डाली मोगरे की-मेरी नज़र में (शायर नीरज गोस्वामी ) daalee mogare kee-meree nazar men (shaayar neeraj gosvaamee ) डाली मोगरे की-मेरी नज़र में (शायर नीरज गोस्वामी )
डाली मोगरे की...मेरी नज़र में
-कल्पना रामानी
शायर "नीरज गोस्वामी"
गूँथकर
भावों भरा इक हार, ‘डाली मोगरे की’
आई
मेरे हाथ में साकार, ‘डाली मोगरे की’
जोड़
खुशियाँ,
छोड़
गम,
अनुराग-मय
आँचल लपेटे
सामने
जैसे खड़ी इक नार, ‘डाली मोगरे की’
शब्द
गागर, भाव सागर, काफिये-बहरें
नवेली
है
अनोखा शिल्पमय संसार, ‘डाली मोगरे की’
हास्य-पुट, शृंगार-रस, संवेदनाएँ भर
लबालब
सौ
फ़साने कह रही फ़नकार, ‘डाली मोगरे की’
ये
नहीं केवल किताबी बात या जज़्बात मित्रों
बल्कि
अनुपम ‘कल्पना’ उपहार ‘डाली मोगरे की’
...
आज
अचानक अंतर्जाल पर ब्लॉग-जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय शायरों में शुमार ‘नीरज गोस्वामी’ जी का ग़ज़ल संग्रह, ‘डाली मोगरे की’ कोरियर द्वारा
उपहार स्वरूप पाकर एक सुखद आश्चर्य से मन अभिभूत हो उठा। साथ में कुछ शब्द एक पुर्जे पर लिखे हुए थे कि वे मुझसे परिचित नहीं
हैं लेकिन मेरी दो ग़ज़लें भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘गर्भनाल’ में पढ़कर अपना
संग्रह मुझे भेजने से स्वयं को रोक नहीं पाए। मैं स्वयं को शायरा तो मानती ही नहीं
क्योंकि मैं न तो उर्दू जानती हूँ, न ही कभी किसी चर्चा या मुशायरे में शामिल हुई
हूँ। किसी बहर आदि के नाम भी नहीं जानती, लेकिन उनका अपने लिए ‘बेहतरीन शायरा’ का सम्मान पूर्ण सम्बोधन
उनकी हस्तलिपि में पाकर इतनी प्रसन्नता मिली कि शब्दों में बयान करना संभव नहीं।
यह मेरे लिए किसी भी नामी सम्मान, पुरस्कार से कम नहीं।
प्रतिउत्तर में जब उनको ज्ञात हुआ कि मैं अपने
सीखने के दौर में उनको सालों से पढ़ती आई हूँ और उनकी ग़ज़लों की मन से प्रशंसक हूँ तो
उनको भी कम आश्चर्य नहीं हुआ। भला बताइये, मोगरे की महक भी किसी
परिचय की मोहताज होती है? एक साथ ही किताब
के अनेक पन्ने पलटती और पढ़ती गई, स्वाद लेकर पढ़ने के लिए अनेक शेरों पर निशान लगा
लिए, और सबसे पहले जो
भाव मन में आए उन्हें ग़ज़ल रूप में ही उसी समय कागज़ पर उतार लिया, वो आप ऊपर पढ़ ही चुके होंगे।
मैंने
कभी किसी किताब की समीक्षा नहीं लिखी, न ही लिख सकती हूँ। यद्यपि इस किताब पर अनेक
जाने पहचाने नामी शायरों/कवियों/द्वारा समीक्षाएँ और पाठकों की प्रतिक्रियाएँ क़लमबद्ध हुई हैं और अनेक बेहतरीन शेर चिन्हित किए गए हैं फिर भी अपने उद्गार प्रकट करने से मेरा मन भी नहीं
माना।
कहीं पर्वों का उल्लास, कहीं प्रेम-रस भरा मधुमास, कहीं हास-परिहास, तो कहीं बच्चों सी मासूमियत, पढ़ते पढ़ते मन-पाखी उड़कर अलग-अलग डाली की महक को समेटने कल्पनालोक में विचरने लगता है। भावों में संवेदनाओं का
सागर, कथ्य में सार, भाषा में प्रवाह, मधुरता, बहर-काफियों में शिल्पगत कोमलता, सहज और सरल कहन आदि
हर तरह के शब्द-रंग नीरज
जी की ग़ज़लों की विशेषता है, इसी कारण किताब को बार-बार पढ़ने की चाह पैदा होती है।
ज़िंदगी के हारे पलों को जीतने की राह दिखाते
हुए शेर, दिल-दिमाग की मृत
शिराओं को स्पंदित कर जीने की चाह जगाते हुए शेर, धूमिल कोनों में रोशनी के
चिराग जलाते हुए शेर, देश-दशा को चिंतातुर कुछ कर गुजरने को उकसाते हुए शेर, ऐसे ही नहीं कहे जा सकते। केवल शायर मन ही जानता है जब भाव-भूमि
