कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११५ / २०४ № 115 of 204 रचना ११५ / २०४
१ मार्च २०१६ 1 March 2016 १ मार्च २०१६

डाली मोगरे की-मेरी नज़र में (शायर नीरज गोस्वामी ) daalee mogare kee-meree nazar men (shaayar neeraj gosvaamee ) डाली मोगरे की-मेरी नज़र में (शायर नीरज गोस्वामी )

डाली मोगरे की...मेरी नज़र में

-कल्पना रामानी

शायर "नीरज गोस्वामी"

गूँथकर

भावों भरा इक हार, ‘डाली मोगरे की’

आई

मेरे हाथ में साकार, ‘डाली मोगरे की’

जोड़

खुशियाँ,

छोड़

गम,

अनुराग-मय

आँचल लपेटे

सामने

जैसे खड़ी इक नार, ‘डाली मोगरे की’

शब्द

गागर, भाव सागर, काफिये-बहरें

नवेली

है

अनोखा शिल्पमय संसार, ‘डाली मोगरे की’

हास्य-पुट, शृंगार-रस, संवेदनाएँ भर

लबालब

सौ

फ़साने कह रही फ़नकार, ‘डाली मोगरे की’

ये

नहीं केवल किताबी बात या जज़्बात मित्रों

बल्कि

अनुपम ‘कल्पना’ उपहार ‘डाली मोगरे की’

...

आज

अचानक अंतर्जाल पर ब्लॉग-जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय शायरों में शुमार ‘नीरज गोस्वामी’ जी का ग़ज़ल संग्रह, ‘डाली मोगरे की’ कोरियर द्वारा

उपहार स्वरूप पाकर एक सुखद आश्चर्य से मन अभिभूत हो उठा। साथ में कुछ शब्द एक पुर्जे पर लिखे हुए थे कि वे मुझसे परिचित नहीं

हैं लेकिन मेरी दो ग़ज़लें भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘गर्भनाल’ में पढ़कर अपना

संग्रह मुझे भेजने से स्वयं को रोक नहीं पाए। मैं स्वयं को शायरा तो मानती ही नहीं

क्योंकि मैं न तो उर्दू जानती हूँ, न ही कभी किसी चर्चा या मुशायरे में शामिल हुई

हूँ। किसी बहर आदि के नाम भी नहीं जानती, लेकिन उनका अपने लिए ‘बेहतरीन शायरा’ का सम्मान पूर्ण सम्बोधन

उनकी हस्तलिपि में पाकर इतनी प्रसन्नता मिली कि शब्दों में बयान करना संभव नहीं।

यह मेरे लिए किसी भी नामी सम्मान, पुरस्कार से कम नहीं।

प्रतिउत्तर में जब उनको ज्ञात हुआ कि मैं अपने

सीखने के दौर में उनको सालों से पढ़ती आई हूँ और उनकी ग़ज़लों की मन से प्रशंसक हूँ तो

उनको भी कम आश्चर्य नहीं हुआ। भला बताइये, मोगरे की महक भी किसी

परिचय की मोहताज होती है? एक साथ ही किताब

के अनेक पन्ने पलटती और पढ़ती गई, स्वाद लेकर पढ़ने के लिए अनेक शेरों पर निशान लगा

लिए, और सबसे पहले जो

भाव मन में आए उन्हें ग़ज़ल रूप में ही उसी समय कागज़ पर उतार लिया, वो आप ऊपर पढ़ ही चुके होंगे।

मैंने

कभी किसी किताब की समीक्षा नहीं लिखी, न ही लिख सकती हूँ। यद्यपि इस किताब पर अनेक

जाने पहचाने नामी शायरों/कवियों/द्वारा समीक्षाएँ और पाठकों की प्रतिक्रियाएँ क़लमबद्ध हुई हैं और अनेक बेहतरीन शेर चिन्हित किए गए हैं फिर भी अपने उद्गार प्रकट करने से मेरा मन भी नहीं

माना।

कहीं पर्वों का उल्लास, कहीं प्रेम-रस भरा मधुमास, कहीं हास-परिहास, तो कहीं बच्चों सी मासूमियत, पढ़ते पढ़ते मन-पाखी उड़कर अलग-अलग डाली की महक को समेटने कल्पनालोक में विचरने लगता है। भावों में संवेदनाओं का

सागर, कथ्य में सार, भाषा में प्रवाह, मधुरता, बहर-काफियों में शिल्पगत कोमलता, सहज और सरल कहन आदि

हर तरह के शब्द-रंग नीरज

जी की ग़ज़लों की विशेषता है, इसी कारण किताब को बार-बार पढ़ने की चाह पैदा होती है।

ज़िंदगी के हारे पलों को जीतने की राह दिखाते

हुए शेर, दिल-दिमाग की मृत

शिराओं को स्पंदित कर जीने की चाह जगाते हुए शेर, धूमिल कोनों में रोशनी के

चिराग जलाते हुए शेर, देश-दशा को चिंतातुर कुछ कर गुजरने को उकसाते हुए शेर, ऐसे ही नहीं कहे जा सकते। केवल शायर मन ही जानता है जब भाव-भूमि

के कण-कण को कलेजा निचोड़कर सींचा जाता है

तभी ग़ज़ल रूपी पौधा पल्लवित, पुष्पित होकर अपनी महक बिखेरने में कामयाब होता है।

आजकल देश व समाज में व्याप्त समर्थों के सितम, निर्बलों पर अत्याचार, अव्यवस्थाएँ, विषमताएँ आदि देखकर

कोई भी कलमकार चैन से नहीं बैठ सकता। ग़ज़ल विधा में हर तरह की बात आसानी से कही जा सकती है। साथ ही अंतर की अनंत गहराइयों में उतरकर, प्रकृति से एकाकार

होकर ही ऐसा सृजन किया जा सकता है।

सार यह कि यह किताब हर तरह से पाठकों को सम्मोहित

करने में सक्षम है। ग़ज़ल के शौकीनों के लिए यह किताब एक अनमोल खज़ाना साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

कुछ अपनी पसंद के शेर नीचे दे रही हूँ, जिन्हें पढ़कर आप भी उन्हीं भावों के साथ एकाकार होकर आनंदित हो उठेंगे।

ग़ज़लों के इस सुगंधित गुलदस्ते के लिए नीरज जी को हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएँ। आशा है वे ऐसे ही चिरकाल तक अपनी लेखनी की महक बिखेरते हुए नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

*चाहते हैं लौ लगाना, आप गर भगवान से

प्यार करना सीखिये, पहले हरिक इंसान से

*दिल से निकली है ग़ज़ल, नीरज कभी तो देखना

झूमकर सारा ज़माना दिल से इसको गाएगा

*अपनी बदहाली में भी मत मुसकुराना छोड़िए

त्यागता खुशबू कहाँ है, मोगरा सूखा हुआ

*तमन्ना

थी गुज़र जाता,

गली

में यार की जीवन

हमें मालूम ही कब था यहाँ

मरना ज़रूरी है

*जहाँ

जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ

अगर लिखना तुझे हो ख़त

तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

*कौन

सुनता है 'नीरज' सरल सी ग़ज़ल

कुछ धमाके करो तो बजें

सीटियाँ

*हो

ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं

और हम रुमाल होते जा रहे

हैं

*तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते

कल बनेंगी वो सहारा देख

लेना बच्चियाँ

*ख़ुशबुएँ

लेकर हवाएँ ख़ुद-ब -ख़ुद आ जाएँगी

खोल कर देखो तो घर की

बंद सारी खिड़कियाँ

*खौफ

का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ

आज का इंसान है कुछ इस तरह

सहमा हुआ

*हालत देख के तुम, कहते ख़राब नीरज

तुमने सुधारने को, बोलो तो क्या किया है?

*हर वक़्त वहाँ सहमे हुए मिलते हैं बच्चे

किलकारियाँ गूँजें जहाँ वो घर नहीं मिलते

*तय

किया चलना जुदा जब भीड़ से

हर नज़र देखा, सवाली हो गई

*ज़िन्दगी

भरपूर जीने के लिए

ग़म ख़ुशी में फ़र्क़ ही बेकार

है

*जिंदगी

उनकी मज़े से कट गई

रंग 'नीरज' इसमें जो भरते रहे

*खिड़कियों से झाँकना बेकार है

बारिशों में भीग जाना सीखिये

*देश

के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा

पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी

भूमिका

*कुछ नहीं देती है ये

दुनिया किसी को मुफ्त में

नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

*रोटियों के सिवा गरीबों का

और कुछ भी इरम नहीं होता

*करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है

हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है

*तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आँखें

उसे छूने का आए क्षण, समझ लेना कि होली है

*काला कलूट ऐसा, छिप जाए रात में जो

फागुन में सुन सखी वो, लगता पिया गुलाबी

*उसे बाज़ार के रंगों से रँगने की ज़रूरत क्या

फ़क़त छूते ही मेरे जो, गुलाबी होता जाता है

*हुआ जो सोच में बूढ़ा, उसे फागुन सताता है

मगर जो है जवाँ दिल वो, सदा होली मनाता है

क़िताब

"डाली मोगरे की".....

शायर श्री नीरज गोस्वामी जी

प्रकाशक

..…शिवना प्रकाशन

पी

सी लैब ,सम्राट

कॉम्प्लेक्स बेसमैंट

बस

स्टैंड ,

सीहोर

- 46601 (म प्र )

फ़ोन

:07562405545,

07562695918

E-mail: shivna.prakashan@gmail.com

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

daalee mogare keemeree nazar men

·

-kalpanaa raamaanee

·

shaayar "neeraj gosvaamee"

·

goonthakar

bhaawon bharaa ik haar, ‘daalee mogare kee’

·

aaee

mere haath men saakaar, ‘daalee mogare kee’

·

jod

khushiyaan,

chod

gam,

anuraag-may

aanchal lapete

·

saamane

jaise khadee ik naar, ‘daalee mogare kee’

·

shabd

gaagar, bhaaw saagar, kaaphiye-baharen

nawelee

·

hai

anokhaa shilpamay sansaar, ‘daalee mogare kee’

·

haasy-put, shriingaar-ras, sanvedanaaen bhar

labaalab

·

sau

fasaane kah rahee fanakaar, ‘daalee mogare kee’

·

ye

naheen kewal kitaabee baat yaa jazbaat mitron

·

balki

anupam ‘kalpanaa’ upahaar ‘daalee mogare kee’

·

aaj

achaanak antarjaal par blॉg-jagat ke sarvaadhik lokapriy shaayaron men shumaar ‘neeraj gosvaamee’ jee kaa gazal sangrah, ‘daalee mogare kee’ koriyar dvaaraa

upahaar svaroop paakar ek sukhad aashchary se man abhibhoot ho uthaa saath men kuch shabd ek purje par likhe hue the ki we mujhase parichit naheen

hain lekin meree do gazalen bhopaal se prakaashit patrikaa ‘garbhanaal’ men pढ़kar apanaa

sangrah mujhe bhejane se svayan ko rok naheen paae main svayan ko shaayaraa to maanatee hee naheen

kyonki main n to urdoo jaanatee hoon, n hee kabhee kisee charchaa yaa mushaayare men shaamil huee

hoon kisee bahar aadi ke naam bhee naheen jaanatee, lekin unakaa apane lie ‘behatareen shaayaraa’ kaa sammaan poorn sambodhan

unakee hastalipi men paakar itanee prasannataa milee ki shabdon men bayaan karanaa sanbhaw naheen

yah mere lie kisee bhee naamee sammaan, puraskaar se kam naheen

·

pratiuttar men jab unako jnaat huaa ki main apane

seekhane ke daur men unako saalon se pढ़tee aaee hoon aur unakee gazalon kee man se prashansak hoon to

unako bhee kam aashchary naheen huaa bhalaa bataaiye, mogare kee mahak bhee kisee

parichay kee mohataaj hotee hai? ek saath hee kitaab

ke anek panne palatatee aur pढ़tee gaee, svaad lekar pढ़ne ke lie anek sheron par nishaan lagaa

lie, aur sabase pahale jo

bhaaw man men aae unhen gazal roop men hee usee samay kaagaz par utaar liyaa, wo aap oopar pढ़ hee chuke honge

·

mainne

kabhee kisee kitaab kee sameekshaa naheen likhee, n hee likh sakatee hoon yadyapi is kitaab par anek

jaane pahachaane naamee shaayaron/kawiyon/dvaaraa sameekshaaen aur paathakon kee pratikriyaaen qalamabaddh huee hain aur anek behatareen sher chinhit kie gae hain phir bhee apane udgaar prakat karane se meraa man bhee naheen

maanaa

·

kaheen parvon kaa ullaas, kaheen prem-ras bharaa madhumaas, kaheen haas-parihaas, to kaheen bachchon see maasoomiyat, pढ़te pढ़te man-paakhee udakar alag-alag daalee kee mahak ko sametane kalpanaalok men wicharane lagataa hai bhaawon men sanvedanaaon kaa

saagar, kathy men saar, bhaashaa men prawaah, madhurataa, bahar-kaaphiyon men shilpagat komalataa, sahaj aur saral kahan aadi

har tarah ke shabd-rang neeraj

jee kee gazalon kee wisheshataa hai, isee kaaran kitaab ko baar-baar pढ़ne kee chaah paidaa hotee hai

·

zindagee ke haare palon ko jeetane kee raah dikhaate

hue sher, dil-dimaag kee mriit

shiraaon ko spandit kar jeene kee chaah jagaate hue sher, dhoomil konon men roshanee ke

chiraag jalaate hue sher, desh-dashaa ko chintaatur kuch kar gujarane ko ukasaate hue sher, aise hee naheen kahe jaa sakate kewal shaayar man hee jaanataa hai jab bhaaw-bhoomi

ke kan-kan ko kalejaa nichodakar seenchaa jaataa hai

tabhee gazal roopee paudhaa pallawit, pushpit hokar apanee mahak bikherane men kaamayaab hotaa hai

·

aajakal desh w samaaj men wyaapt samarthon ke sitam, nirbalon par atyaachaar, avyawasthaaen, wishamataaen aadi dekhakar

koee bhee kalamakaar chain se naheen baith sakataa gazal widhaa men har tarah kee baat aasaanee se kahee jaa sakatee hai saath hee antar kee anant gaharaaiyon men utarakar, prakriiti se ekaakaar

hokar hee aisaa sriijan kiyaa jaa sakataa hai

·

saar yah ki yah kitaab har tarah se paathakon ko sammohit

karane men saksham hai gazal ke shaukeenon ke lie yah kitaab ek anamol khazaanaa saabit hogee, aisaa meraa wishvaas hai

kuch apanee pasand ke sher neeche de rahee hoon, jinhen pढ़kar aap bhee unheen bhaawon ke saath ekaakaar hokar aanandit ho uthenge

·

gazalon ke is sugandhit guladaste ke lie neeraj jee ko haardik badhaaee w anant shubhakaamanaaen aashaa hai we aise hee chirakaal tak apanee lekhanee kee mahak bikherate hue naee peeढ़ee kaa maargadarshan karate rahenge

·

*chaahate hain lau lagaanaa, aap gar bhagawaan se

·

pyaar karanaa seekhiye, pahale harik insaan se

·

*dil se nikalee hai gazal, neeraj kabhee to dekhanaa

·

jhoomakar saaraa zamaanaa dil se isako gaaegaa

·

*apanee badahaalee men bhee mat musakuraanaa chodie

·

tyaagataa khushaboo kahaan hai, mogaraa sookhaa huaa

·

*tamannaa

thee guj़r jaataa,

galee

men yaar kee jeewan

·

hamen maaloom hee kab thaa yahaan

maranaa j़rooree hai

·

*jahaan

jaataa hoon main tujhako waheen maujood paataa hoon

·

agar likhanaa tujhe ho kh़t

teraa main kyaa pataa likkhoon

·

*kaun

sunataa hai 'neeraj' saral see g़j़l

·

kuch dhamaake karo to bajen

seetiyaan

·

*ho

kafaa hamase wo rote jaa rahe hain

·

aur ham rumaal hote jaa rahe

hain

·

*tum jise the kokh hee men maarane kee sochate

·

kal banengee wo sahaaraa dekh

lenaa bachchiyaan

·

*kushabuen

lekar hawaaen kud-b -kud aa jaaengee

·

khol kar dekho to ghar kee

band saaree khidakiyaan

·

*khauph

kaa khanjar jigar men jaise ho utaraa huaa

·

aaj kaa insaan hai kuch is tarah

sahamaa huaa

·

*haalat dekh ke tum, kahate karaab neeraj

·

tumane sudhaarane ko, bolo to kyaa kiyaa hai?

·

*har waqt wahaan sahame hue milate hain bachche

·

kilakaariyaan goonjen jahaan wo ghar naheen milate

·

*tay

kiyaa chalanaa judaa jab bheed़ se

·

har naj़r dekhaa, sawaalee ho gaee

·

*zindagee

bharapoor jeene ke lie

·

gam kushee men farq hee bekaar

hai

·

*jindagee

unakee maze se kat gaee

·

rang 'neeraj' isamen jo bharate rahe

·

*khidakiyon se jhaankanaa bekaar hai

·

baarishon men bheeg jaanaa seekhiye

·

*desh

ke haalaat badatar hain, sabhee ne ye kahaa

·

par naheen batalaa sakaa, koee bhee apanee

bhoomikaa

·

*kuch naheen detee hai ye

duniyaa kisee ko mupht men

·

neend lee badale men jisako reshamee bistar die

·

*rotiyon ke siwaa gareebon kaa

·

aur kuch bhee iram naheen hotaa

·

*karen jab paanv khud nartan, samajh lenaa ki holee hai

·

hiloren le rahaa ho man, samajh lenaa ki holee hai

·

*tarasatee jisake hon deedaar tak ko aapakee aankhen

·

use choone kaa aae kshan, samajh lenaa ki holee hai

·

*kaalaa kaloot aisaa, chip jaae raat men jo

·

phaagun men sun sakhee wo, lagataa piyaa gulaabee

·

*use baazaar ke rangon se rangane kee zaroorat kyaa

·

faqat choote hee mere jo, gulaabee hotaa jaataa hai

·

*huaa jo soch men booढ़aa, use phaagun sataataa hai

·

magar jo hai jawaan dil wo, sadaa holee manaataa hai

·

qitaab

"daalee mogare kee"

·

shaayar shree neeraj gosvaamee jee

·

prakaashak

…shiwanaa prakaashan

·

pee

see laib ,samraat

kॉmpleks besamaint

·

bas

staind ,

seehor

- 46601 (m pr )

·

fon

:07562405545,

07562695918

·

e-mail: shivnprakashan@gmailcom

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

डाली मोगरे की...मेरी नज़र में

-कल्पना रामानी

शायर "नीरज गोस्वामी"

गूँथकर

भावों भरा इक हार, ‘डाली मोगरे की’

आई

मेरे हाथ में साकार, ‘डाली मोगरे की’

जोड़

खुशियाँ,

छोड़

गम,

अनुराग-मय

आँचल लपेटे

सामने

जैसे खड़ी इक नार, ‘डाली मोगरे की’

शब्द

गागर, भाव सागर, काफिये-बहरें

नवेली

है

अनोखा शिल्पमय संसार, ‘डाली मोगरे की’

हास्य-पुट, शृंगार-रस, संवेदनाएँ भर

लबालब

सौ

फ़साने कह रही फ़नकार, ‘डाली मोगरे की’

ये

नहीं केवल किताबी बात या जज़्बात मित्रों

बल्कि

अनुपम ‘कल्पना’ उपहार ‘डाली मोगरे की’

...

