कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८० / २०४ № 80 of 204 रचना ८० / २०४
२७ मार्च २०१५ 27 March 2015 २७ मार्च २०१५

चाह में जिसकी चले थे chaah men jisakee chale the चाह में जिसकी चले थे

चाह

में जिसकी चले थे,

उस खुशी को खो चुके।

दिल

शहर को सौंपकर,

ज़िंदादिली को खो चुके।

अब नहीं होती सुबह,

मुस्कान अभिवादन भरी,

जड़

हुए जज़्बात, तन की ताज़गी को खो चुके।

घर के घेरे तोड़ आए, चुन लिए

हमने मकान,

चार

दीवारों में घिर,

कुदरत परी को खो चुके।

दे

रहे खुद को तसल्ली,

देख नित नकली गुलाब,

खिड़कियों

को खोलती गुलदावदी को खो चुके।

कल

की चिंता ओढ़ सोते,

करवटों की सेज पर,

चैन

की चादर उढ़ाती,

यामिनी को खो चुके।

चाँद

हमको ढूँढता है,

अब छतों पर रात भर,

हम

अमा में डूब,

छत की चाँदनी को खो चुके।

गाँव

को यदि हम बनाते,

एक प्यारा सा शहर,

साथ

रहती वो सदा,

हम जिस गली को खो चुके।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

chaah

men jisakee chale the,

us khushee ko kho chuke

·

dil

shahar ko saunpakar,

zindaadilee ko kho chuke

·

ab naheen hotee subah,

muskaan abhiwaadan bharee,

·

jad

hue jazbaat, tan kee taazagee ko kho chuke

·

ghar ke ghere tod aae, chun lie

hamane makaan,

·

chaar

deewaaron men ghir,

kudarat paree ko kho chuke

·

de

rahe khud ko tasallee,

dekh nit nakalee gulaab,

·

khidakiyon

ko kholatee guladaawadee ko kho chuke

·

kal

kee chintaa oढ़ sote,

karawaton kee sej par,

·

chain

kee chaadar uढ़aatee,

yaaminee ko kho chuke

·

chaand

hamako dhoondhataa hai,

ab chaton par raat bhar,

·

ham

amaa men doob,

chat kee chaandanee ko kho chuke

·

gaanv

ko yadi ham banaate,

ek pyaaraa saa shahar,

·

saath

rahatee wo sadaa,

ham jis galee ko kho chuke

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

चाह

में जिसकी चले थे,

उस खुशी को खो चुके।

दिल

शहर को सौंपकर,

ज़िंदादिली को खो चुके।

अब नहीं होती सुबह,

मुस्कान अभिवादन भरी,

जड़

हुए जज़्बात, तन की ताज़गी को खो चुके।

घर के घेरे तोड़ आए, चुन लिए

हमने मकान,

चार

दीवारों में घिर,

कुदरत परी को खो चुके।

दे

रहे खुद को तसल्ली,

देख नित नकली गुलाब,

खिड़कियों

को खोलती गुलदावदी को खो चुके।

कल

की चिंता ओढ़ सोते,

करवटों की सेज पर,

चैन

की चादर उढ़ाती,

यामिनी को खो चुके।

चाँद

हमको ढूँढता है,

अब छतों पर रात भर,

हम

अमा में डूब,

छत की चाँदनी को खो चुके।

गाँव

को यदि हम बनाते,

एक प्यारा सा शहर,

साथ

रहती वो सदा,

हम जिस गली को खो चुके।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