के कण-कण को कलेजा निचोड़कर सींचा जाता है
तभी ग़ज़ल रूपी पौधा पल्लवित, पुष्पित होकर अपनी महक बिखेरने में कामयाब होता है।
आजकल देश व समाज में व्याप्त समर्थों के सितम, निर्बलों पर अत्याचार, अव्यवस्थाएँ, विषमताएँ आदि देखकर
कोई भी कलमकार चैन से नहीं बैठ सकता। ग़ज़ल विधा में हर तरह की बात आसानी से कही जा सकती है। साथ ही अंतर की अनंत गहराइयों में उतरकर, प्रकृति से एकाकार
होकर ही ऐसा सृजन किया जा सकता है।
सार यह कि यह किताब हर तरह से पाठकों को सम्मोहित
करने में सक्षम है। ग़ज़ल के शौकीनों के लिए यह किताब एक अनमोल खज़ाना साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
कुछ अपनी पसंद के शेर नीचे दे रही हूँ, जिन्हें पढ़कर आप भी उन्हीं भावों के साथ एकाकार होकर आनंदित हो उठेंगे।
ग़ज़लों के इस सुगंधित गुलदस्ते के लिए नीरज जी को हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएँ। आशा है वे ऐसे ही चिरकाल तक अपनी लेखनी की महक बिखेरते हुए नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
*चाहते हैं लौ लगाना, आप गर भगवान से
प्यार करना सीखिये, पहले हरिक इंसान से
*दिल से निकली है ग़ज़ल, नीरज कभी तो देखना
झूमकर सारा ज़माना दिल से इसको गाएगा
*अपनी बदहाली में भी मत मुसकुराना छोड़िए
त्यागता खुशबू कहाँ है, मोगरा सूखा हुआ
*तमन्ना
थी गुज़र जाता,
गली
में यार की जीवन
हमें मालूम ही कब था यहाँ
मरना ज़रूरी है
*जहाँ
जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ
अगर लिखना तुझे हो ख़त
तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ
*कौन
सुनता है 'नीरज' सरल सी ग़ज़ल
कुछ धमाके करो तो बजें
सीटियाँ
*हो
ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रुमाल होते जा रहे
हैं
*तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते
कल बनेंगी वो सहारा देख
लेना बच्चियाँ
*ख़ुशबुएँ
लेकर हवाएँ ख़ुद-ब -ख़ुद आ जाएँगी
खोल कर देखो तो घर की
बंद सारी खिड़कियाँ
*खौफ
का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आज का इंसान है कुछ इस तरह
सहमा हुआ
*हालत देख के तुम, कहते ख़राब नीरज
तुमने सुधारने को, बोलो तो क्या किया है?
*हर वक़्त वहाँ सहमे हुए मिलते हैं बच्चे
किलकारियाँ गूँजें जहाँ वो घर नहीं मिलते
*तय
किया चलना जुदा जब भीड़ से
हर नज़र देखा, सवाली हो गई
*ज़िन्दगी
भरपूर जीने के लिए
ग़म ख़ुशी में फ़र्क़ ही बेकार
है
*जिंदगी
उनकी मज़े से कट गई
रंग 'नीरज' इसमें जो भरते रहे
*खिड़कियों से झाँकना बेकार है
बारिशों में भीग जाना सीखिये
*देश
के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा
पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी
भूमिका
*कुछ नहीं देती है ये
दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
*रोटियों के सिवा गरीबों का
और कुछ भी इरम नहीं होता
*करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है
*तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आँखें
उसे छूने का आए क्षण, समझ लेना कि होली है
*काला कलूट ऐसा, छिप जाए रात में जो
फागुन में सुन सखी वो, लगता पिया गुलाबी
*उसे बाज़ार के रंगों से रँगने की ज़रूरत क्या
फ़क़त छूते ही मेरे जो, गुलाबी होता जाता है
*हुआ जो सोच में बूढ़ा, उसे फागुन सताता है
मगर जो है जवाँ दिल वो, सदा होली मनाता है
क़िताब
"डाली मोगरे की".....
शायर श्री नीरज गोस्वामी जी
प्रकाशक
..…शिवना प्रकाशन
पी
सी लैब ,सम्राट
कॉम्प्लेक्स बेसमैंट
बस
स्टैंड ,
सीहोर
- 46601 (म प्र )
फ़ोन
:07562405545,
07562695918
E-mail: shivna.prakashan@gmail.com
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी
daalee mogare keemeree nazar men
-kalpanaa raamaanee
shaayar "neeraj gosvaamee"
goonthakar
bhaawon bharaa ik haar, ‘daalee mogare kee’
aaee
mere haath men saakaar, ‘daalee mogare kee’
jod
khushiyaan,
chod
gam,
anuraag-may
aanchal lapete
saamane
jaise khadee ik naar, ‘daalee mogare kee’
shabd
gaagar, bhaaw saagar, kaaphiye-baharen
nawelee
hai
anokhaa shilpamay sansaar, ‘daalee mogare kee’
haasy-put, shriingaar-ras, sanvedanaaen bhar
labaalab
sau
fasaane kah rahee fanakaar, ‘daalee mogare kee’
ye
naheen kewal kitaabee baat yaa jazbaat mitron
balki
anupam ‘kalpanaa’ upahaar ‘daalee mogare kee’
aaj
achaanak antarjaal par blॉg-jagat ke sarvaadhik lokapriy shaayaron men shumaar ‘neeraj gosvaamee’ jee kaa gazal sangrah, ‘daalee mogare kee’ koriyar dvaaraa
upahaar svaroop paakar ek sukhad aashchary se man abhibhoot ho uthaa saath men kuch shabd ek purje par likhe hue the ki we mujhase parichit naheen
hain lekin meree do gazalen bhopaal se prakaashit patrikaa ‘garbhanaal’ men pढ़kar apanaa
sangrah mujhe bhejane se svayan ko rok naheen paae main svayan ko shaayaraa to maanatee hee naheen
kyonki main n to urdoo jaanatee hoon, n hee kabhee kisee charchaa yaa mushaayare men shaamil huee
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unakee hastalipi men paakar itanee prasannataa milee ki shabdon men bayaan karanaa sanbhaw naheen
yah mere lie kisee bhee naamee sammaan, puraskaar se kam naheen
pratiuttar men jab unako jnaat huaa ki main apane
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parichay kee mohataaj hotee hai? ek saath hee kitaab
ke anek panne palatatee aur pढ़tee gaee, svaad lekar pढ़ne ke lie anek sheron par nishaan lagaa
lie, aur sabase pahale jo
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kabhee kisee kitaab kee sameekshaa naheen likhee, n hee likh sakatee hoon yadyapi is kitaab par anek
jaane pahachaane naamee shaayaron/kawiyon/dvaaraa sameekshaaen aur paathakon kee pratikriyaaen qalamabaddh huee hain aur anek behatareen sher chinhit kie gae hain phir bhee apane udgaar prakat karane se meraa man bhee naheen
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saagar, kathy men saar, bhaashaa men prawaah, madhurataa, bahar-kaaphiyon men shilpagat komalataa, sahaj aur saral kahan aadi
har tarah ke shabd-rang neeraj
jee kee gazalon kee wisheshataa hai, isee kaaran kitaab ko baar-baar pढ़ne kee chaah paidaa hotee hai
zindagee ke haare palon ko jeetane kee raah dikhaate
hue sher, dil-dimaag kee mriit
shiraaon ko spandit kar jeene kee chaah jagaate hue sher, dhoomil konon men roshanee ke
chiraag jalaate hue sher, desh-dashaa ko chintaatur kuch kar gujarane ko ukasaate hue sher, aise hee naheen kahe jaa sakate kewal shaayar man hee jaanataa hai jab bhaaw-bhoomi
ke kan-kan ko kalejaa nichodakar seenchaa jaataa hai
tabhee gazal roopee paudhaa pallawit, pushpit hokar apanee mahak bikherane men kaamayaab hotaa hai
aajakal desh w samaaj men wyaapt samarthon ke sitam, nirbalon par atyaachaar, avyawasthaaen, wishamataaen aadi dekhakar
koee bhee kalamakaar chain se naheen baith sakataa gazal widhaa men har tarah kee baat aasaanee se kahee jaa sakatee hai saath hee antar kee anant gaharaaiyon men utarakar, prakriiti se ekaakaar
hokar hee aisaa sriijan kiyaa jaa sakataa hai
saar yah ki yah kitaab har tarah se paathakon ko sammohit
karane men saksham hai gazal ke shaukeenon ke lie yah kitaab ek anamol khazaanaa saabit hogee, aisaa meraa wishvaas hai
kuch apanee pasand ke sher neeche de rahee hoon, jinhen pढ़kar aap bhee unheen bhaawon ke saath ekaakaar hokar aanandit ho uthenge
gazalon ke is sugandhit guladaste ke lie neeraj jee ko haardik badhaaee w anant shubhakaamanaaen aashaa hai we aise hee chirakaal tak apanee lekhanee kee mahak bikherate hue naee peeढ़ee kaa maargadarshan karate rahenge
*chaahate hain lau lagaanaa, aap gar bhagawaan se
pyaar karanaa seekhiye, pahale harik insaan se
*dil se nikalee hai gazal, neeraj kabhee to dekhanaa
jhoomakar saaraa zamaanaa dil se isako gaaegaa
*apanee badahaalee men bhee mat musakuraanaa chodie
tyaagataa khushaboo kahaan hai, mogaraa sookhaa huaa
*tamannaa
thee guj़r jaataa,
galee
men yaar kee jeewan
hamen maaloom hee kab thaa yahaan
maranaa j़rooree hai
*jahaan
jaataa hoon main tujhako waheen maujood paataa hoon
agar likhanaa tujhe ho kh़t
teraa main kyaa pataa likkhoon
*kaun
sunataa hai 'neeraj' saral see g़j़l
kuch dhamaake karo to bajen
seetiyaan
*ho
kafaa hamase wo rote jaa rahe hain
aur ham rumaal hote jaa rahe
hain
*tum jise the kokh hee men maarane kee sochate
kal banengee wo sahaaraa dekh
lenaa bachchiyaan
*kushabuen
lekar hawaaen kud-b -kud aa jaaengee
khol kar dekho to ghar kee
band saaree khidakiyaan
*khauph
kaa khanjar jigar men jaise ho utaraa huaa
aaj kaa insaan hai kuch is tarah
sahamaa huaa
*haalat dekh ke tum, kahate karaab neeraj
tumane sudhaarane ko, bolo to kyaa kiyaa hai?
*har waqt wahaan sahame hue milate hain bachche
kilakaariyaan goonjen jahaan wo ghar naheen milate
*tay
kiyaa chalanaa judaa jab bheed़ se
har naj़r dekhaa, sawaalee ho gaee
*zindagee
bharapoor jeene ke lie
gam kushee men farq hee bekaar
hai
*jindagee
unakee maze se kat gaee
rang 'neeraj' isamen jo bharate rahe
*khidakiyon se jhaankanaa bekaar hai
baarishon men bheeg jaanaa seekhiye
*desh
ke haalaat badatar hain, sabhee ne ye kahaa
par naheen batalaa sakaa, koee bhee apanee
bhoomikaa
*kuch naheen detee hai ye
duniyaa kisee ko mupht men
neend lee badale men jisako reshamee bistar die
*rotiyon ke siwaa gareebon kaa
aur kuch bhee iram naheen hotaa
*karen jab paanv khud nartan, samajh lenaa ki holee hai
hiloren le rahaa ho man, samajh lenaa ki holee hai
*tarasatee jisake hon deedaar tak ko aapakee aankhen
use choone kaa aae kshan, samajh lenaa ki holee hai
*kaalaa kaloot aisaa, chip jaae raat men jo
phaagun men sun sakhee wo, lagataa piyaa gulaabee
*use baazaar ke rangon se rangane kee zaroorat kyaa
faqat choote hee mere jo, gulaabee hotaa jaataa hai
*huaa jo soch men booढ़aa, use phaagun sataataa hai
magar jo hai jawaan dil wo, sadaa holee manaataa hai
qitaab
"daalee mogare kee"
shaayar shree neeraj gosvaamee jee
prakaashak
…shiwanaa prakaashan
pee
see laib ,samraat
kॉmpleks besamaint
bas
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fon
:07562405545,
07562695918
e-mail: shivnprakashan@gmailcom
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
डाली मोगरे की...मेरी नज़र में
-कल्पना रामानी
शायर "नीरज गोस्वामी"
गूँथकर
भावों भरा इक हार, ‘डाली मोगरे की’
आई
मेरे हाथ में साकार, ‘डाली मोगरे की’
जोड़
खुशियाँ,
छोड़
गम,
अनुराग-मय
आँचल लपेटे
सामने
जैसे खड़ी इक नार, ‘डाली मोगरे की’
शब्द
गागर, भाव सागर, काफिये-बहरें
नवेली
है
अनोखा शिल्पमय संसार, ‘डाली मोगरे की’
हास्य-पुट, शृंगार-रस, संवेदनाएँ भर
लबालब
सौ
फ़साने कह रही फ़नकार, ‘डाली मोगरे की’
ये
नहीं केवल किताबी बात या जज़्बात मित्रों
बल्कि
अनुपम ‘कल्पना’ उपहार ‘डाली मोगरे की’
...
