चाँदनी हिंदी हमारी- हिंदी ग़ज़ल chaandanee hindee hamaaree- hindee gazal चाँदनी हिंदी हमारी- हिंदी ग़ज़ल
भव्य भारत के फ़लक की
चाँदनी हिन्दी हमारी।
कर रही रोशन भुवन को
भारती हिन्दी हमारी।
लय सुरों के साथ बचपन
में सिखाए जिसने आखर
आज तक वो इस हृदय में
है बसी हिन्दी हमारी।
मातृ-भू की अस्मिता पर
शत्रु जब हावी हुए थे
साथ थी हर जंग में यह
लाड़ली हिन्दी हमारी।
बंद मुख इसका किया करते
थे जो अब सिर झुकाते।
हर सभा में हो मुखर जब
बोलती हिन्दी हमारी।
मान देती जो इसे, देशी-
विदेशी कोई भाषा
मानती सम्मान से
उसको सखी हिन्दी हमारी।
विश्व में गहराइयों तक
जम चुकी इसकी जड़ें हैं
छाँव जग को दे रही
वट वृक्ष सी हिन्दी हमारी।
गीत, गज़लें, छंद, कविताएँ
इसी से हैं अलंकृत
प्राण भरती हर विधा में
सुरसई हिन्दी हमारी।
कैद जिनने था किया
इसको वे अब मायूस से हैं
तोड़ पिंजड़ा उड़ रही
नभ में परी हिन्दी हमारी
यह नहीं चेरी किसी की
राज सदियों तक करेगी
‘कल्पना’ रानी सदा है
सुंदरी हिन्दी हमारी
bhavy bhaarat ke falak kee
chaandanee hindee hamaaree
kar rahee roshan bhuwan ko
bhaaratee hindee hamaaree
lay suron ke saath bachapan
men sikhaae jisane aakhar
aaj tak wo is hriiday men
hai basee hindee hamaaree
maatrii-bhoo kee asmitaa par
shatru jab haawee hue the
saath thee har jang men yah
laadalee hindee hamaaree
band mukh isakaa kiyaa karate
the jo ab sir jhukaate
har sabhaa men ho mukhar jab
bolatee hindee hamaaree
maan detee jo ise, deshee-
wideshee koee bhaashaa
maanatee sammaan se
usako sakhee hindee hamaaree
wishv men gaharaaiyon tak
jam chukee isakee jaden hain
chaanv jag ko de rahee
wat wriiksh see hindee hamaaree
geet, gazalen, chand, kawitaaen
isee se hain alankriit
praan bharatee har widhaa men
surasaee hindee hamaaree
kaid jinane thaa kiyaa
isako we ab maayoos se hain
tod pinjadaa ud rahee
nabh men paree hindee hamaaree
yah naheen cheree kisee kee
raaj sadiyon tak karegee
‘kalpanaa’ raanee sadaa hai
sundaree hindee hamaaree
भव्य भारत के फ़लक की
चाँदनी हिन्दी हमारी।
कर रही रोशन भुवन को
भारती हिन्दी हमारी।
लय सुरों के साथ बचपन
में सिखाए जिसने आखर
आज तक वो इस हृदय में
है बसी हिन्दी हमारी।
मातृ-भू की अस्मिता पर
शत्रु जब हावी हुए थे
साथ थी हर जंग में यह
लाड़ली हिन्दी हमारी।
बंद मुख इसका किया करते
थे जो अब सिर झुकाते।
हर सभा में हो मुखर जब
बोलती हिन्दी हमारी।
मान देती जो इसे, देशी-
विदेशी कोई भाषा
मानती सम्मान से
उसको सखी हिन्दी हमारी।
विश्व में गहराइयों तक
जम चुकी इसकी जड़ें हैं
छाँव जग को दे रही
वट वृक्ष सी हिन्दी हमारी।
गीत, गज़लें, छंद, कविताएँ
इसी से हैं अलंकृत
प्राण भरती हर विधा में
सुरसई हिन्दी हमारी।
कैद जिनने था किया
इसको वे अब मायूस से हैं
तोड़ पिंजड़ा उड़ रही
नभ में परी हिन्दी हमारी
यह नहीं चेरी किसी की
राज सदियों तक करेगी
‘कल्पना’ रानी सदा है
सुंदरी हिन्दी हमारी