आज

अचानक अंतर्जाल पर ब्लॉग-जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय शायरों में शुमार ‘नीरज गोस्वामी’ जी का ग़ज़ल संग्रह, ‘डाली मोगरे की’ कोरियर द्वारा

उपहार स्वरूप पाकर एक सुखद आश्चर्य से मन अभिभूत हो उठा। साथ में कुछ शब्द एक पुर्जे पर लिखे हुए थे कि वे मुझसे परिचित नहीं

हैं लेकिन मेरी दो ग़ज़लें भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘गर्भनाल’ में पढ़कर अपना

संग्रह मुझे भेजने से स्वयं को रोक नहीं पाए। मैं स्वयं को शायरा तो मानती ही नहीं

क्योंकि मैं न तो उर्दू जानती हूँ, न ही कभी किसी चर्चा या मुशायरे में शामिल हुई

हूँ। किसी बहर आदि के नाम भी नहीं जानती, लेकिन उनका अपने लिए ‘बेहतरीन शायरा’ का सम्मान पूर्ण सम्बोधन

उनकी हस्तलिपि में पाकर इतनी प्रसन्नता मिली कि शब्दों में बयान करना संभव नहीं।

यह मेरे लिए किसी भी नामी सम्मान, पुरस्कार से कम नहीं।

प्रतिउत्तर में जब उनको ज्ञात हुआ कि मैं अपने

सीखने के दौर में उनको सालों से पढ़ती आई हूँ और उनकी ग़ज़लों की मन से प्रशंसक हूँ तो

उनको भी कम आश्चर्य नहीं हुआ। भला बताइये, मोगरे की महक भी किसी

परिचय की मोहताज होती है? एक साथ ही किताब

के अनेक पन्ने पलटती और पढ़ती गई, स्वाद लेकर पढ़ने के लिए अनेक शेरों पर निशान लगा

लिए, और सबसे पहले जो

भाव मन में आए उन्हें ग़ज़ल रूप में ही उसी समय कागज़ पर उतार लिया, वो आप ऊपर पढ़ ही चुके होंगे।

मैंने

कभी किसी किताब की समीक्षा नहीं लिखी, न ही लिख सकती हूँ। यद्यपि इस किताब पर अनेक

जाने पहचाने नामी शायरों/कवियों/द्वारा समीक्षाएँ और पाठकों की प्रतिक्रियाएँ क़लमबद्ध हुई हैं और अनेक बेहतरीन शेर चिन्हित किए गए हैं फिर भी अपने उद्गार प्रकट करने से मेरा मन भी नहीं

माना।

कहीं पर्वों का उल्लास, कहीं प्रेम-रस भरा मधुमास, कहीं हास-परिहास, तो कहीं बच्चों सी मासूमियत, पढ़ते पढ़ते मन-पाखी उड़कर अलग-अलग डाली की महक को समेटने कल्पनालोक में विचरने लगता है। भावों में संवेदनाओं का

सागर, कथ्य में सार, भाषा में प्रवाह, मधुरता, बहर-काफियों में शिल्पगत कोमलता, सहज और सरल कहन आदि

हर तरह के शब्द-रंग नीरज

जी की ग़ज़लों की विशेषता है, इसी कारण किताब को बार-बार पढ़ने की चाह पैदा होती है।

ज़िंदगी के हारे पलों को जीतने की राह दिखाते

हुए शेर, दिल-दिमाग की मृत

शिराओं को स्पंदित कर जीने की चाह जगाते हुए शेर, धूमिल कोनों में रोशनी के

चिराग जलाते हुए शेर, देश-दशा को चिंतातुर कुछ कर गुजरने को उकसाते हुए शेर, ऐसे ही नहीं कहे जा सकते। केवल शायर मन ही जानता है जब भाव-भूमि

के कण-कण को कलेजा निचोड़कर सींचा जाता है

तभी ग़ज़ल रूपी पौधा पल्लवित, पुष्पित होकर अपनी महक बिखेरने में कामयाब होता है।

आजकल देश व समाज में व्याप्त समर्थों के सितम, निर्बलों पर अत्याचार, अव्यवस्थाएँ, विषमताएँ आदि देखकर

