कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०४ / ११४ № 104 of 114 रचना १०४ / ११४
११ नवम्बर २०२० 11 November 2020 ११ नवम्बर २०२०

ससुराल नहीं जाऊंगी 7 sasuraal naheen jaaoongee 7 ससुराल नहीं जाऊंगी 7

भाग 7

देखते ही देखते शुभदा के ६ महीने किसी सर्प की तरह सरसराते हुए सरक गए. अब उसे अपने कार्य की फ़ाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी. अलग-अलग इलाकों का दौरा करते हुए उसे अच्छे-बुरे, हर तरह के अनुभव से दो चार होना पड़ा. कहीं सहयोग के स्वर होते तो कहीं विरोधी विचारों का सामना भी करना पड़ा लेकिन साथ में पुलिस वर्दीधारी महिला के कारण किसी अप्रिय स्थिति से नहीं गुजरना पड़ा.

उसने परामर्श केंद्र में आ चुके लगभग सभी विचाराधीन केसों का निरीक्षण करके

निष्कर्ष निकाला कि अगर सास अधेड़ और रौबदार हुई तो बहू पर हावी होकर उसका जीना मुश्किल कर देती है परिणाम स्वरूप बहू लड़ाई झगडा करके अलग होकर ही मानती है. भला युवा और ऊर्जावान बहू यह अन्याय क्यों सहन करेगी और जब आज उसे कानून ने इतने अधिकार दिए हैं तो वो सीधे पुलिस-स्टेशन या अदालत का ही रुख करती है. पति के दबाव के कारण उस समय तो परामर्श केंद्र में वो समझौता स्वीकार कर लेती है मगर कुछ समय बाद ही इसका असर समाप्त होने लगता है फलस्वरूप बेटे की दिमागी ऊर्जा अदालतों के चक्कर में और सच झूठ का विश्लेषण करने में खर्च होने लगती है. इससे कमाई पर तो असर पड़ता ही है, घर भी उसे दुःख का आगार नज़र आने लगता है और उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है.

इसके विपरीत जहाँ अकेले और उम्रदराज सास-ससुर अपनी संचित जमापूँजी पुत्र को सौंपकर उनपर निर्भर हो गए थे, वहाँ वे अपने ही घर में नर्क से भी बदतर स्थिति का सामना करने को मजबूर थे क्योंकि घर की बात बाहर जाने से बेटे की बदनामी का डर बना रहता था, साथ ही उनके कारण होने वाले बेटे-बहू के आपसी झगडे और गृह-कलह की स्थिति की संभावना से बचने के लिए वे अपना मुँह बंद रखकर जैसे-तैसे अपनी उम्र काट रहे थे. बहू/बहुएँ जब और जैसा चाहे रोटी का टुकड़ा परोस देतीं और पति के सामने इस तरह व्यवहार करतीं जैसे उन जैसी बहू कोई नहीं.

शुभदा को रिपोर्ट के साथ अपने विचार और समस्या के समाधान पर भी अपनी राय लिखित रूप में देनी थी, उसने उस कालम में लिखा-

“प्राचीनकाल में पुरुष-प्रधान समाज ने औरत की किस्मत में अनगिनत काले अध्यायों के साथ नारी को नारी की ही गुलामी करने का यह अध्याय भी जोड़ दिया होगा, जिसे संस्कार और परंपरा का बाना पहनाकर उसका परिपालन नारी के लिए अनिवार्य बना दिया गया. उस समय की अशिक्षित और पुरुषों पर पूर्ण रूप से आश्रित नारी तो बेमन से यह व्यवस्था स्वीकार करने को मजबूर थी. हालाँकि मनमुटाव और अलगाव के स्वर भी साथ होते ही थे.  मगर आज औरत की स्थिति काफी बदल चुकी है और उसे बहू रूप में औरत की ही गुलामी करने से स्वतंत्र करना ही होगा, ताकि भविष्य में औरत की स्वाधीनता का दुश्मन यह नर-समाज यह न कह सके कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है,”