आज
अचानक अंतर्जाल पर ब्लॉग-जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय शायरों में शुमार ‘नीरज गोस्वामी’ जी का ग़ज़ल संग्रह, ‘डाली मोगरे की’ कोरियर द्वारा
उपहार स्वरूप पाकर एक सुखद आश्चर्य से मन अभिभूत हो उठा। साथ में कुछ शब्द एक पुर्जे पर लिखे हुए थे कि वे मुझसे परिचित नहीं
हैं लेकिन मेरी दो ग़ज़लें भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘गर्भनाल’ में पढ़कर अपना
संग्रह मुझे भेजने से स्वयं को रोक नहीं पाए। मैं स्वयं को शायरा तो मानती ही नहीं
क्योंकि मैं न तो उर्दू जानती हूँ, न ही कभी किसी चर्चा या मुशायरे में शामिल हुई
हूँ। किसी बहर आदि के नाम भी नहीं जानती, लेकिन उनका अपने लिए ‘बेहतरीन शायरा’ का सम्मान पूर्ण सम्बोधन
उनकी हस्तलिपि में पाकर इतनी प्रसन्नता मिली कि शब्दों में बयान करना संभव नहीं।
यह मेरे लिए किसी भी नामी सम्मान, पुरस्कार से कम नहीं।
प्रतिउत्तर में जब उनको ज्ञात हुआ कि मैं अपने
सीखने के दौर में उनको सालों से पढ़ती आई हूँ और उनकी ग़ज़लों की मन से प्रशंसक हूँ तो
उनको भी कम आश्चर्य नहीं हुआ। भला बताइये, मोगरे की महक भी किसी
परिचय की मोहताज होती है? एक साथ ही किताब
के अनेक पन्ने पलटती और पढ़ती गई, स्वाद लेकर पढ़ने के लिए अनेक शेरों पर निशान लगा
लिए, और सबसे पहले जो
भाव मन में आए उन्हें ग़ज़ल रूप में ही उसी समय कागज़ पर उतार लिया, वो आप ऊपर पढ़ ही चुके होंगे।
मैंने
कभी किसी किताब की समीक्षा नहीं लिखी, न ही लिख सकती हूँ। यद्यपि इस किताब पर अनेक
जाने पहचाने नामी शायरों/कवियों/द्वारा समीक्षाएँ और पाठकों की प्रतिक्रियाएँ क़लमबद्ध हुई हैं और अनेक बेहतरीन शेर चिन्हित किए गए हैं फिर भी अपने उद्गार प्रकट करने से मेरा मन भी नहीं
माना।
कहीं पर्वों का उल्लास, कहीं प्रेम-रस भरा मधुमास, कहीं हास-परिहास, तो कहीं बच्चों सी मासूमियत, पढ़ते पढ़ते मन-पाखी उड़कर अलग-अलग डाली की महक को समेटने कल्पनालोक में विचरने लगता है। भावों में संवेदनाओं का
सागर, कथ्य में सार, भाषा में प्रवाह, मधुरता, बहर-काफियों में शिल्पगत कोमलता, सहज और सरल कहन आदि
हर तरह के शब्द-रंग नीरज
जी की ग़ज़लों की विशेषता है, इसी कारण किताब को बार-बार पढ़ने की चाह पैदा होती है।
ज़िंदगी के हारे पलों को जीतने की राह दिखाते
हुए शेर, दिल-दिमाग की मृत
शिराओं को स्पंदित कर जीने की चाह जगाते हुए शेर, धूमिल कोनों में रोशनी के
चिराग जलाते हुए शेर, देश-दशा को चिंतातुर कुछ कर गुजरने को उकसाते हुए शेर, ऐसे ही नहीं कहे जा सकते। केवल शायर मन ही जानता है जब भाव-भूमि
के कण-कण को कलेजा निचोड़कर सींचा जाता है
तभी ग़ज़ल रूपी पौधा पल्लवित, पुष्पित होकर अपनी महक बिखेरने में कामयाब होता है।
आजकल देश व समाज में व्याप्त समर्थों के सितम, निर्बलों पर अत्याचार, अव्यवस्थाएँ, विषमताएँ आदि देखकर
कोई भी कलमकार चैन से नहीं बैठ सकता। ग़ज़ल विधा में हर तरह की बात आसानी से कही जा सकती है। साथ ही अंतर की अनंत गहराइयों में उतरकर, प्रकृति से एकाकार
होकर ही ऐसा सृजन किया जा सकता है।
सार यह कि यह किताब हर तरह से पाठकों को सम्मोहित
करने में सक्षम है। ग़ज़ल के शौकीनों के लिए यह किताब एक अनमोल खज़ाना साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