कोई भी कलमकार चैन से नहीं बैठ सकता। ग़ज़ल विधा में हर तरह की बात आसानी से कही जा सकती है। साथ ही अंतर की अनंत गहराइयों में उतरकर, प्रकृति से एकाकार

होकर ही ऐसा सृजन किया जा सकता है।

सार यह कि यह किताब हर तरह से पाठकों को सम्मोहित

करने में सक्षम है। ग़ज़ल के शौकीनों के लिए यह किताब एक अनमोल खज़ाना साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

कुछ अपनी पसंद के शेर नीचे दे रही हूँ, जिन्हें पढ़कर आप भी उन्हीं भावों के साथ एकाकार होकर आनंदित हो उठेंगे।

ग़ज़लों के इस सुगंधित गुलदस्ते के लिए नीरज जी को हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएँ। आशा है वे ऐसे ही चिरकाल तक अपनी लेखनी की महक बिखेरते हुए नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

*चाहते हैं लौ लगाना, आप गर भगवान से

प्यार करना सीखिये, पहले हरिक इंसान से

*दिल से निकली है ग़ज़ल, नीरज कभी तो देखना

झूमकर सारा ज़माना दिल से इसको गाएगा

*अपनी बदहाली में भी मत मुसकुराना छोड़िए

त्यागता खुशबू कहाँ है, मोगरा सूखा हुआ

*तमन्ना

थी गुज़र जाता,

गली

में यार की जीवन

हमें मालूम ही कब था यहाँ

मरना ज़रूरी है

*जहाँ

जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ

अगर लिखना तुझे हो ख़त

तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

*कौन

सुनता है 'नीरज' सरल सी ग़ज़ल

कुछ धमाके करो तो बजें

सीटियाँ

*हो

ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं

और हम रुमाल होते जा रहे

हैं

*तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते

कल बनेंगी वो सहारा देख

लेना बच्चियाँ

*ख़ुशबुएँ

लेकर हवाएँ ख़ुद-ब -ख़ुद आ जाएँगी

खोल कर देखो तो घर की

बंद सारी खिड़कियाँ

*खौफ

का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ

आज का इंसान है कुछ इस तरह

सहमा हुआ

*हालत देख के तुम, कहते ख़राब नीरज

तुमने सुधारने को, बोलो तो क्या किया है?

*हर वक़्त वहाँ सहमे हुए मिलते हैं बच्चे

किलकारियाँ गूँजें जहाँ वो घर नहीं मिलते

*तय

किया चलना जुदा जब भीड़ से

हर नज़र देखा, सवाली हो गई

*ज़िन्दगी

भरपूर जीने के लिए

ग़म ख़ुशी में फ़र्क़ ही बेकार

है

*जिंदगी

उनकी मज़े से कट गई

रंग 'नीरज' इसमें जो भरते रहे

*खिड़कियों से झाँकना बेकार है

बारिशों में भीग जाना सीखिये

*देश

के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा

पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी

भूमिका

*कुछ नहीं देती है ये

दुनिया किसी को मुफ्त में

नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

*रोटियों के सिवा गरीबों का

और कुछ भी इरम नहीं होता

*करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है

हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है

*तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आँखें

उसे छूने का आए क्षण, समझ लेना कि होली है

*काला कलूट ऐसा, छिप जाए रात में जो

फागुन में सुन सखी वो, लगता पिया गुलाबी

*उसे बाज़ार के रंगों से रँगने की ज़रूरत क्या

फ़क़त छूते ही मेरे जो, गुलाबी होता जाता है

*हुआ जो सोच में बूढ़ा, उसे फागुन सताता है

मगर जो है जवाँ दिल वो, सदा होली मनाता है

क़िताब

"डाली मोगरे की".....

शायर श्री नीरज गोस्वामी जी

प्रकाशक

..…शिवना प्रकाशन

पी

सी लैब ,सम्राट

कॉम्प्लेक्स बेसमैंट

बस

स्टैंड ,

सीहोर

- 46601 (म प्र )

फ़ोन

:07562405545,

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प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