शुभदा और उसके ससुर वर्मा जी के कार्यालय का परिसर एक ही होने से शुभदा अक्सर उनके केबिन में चर्चा और अपने कार्य का ब्यौरा प्रस्तुत करके सलाह मशविरे के लिए जाती ही रहती थी. वो अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट भी उनको दिखाने उनके केबिन में पहुँची तो उनके एक विधायक मित्र की जिनसे उसकी मुलाकात गृह-प्रवेश के समय हो चुकी थी, वहाँ उपस्थिति से आश्चर्य में पड़ गई क्योंकि वहाँ केवल परामर्श हेतु कोर्ट-केस ही आते थे. फिर भी वो अपनी फ़ाइल वहाँ टेबल पर

रखकर वापस बाहर जाने लगी तो वर्मा जी ने उसे बुलाकर कहा-

“बेटी, कमलकांत जी मुझसे मित्रवत ही मुझसे अपनी समस्या पर विमर्श के लिए आये हैं, इनसे संकोच करने की आवश्यकता नहीं है. इनके बेटे का विवाह तय हो चुका है और ये भी अपने बेटे-बहू  के लिए विवाह बाद पृथक रहने की व्यवस्था करना चाहते हैं मगर भाभीजी की ज़िद्द के कारण परेशान हैं.”

वर्मा जी की बात सुनकर शुभदा कुर्सी खींचकर वहीँ बैठ गई और अपनी फ़ाइल वर्मा जी के आगे करके कहा-

“पिताजी, मेरी ट्रेनिंग का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, यह मेरे दौरों की फ़ाइनल रिपोर्ट है.”

वर्मा जी ने फ़ाइल खोलकर पन्ने पलटे और पढ़ते-पढ़ते उनकी मुख मुद्रा गंभीर होती गई. फिर उन्होंने शुभदा के विचार वाले कालम को पेन्सिल से हाईलाईट करके कमलकांत जी को पढ़ने का आग्रह किया. कमलकांत जी पढ़कर विचाराधीन मुद्रा में आ गए फिर कुछ पल सोचकर बोले-

“मुझे लगता है यह समस्या इतनी आसानी से सुलझने वाली नहीं है. अब तो नया कानून ही इसका एकमात्र हल हो सकता है. विधानसभा के आगामी चुनाव नजदीक ही हैं, अगर शुभदा बेटी हमारे दल में शामिल हो जाए तो मैं विधायक पद के लिए उसे टिकट दिला सकता हूँ. ऐसी ऊर्जावान और प्रतिभाशाली महिला हमारे दल में कोई नहीं है. मुझे विश्वास है कि इस मुद्दे पर चुनाव लड़ने से ये पूर्ण बहुमत से विजयी हो सकती है.”

“मैं आपके विचारों का दिल से सम्मान करती हूँ अंकल जी, मैं औरत को रूढ़ियों के दलदल से बाहर निकालना तो चाहती हूँ मगर इसके लिए राजनीति के दलदल में फँसना मुझे स्वीकार नहीं है. हाँ मैं आपकी पार्टी के समर्थन में प्रचार कार्य संभाल सकती हूँ. मैं अपने इस पद पर रहते हुए भी जन सेवा हित अपना सफ़र जारी रखूँगी.” शुभदा ने वर्मा जी की सवाली निगाहें अपनी और उठी देखकर स्वयं ही नम्रतापूर्वक उत्तर दिया.

मगर बेटी, राजनीति सबके लिए दलदल नहीं होती और सभी पदाधिकारी धन-लोलुप नहीं होते, यहाँ सच्चे और ईमानदार जन-सेवक भी मौजूद हैं. लेकिन अधिकार मिलने से कर्म की राहें आसान  अवश्य हो जाती हैं. समाज को बदलना आसान काम नहीं है. चुनाव तो कोई भी लड़ सकता है मगर तुम्हारा  उद्देश्य जन सेवा होने से पद का सदुपयोग होगा और तुम्हें कोई परेशानी भी नहीं होगी. मेरा पूरा सहयोग और मार्गदर्शन तुम्हें मिलता रहेगा. एक बार मेरी बात पर आराम से विचार अवश्य करना." कमलकांत जी ने उठकर जाने का उपक्रम करते हुए कहा.

उनके जाते ही वर्मा जी ने शुभदा से कहा-

“बेटी, कमलकांत जी नेक इंसान हैं. मैं इन्हें लम्बे समय से जानता हूँ. उनका प्रस्ताव तुम्हारी बेहतरी के लिए है. पद और नाम के अलावा काम भी आसान होता जाएगा. आगे मन न करे तो यह क्षेत्र छोड़ा भी जा सकता है. फिर भी तुम प्रभात से मशविरा करके अपना निर्णय ले सकती हो.”

“ठीक है पिताजी अगर आप भी यही चाहते हैं तो मैं आज ही प्रभात से इस बारे में मशविरा करूंगी.”

शाम को प्रभात उसे लेने आया तो रास्ते में ही उसने बताया कि उसे कंपनी की तरफ से एक सप्ताह के दौरे पर अन्यत्र भेजा जा रहा है. शुभदा अकेली न रहकर अपने मायके अथवा ससुराल में रहकर भी कार्यालय आना जाना कर सकती है. उसी रात शुभदा ने भी कार्यालय में हुई चर्चा विस्तार से प्रभात के साथ साझा करके इस बारे में उसका विचार जानना चाहा. प्रभात ने कहा-

“मेरी तरफ से तुम्हें पूरी स्वतंत्रता है शुभि डियर, तुम्हारा जो भी निर्णय होगा, मुझे स्वीकार है. बस पद मिलते ही अपने दिलबर से दूरी मत बना लेना.” उसे बाँहों में कसते हुए प्रभात ने कहा.

और अगली सुबह का सूरज  शुभदा के लिए पुनः एक नए दौर के शुभारम्भ के साथ उदित होकर आया. उसने अपना पदभार पूरी तरह ग्रहण करने से पहले ही त्यागने और फिर एक नए दौर में ढलने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया.

क्रमशः...

bhaag 7

·

dekhate hee dekhate shubhadaa ke 6 maheene kisee sarp kee tarah sarasaraate hue sarak gae ab use apane kaary kee faainal riport prastut karanee thee alag-alag ilaakon kaa dauraa karate hue use achche-bure, har tarah ke anubhaw se do chaar honaa padaa kaheen sahayog ke svar hote to kaheen wirodhee wichaaron kaa saamanaa bhee karanaa padaa lekin saath men pulis wardeedhaaree mahilaa ke kaaran kisee apriy sthiti se naheen gujaranaa padaa

·

usane paraamarsh kendr men aa chuke lagabhag sabhee wichaaraadheen keson kaa nireekshan karake

nishkarsh nikaalaa ki agar saas adhed aur raubadaar huee to bahoo par haawee hokar usakaa jeenaa mushkil kar detee hai parinaam svaroop bahoo ladaaee jhagadaa karake alag hokar hee maanatee hai bhalaa yuwaa aur oorjaawaan bahoo yah anyaay kyon sahan karegee aur jab aaj use kaanoon ne itane adhikaar die hain to wo seedhe pulis-steshan yaa adaalat kaa hee rukh karatee hai pati ke dabaaw ke kaaran us samay to paraamarsh kendr men wo samajhautaa sveekaar kar letee hai magar kuch samay baad hee isakaa asar samaapt hone lagataa hai phalasvaroop bete kee dimaagee oorjaa adaalaton ke chakkar men aur sach jhooth kaa wishleshan karane men kharch hone lagatee hai isase kamaaee par to asar padataa hee hai, ghar bhee use duhkh kaa aagaar nazar aane lagataa hai aur usakaa svabhaaw chidachidaa ho jaataa hai

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shubhadaa ko riport ke saath apane wichaar aur samasyaa ke samaadhaan par bhee apanee raay likhit roop men denee thee, usane us kaalam men likhaa-

“praacheenakaal men purush-pradhaan samaaj ne aurat kee kismat men anaginat kaale adhyaayon ke saath naaree ko naaree kee hee gulaamee karane kaa yah adhyaay bhee jod diyaa hogaa, jise sanskaar aur paranparaa kaa baanaa pahanaakar usakaa paripaalan naaree ke lie aniwaary banaa diyaa gayaa us samay kee ashikshit aur purushon par poorn roop se aashrit naaree to beman se yah wyawasthaa sveekaar karane ko majaboor thee haalaanki manamutaaw aur alagaaw ke svar bhee saath hote hee the magar aaj aurat kee sthiti kaaphee badal chukee hai aur use bahoo roop men aurat kee hee gulaamee karane se svatantr karanaa hee hogaa, taaki bhawishy men aurat kee svaadheenataa kaa dushman yah nar-samaaj yah n kah sake ki aurat hee aurat kee dushman hotee hai,”

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shubhadaa aur usake sasur warmaa jee ke kaaryaalay kaa parisar ek hee hone se shubhadaa aksar unake kebin men charchaa aur apane kaary kaa byauraa prastut karake salaah mashawire ke lie jaatee hee rahatee thee wo apanee faainal riport bhee unako dikhaane unake kebin men pahunchee to unake ek widhaayak mitr kee jinase usakee mulaakaat griih-prawesh ke samay ho chukee thee, wahaan upasthiti se aashchary men pad gaee kyonki wahaan kewal paraamarsh hetu kort-kes hee aate the phir bhee wo apanee faail wahaan tebal par

rakhakar waapas baahar jaane lagee to warmaa jee ne use bulaakar kahaa-

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“betee, kamalakaant jee mujhase mitrawat hee mujhase apanee samasyaa par wimarsh ke lie aaye hain, inase sankoch karane kee aawashyakataa naheen hai inake bete kaa wiwaah tay ho chukaa hai aur ye bhee apane bete-bahoo ke lie wiwaah baad priithak rahane kee wyawasthaa karanaa chaahate hain magar bhaabheejee kee zidd ke kaaran pareshaan hain”

warmaa jee kee baat sunakar shubhadaa kursee kheenchakar waheen baith gaee aur apanee faail warmaa jee ke aage karake kahaa-

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“meree taraph se tumhen pooree svatantrataa hai shubhi diyar, tumhaaraa jo bhee nirnay hogaa, mujhe sveekaar hai bas pad milate hee apane dilabar se dooree mat banaa lenaa” use baanhon men kasate hue prabhaat ne kahaa

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aur agalee subah kaa sooraj shubhadaa ke lie punah ek nae daur ke shubhaarambh ke saath udit hokar aayaa usane apanaa padabhaar pooree tarah grahan karane se pahale hee tyaagane aur phir ek nae daur men dhalane ke lie svayan ko taiyaar kar liyaa

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kramashah

भाग 7

देखते ही देखते शुभदा के ६ महीने किसी सर्प की तरह सरसराते हुए सरक गए. अब उसे अपने कार्य की फ़ाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी. अलग-अलग इलाकों का दौरा करते हुए उसे अच्छे-बुरे, हर तरह के अनुभव से दो चार होना पड़ा. कहीं सहयोग के स्वर होते तो कहीं विरोधी विचारों का सामना भी करना पड़ा लेकिन साथ में पुलिस वर्दीधारी महिला के कारण किसी अप्रिय स्थिति से नहीं गुजरना पड़ा.

उसने परामर्श केंद्र में आ चुके लगभग सभी विचाराधीन केसों का निरीक्षण करके

निष्कर्ष निकाला कि अगर सास अधेड़ और रौबदार हुई तो बहू पर हावी होकर उसका जीना मुश्किल कर देती है परिणाम स्वरूप बहू लड़ाई झगडा करके अलग होकर ही मानती है. भला युवा और ऊर्जावान बहू यह अन्याय क्यों सहन करेगी और जब आज उसे कानून ने इतने अधिकार दिए हैं तो वो सीधे पुलिस-स्टेशन या अदालत का ही रुख करती है. पति के दबाव के कारण उस समय तो परामर्श केंद्र में वो समझौता स्वीकार कर लेती है मगर कुछ समय बाद ही इसका असर समाप्त होने लगता है फलस्वरूप बेटे की दिमागी ऊर्जा अदालतों के चक्कर में और सच झूठ का विश्लेषण करने में खर्च होने लगती है. इससे कमाई पर तो असर पड़ता ही है, घर भी उसे दुःख का आगार नज़र आने लगता है और उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है.

