चाह में जिसकी चले थे chaah men jisakee chale the चाह में जिसकी चले थे
चाह
में जिसकी चले थे,
उस खुशी को खो चुके।
दिल
शहर को सौंपकर,
ज़िंदादिली को खो चुके।
अब नहीं होती सुबह,
मुस्कान अभिवादन भरी,
जड़
हुए जज़्बात, तन की ताज़गी को खो चुके।
घर के घेरे तोड़ आए, चुन लिए
हमने मकान,
चार
दीवारों में घिर,
कुदरत परी को खो चुके।
दे
रहे खुद को तसल्ली,
देख नित नकली गुलाब,
खिड़कियों
को खोलती गुलदावदी को खो चुके।
कल
की चिंता ओढ़ सोते,
करवटों की सेज पर,
चैन
की चादर उढ़ाती,
यामिनी को खो चुके।
चाँद
हमको ढूँढता है,
अब छतों पर रात भर,
हम
अमा में डूब,
छत की चाँदनी को खो चुके।
गाँव
को यदि हम बनाते,
एक प्यारा सा शहर,
साथ
रहती वो सदा,
हम जिस गली को खो चुके।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
chaah
men jisakee chale the,
us khushee ko kho chuke
dil
shahar ko saunpakar,
zindaadilee ko kho chuke
ab naheen hotee subah,
muskaan abhiwaadan bharee,
jad
hue jazbaat, tan kee taazagee ko kho chuke
ghar ke ghere tod aae, chun lie
hamane makaan,
chaar
deewaaron men ghir,
kudarat paree ko kho chuke
de
rahe khud ko tasallee,
dekh nit nakalee gulaab,
khidakiyon
ko kholatee guladaawadee ko kho chuke
kal
kee chintaa oढ़ sote,
karawaton kee sej par,
chain
kee chaadar uढ़aatee,
yaaminee ko kho chuke
chaand
hamako dhoondhataa hai,
ab chaton par raat bhar,
ham
amaa men doob,
chat kee chaandanee ko kho chuke
gaanv
ko yadi ham banaate,
ek pyaaraa saa shahar,
saath
rahatee wo sadaa,
ham jis galee ko kho chuke
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
चाह
में जिसकी चले थे,
उस खुशी को खो चुके।
दिल
शहर को सौंपकर,
ज़िंदादिली को खो चुके।
अब नहीं होती सुबह,
मुस्कान अभिवादन भरी,
जड़
हुए जज़्बात, तन की ताज़गी को खो चुके।
घर के घेरे तोड़ आए, चुन लिए
हमने मकान,
चार
दीवारों में घिर,
कुदरत परी को खो चुके।
दे
रहे खुद को तसल्ली,
देख नित नकली गुलाब,
खिड़कियों
को खोलती गुलदावदी को खो चुके।
कल
की चिंता ओढ़ सोते,
करवटों की सेज पर,
चैन
की चादर उढ़ाती,
यामिनी को खो चुके।
चाँद
हमको ढूँढता है,
अब छतों पर रात भर,
हम
अमा में डूब,
छत की चाँदनी को खो चुके।
गाँव
को यदि हम बनाते,
एक प्यारा सा शहर,
साथ
रहती वो सदा,
हम जिस गली को खो चुके।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी