कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १९६ / २०५ № 196 of 205 रचना १९६ / २०५
१० नवम्बर २०२० 10 November 2020 १० नवम्बर २०२०

डरने लगी है ज़िन्दगी darane lagee hai zindagee डरने लगी है ज़िन्दगी

सांध्य-सूरज की तरह

ढलने लगी है ज़िंदगी।

थाम वैसाखी   सफर

करने लगी है ज़िंदगी।

॥

हर कदम हर वक्त  इक

रफ्तार के रथ पर चली

उम्र की इस शाम में

थमने लगी है ज़िंदगी।

॥

फूल बन खिलती रही जो

बालपन के बाग में

शूल बनकर अब वही

चुभने लगी है ज़िंदगी।

॥

जो ठहाकों से हिलाती

थी दरो दीवार को

मूक हो सदियों से यों

लगने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल धधकती ज्वाल थी

अब शेष हैं चिंगारियाँ

धीरे-धीरे राख बन

बुझने लगी है ज़िंदगी।

॥

ख्वाब बन आती रही

रातों को गहरी नींद में

लेकिन अब ख्वाबों से ही

मिटने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल अडिग चट्टान थी

टुकड़े हुई अब टूटकर

पास आती मौत से

डरने लगी है ज़िंदगी।

॥

- कल्पना रामानी

saandhy-sooraj kee tarah

dhalane lagee hai zindagee

thaam waisaakhee saphar

karane lagee hai zindagee

·

har kadam har wakt ik

raphtaar ke rath par chalee

umr kee is shaam men

thamane lagee hai zindagee

·

phool ban khilatee rahee jo

baalapan ke baag men

shool banakar ab wahee

chubhane lagee hai zindagee

·

jo thahaakon se hilaatee

thee daro deewaar ko

mook ho sadiyon se yon

lagane lagee hai zindagee

·

kal dhadhakatee jvaal thee

ab shesh hain chingaariyaan

dheere-dheere raakh ban

bujhane lagee hai zindagee

·

khvaab ban aatee rahee

raaton ko gaharee neend men

lekin ab khvaabon se hee

mitane lagee hai zindagee

·

kal adig chattaan thee

tukade huee ab tootakar

paas aatee maut se

darane lagee hai zindagee

·

- kalpanaa raamaanee

सांध्य-सूरज की तरह

ढलने लगी है ज़िंदगी।

थाम वैसाखी   सफर

करने लगी है ज़िंदगी।

॥

हर कदम हर वक्त  इक

रफ्तार के रथ पर चली

उम्र की इस शाम में

थमने लगी है ज़िंदगी।

॥

फूल बन खिलती रही जो

बालपन के बाग में

शूल बनकर अब वही

चुभने लगी है ज़िंदगी।

॥

जो ठहाकों से हिलाती

थी दरो दीवार को

मूक हो सदियों से यों

लगने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल धधकती ज्वाल थी

अब शेष हैं चिंगारियाँ

धीरे-धीरे राख बन

बुझने लगी है ज़िंदगी।

॥

ख्वाब बन आती रही

रातों को गहरी नींद में

लेकिन अब ख्वाबों से ही

मिटने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल अडिग चट्टान थी

टुकड़े हुई अब टूटकर

पास आती मौत से

डरने लगी है ज़िंदगी।

॥

- कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