hee mitaanaa chaahate

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sir chढ़ee angreziyat, deshee daphan kar boliyaan,

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badaniyat phir se, gulaamee ko bulaanaa chaahate

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desh jaae yaa rasaatal, yaa ho dushman ke adheen,

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de hawaa aatank ko, kursee bachaanaa chaahate

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koshishen naapaak unakee, khaak kar den "kalpanaa",

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khaak men jo svatv jan-jan kaa milaanaa chaahate

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-----kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

वे सुना है चाँद पर बस्ती बसाना चाहते।

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते।

लात सीनों पर जनों के, रख चढ़े थे सीढ़ियाँ,

शीश पर अब पाँव रख, आकाश पाना चाहते।

भर लिए गोदाम लेकिन, पेट भरता ही नहीं,

दीन-दुखियों को निवाला, अब बनाना चाहते।

बाँटते वैसाखियाँ, जन-जन को पहले कर अपंग,

दर्द देकर बेरहम, मरहम लगाना चाहते।

खूब दोहन कर निचोड़ा, उर्वरा भू को प्रथम,

अब जनों के कंठ ही, शायद सुखाना चाहते।

शहरियत से बाँधकर, बँधुआ किये ग्रामीण जन,

निर्दयी, गाँवों की अब, जड़ ही मिटाना चाहते।

सिर चढ़ी अंग्रेज़ियत, देशी दफन कर बोलियाँ,

बदनियत फिर से, गुलामी को बुलाना चाहते।

देश जाए या रसातल, या हो दुश्मन के अधीन,

दे हवा आतंक को, कुर्सी बचाना चाहते।

कोशिशें नापाक उनकी, खाक कर दें "कल्पना",

खाक में जो स्वत्व जन-जन का मिलाना चाहते।

-----कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