कुछ अपनी पसंद के शेर नीचे दे रही हूँ, जिन्हें पढ़कर आप भी उन्हीं भावों के साथ एकाकार होकर आनंदित हो उठेंगे।
ग़ज़लों के इस सुगंधित गुलदस्ते के लिए नीरज जी को हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएँ। आशा है वे ऐसे ही चिरकाल तक अपनी लेखनी की महक बिखेरते हुए नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
*चाहते हैं लौ लगाना, आप गर भगवान से
प्यार करना सीखिये, पहले हरिक इंसान से
*दिल से निकली है ग़ज़ल, नीरज कभी तो देखना
झूमकर सारा ज़माना दिल से इसको गाएगा
*अपनी बदहाली में भी मत मुसकुराना छोड़िए
त्यागता खुशबू कहाँ है, मोगरा सूखा हुआ
*तमन्ना
थी गुज़र जाता,
गली
में यार की जीवन
हमें मालूम ही कब था यहाँ
मरना ज़रूरी है
*जहाँ
जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ
अगर लिखना तुझे हो ख़त
तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ
*कौन
सुनता है 'नीरज' सरल सी ग़ज़ल
कुछ धमाके करो तो बजें
सीटियाँ
*हो
ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रुमाल होते जा रहे
हैं
*तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते
कल बनेंगी वो सहारा देख
लेना बच्चियाँ
*ख़ुशबुएँ
लेकर हवाएँ ख़ुद-ब -ख़ुद आ जाएँगी
खोल कर देखो तो घर की
बंद सारी खिड़कियाँ
*खौफ
का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आज का इंसान है कुछ इस तरह
सहमा हुआ
*हालत देख के तुम, कहते ख़राब नीरज
तुमने सुधारने को, बोलो तो क्या किया है?
*हर वक़्त वहाँ सहमे हुए मिलते हैं बच्चे
किलकारियाँ गूँजें जहाँ वो घर नहीं मिलते
*तय
किया चलना जुदा जब भीड़ से
हर नज़र देखा, सवाली हो गई
*ज़िन्दगी
भरपूर जीने के लिए
ग़म ख़ुशी में फ़र्क़ ही बेकार
है
*जिंदगी
उनकी मज़े से कट गई
रंग 'नीरज' इसमें जो भरते रहे
*खिड़कियों से झाँकना बेकार है
बारिशों में भीग जाना सीखिये
*देश
के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा
पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी
भूमिका
*कुछ नहीं देती है ये
दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
*रोटियों के सिवा गरीबों का
और कुछ भी इरम नहीं होता
*करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है
*तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आँखें
उसे छूने का आए क्षण, समझ लेना कि होली है
*काला कलूट ऐसा, छिप जाए रात में जो
फागुन में सुन सखी वो, लगता पिया गुलाबी
*उसे बाज़ार के रंगों से रँगने की ज़रूरत क्या
फ़क़त छूते ही मेरे जो, गुलाबी होता जाता है
*हुआ जो सोच में बूढ़ा, उसे फागुन सताता है
मगर जो है जवाँ दिल वो, सदा होली मनाता है
क़िताब
"डाली मोगरे की".....
शायर श्री नीरज गोस्वामी जी
प्रकाशक
..…शिवना प्रकाशन
पी
सी लैब ,सम्राट
कॉम्प्लेक्स बेसमैंट
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सीहोर
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07562695918
E-mail: shivna.prakashan@gmail.com
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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