इसके विपरीत जहाँ अकेले और उम्रदराज सास-ससुर अपनी संचित जमापूँजी पुत्र को सौंपकर उनपर निर्भर हो गए थे, वहाँ वे अपने ही घर में नर्क से भी बदतर स्थिति का सामना करने को मजबूर थे क्योंकि घर की बात बाहर जाने से बेटे की बदनामी का डर बना रहता था, साथ ही उनके कारण होने वाले बेटे-बहू के आपसी झगडे और गृह-कलह की स्थिति की संभावना से बचने के लिए वे अपना मुँह बंद रखकर जैसे-तैसे अपनी उम्र काट रहे थे. बहू/बहुएँ जब और जैसा चाहे रोटी का टुकड़ा परोस देतीं और पति के सामने इस तरह व्यवहार करतीं जैसे उन जैसी बहू कोई नहीं.

शुभदा को रिपोर्ट के साथ अपने विचार और समस्या के समाधान पर भी अपनी राय लिखित रूप में देनी थी, उसने उस कालम में लिखा-

“प्राचीनकाल में पुरुष-प्रधान समाज ने औरत की किस्मत में अनगिनत काले अध्यायों के साथ नारी को नारी की ही गुलामी करने का यह अध्याय भी जोड़ दिया होगा, जिसे संस्कार और परंपरा का बाना पहनाकर उसका परिपालन नारी के लिए अनिवार्य बना दिया गया. उस समय की अशिक्षित और पुरुषों पर पूर्ण रूप से आश्रित नारी तो बेमन से यह व्यवस्था स्वीकार करने को मजबूर थी. हालाँकि मनमुटाव और अलगाव के स्वर भी साथ होते ही थे.  मगर आज औरत की स्थिति काफी बदल चुकी है और उसे बहू रूप में औरत की ही गुलामी करने से स्वतंत्र करना ही होगा, ताकि भविष्य में औरत की स्वाधीनता का दुश्मन यह नर-समाज यह न कह सके कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है,”

शुभदा और उसके ससुर वर्मा जी के कार्यालय का परिसर एक ही होने से शुभदा अक्सर उनके केबिन में चर्चा और अपने कार्य का ब्यौरा प्रस्तुत करके सलाह मशविरे के लिए जाती ही रहती थी. वो अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट भी उनको दिखाने उनके केबिन में पहुँची तो उनके एक विधायक मित्र की जिनसे उसकी मुलाकात गृह-प्रवेश के समय हो चुकी थी, वहाँ उपस्थिति से आश्चर्य में पड़ गई क्योंकि वहाँ केवल परामर्श हेतु कोर्ट-केस ही आते थे. फिर भी वो अपनी फ़ाइल वहाँ टेबल पर

रखकर वापस बाहर जाने लगी तो वर्मा जी ने उसे बुलाकर कहा-

“बेटी, कमलकांत जी मुझसे मित्रवत ही मुझसे अपनी समस्या पर विमर्श के लिए आये हैं, इनसे संकोच करने की आवश्यकता नहीं है. इनके बेटे का विवाह तय हो चुका है और ये भी अपने बेटे-बहू  के लिए विवाह बाद पृथक रहने की व्यवस्था करना चाहते हैं मगर भाभीजी की ज़िद्द के कारण परेशान हैं.”

वर्मा जी की बात सुनकर शुभदा कुर्सी खींचकर वहीँ बैठ गई और अपनी फ़ाइल वर्मा जी के आगे करके कहा-

“पिताजी, मेरी ट्रेनिंग का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, यह मेरे दौरों की फ़ाइनल रिपोर्ट है.”

वर्मा जी ने फ़ाइल खोलकर पन्ने पलटे और पढ़ते-पढ़ते उनकी मुख मुद्रा गंभीर होती गई. फिर उन्होंने शुभदा के विचार वाले कालम को पेन्सिल से हाईलाईट करके कमलकांत जी को पढ़ने का आग्रह किया. कमलकांत जी पढ़कर विचाराधीन मुद्रा में आ गए फिर कुछ पल सोचकर बोले-

“मुझे लगता है यह समस्या इतनी आसानी से सुलझने वाली नहीं है. अब तो नया कानून ही इसका एकमात्र हल हो सकता है. विधानसभा के आगामी चुनाव नजदीक ही हैं, अगर शुभदा बेटी हमारे दल में शामिल हो जाए तो मैं विधायक पद के लिए उसे टिकट दिला सकता हूँ. ऐसी ऊर्जावान और प्रतिभाशाली महिला हमारे दल में कोई नहीं है. मुझे विश्वास है कि इस मुद्दे पर चुनाव लड़ने से ये पूर्ण बहुमत से विजयी हो सकती है.”

“मैं आपके विचारों का दिल से सम्मान करती हूँ अंकल जी, मैं औरत को रूढ़ियों के दलदल से बाहर निकालना तो चाहती हूँ मगर इसके लिए राजनीति के दलदल में फँसना मुझे स्वीकार नहीं है. हाँ मैं आपकी पार्टी के समर्थन में प्रचार कार्य संभाल सकती हूँ. मैं अपने इस पद पर रहते हुए भी जन सेवा हित अपना सफ़र जारी रखूँगी.” शुभदा ने वर्मा जी की सवाली निगाहें अपनी और उठी देखकर स्वयं ही नम्रतापूर्वक उत्तर दिया.

मगर बेटी, राजनीति सबके लिए दलदल नहीं होती और सभी पदाधिकारी धन-लोलुप नहीं होते, यहाँ सच्चे और ईमानदार जन-सेवक भी मौजूद हैं. लेकिन अधिकार मिलने से कर्म की राहें आसान  अवश्य हो जाती हैं. समाज को बदलना आसान काम नहीं है. चुनाव तो कोई भी लड़ सकता है मगर तुम्हारा  उद्देश्य जन सेवा होने से पद का सदुपयोग होगा और तुम्हें कोई परेशानी भी नहीं होगी. मेरा पूरा सहयोग और मार्गदर्शन तुम्हें मिलता रहेगा. एक बार मेरी बात पर आराम से विचार अवश्य करना." कमलकांत जी ने उठकर जाने का उपक्रम करते हुए कहा.

उनके जाते ही वर्मा जी ने शुभदा से कहा-

“बेटी, कमलकांत जी नेक इंसान हैं. मैं इन्हें लम्बे समय से जानता हूँ. उनका प्रस्ताव तुम्हारी बेहतरी के लिए है. पद और नाम के अलावा काम भी आसान होता जाएगा. आगे मन न करे तो यह क्षेत्र छोड़ा भी जा सकता है. फिर भी तुम प्रभात से मशविरा करके अपना निर्णय ले सकती हो.”

“ठीक है पिताजी अगर आप भी यही चाहते हैं तो मैं आज ही प्रभात से इस बारे में मशविरा करूंगी.”

शाम को प्रभात उसे लेने आया तो रास्ते में ही उसने बताया कि उसे कंपनी की तरफ से एक सप्ताह के दौरे पर अन्यत्र भेजा जा रहा है. शुभदा अकेली न रहकर अपने मायके अथवा ससुराल में रहकर भी कार्यालय आना जाना कर सकती है. उसी रात शुभदा ने भी कार्यालय में हुई चर्चा विस्तार से प्रभात के साथ साझा करके इस बारे में उसका विचार जानना चाहा. प्रभात ने कहा-

“मेरी तरफ से तुम्हें पूरी स्वतंत्रता है शुभि डियर, तुम्हारा जो भी निर्णय होगा, मुझे स्वीकार है. बस पद मिलते ही अपने दिलबर से दूरी मत बना लेना.” उसे बाँहों में कसते हुए प्रभात ने कहा.

और अगली सुबह का सूरज  शुभदा के लिए पुनः एक नए दौर के शुभारम्भ के साथ उदित होकर आया. उसने अपना पदभार पूरी तरह ग्रहण करने से पहले ही त्यागने और फिर एक नए दौर में ढलने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया.

क्रमशः...

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