नम हवा फुलवारियों की nam hawaa phulawaariyon kee नम हवा फुलवारियों की
नम हवा फुलवारियों की
खूब भाती है मुझे।
नित्य नव जीवन भरी
कविता सुनाती है मुझे।
रात को जब नींद में
सपने सुनाते लोरियाँ
प्रात प्यारी शबनमी
आकर जगाती है मुझे।
लाल सूरज जब समंदर
में उतरता शाम को
तब क्षितिज की स्वर्ण सी
आभा लुभाती है मुझे
रूप जब विकराल होता
गर्मियों में धूप का
नीम की ठंडी हवा
झूला झुलाती है मुझे।
सावनी बरसात की
आँगन में लगती जब झड़ी
नाव कागज़ की वो भूली
याद आती है मुझे।
शीत जब परवान चढ़ती
काँपता थर-थर बदन
धूप अपनी गोद में
हँसकर बिठाती है मुझे।
प्रकृति के हर अंश में है
वंश जीवन का छिपा
‘कल्पना’ हर ऋतु परी
जीना सिखाती है मुझे।
- कल्पना रामानी
nam hawaa phulawaariyon kee
khoob bhaatee hai mujhe
nity naw jeewan bharee
kawitaa sunaatee hai mujhe
raat ko jab neend men
sapane sunaate loriyaan
praat pyaaree shabanamee
aakar jagaatee hai mujhe
laal sooraj jab samandar
men utarataa shaam ko
tab kshitij kee svarn see
aabhaa lubhaatee hai mujhe
roop jab wikaraal hotaa
garmiyon men dhoop kaa
neem kee thandee hawaa
jhoolaa jhulaatee hai mujhe
saawanee barasaat kee
aangan men lagatee jab jhadee
naaw kaagaz kee wo bhoolee
yaad aatee hai mujhe
sheet jab parawaan chढ़tee
kaanpataa thar-thar badan
dhoop apanee god men
hansakar bithaatee hai mujhe
prakriiti ke har ansh men hai
wansh jeewan kaa chipaa
‘kalpanaa’ har riitu paree
jeenaa sikhaatee hai mujhe
- kalpanaa raamaanee
नम हवा फुलवारियों की
खूब भाती है मुझे।
नित्य नव जीवन भरी
कविता सुनाती है मुझे।
रात को जब नींद में
सपने सुनाते लोरियाँ
प्रात प्यारी शबनमी
आकर जगाती है मुझे।
लाल सूरज जब समंदर
में उतरता शाम को
तब क्षितिज की स्वर्ण सी
आभा लुभाती है मुझे
रूप जब विकराल होता
गर्मियों में धूप का
नीम की ठंडी हवा
झूला झुलाती है मुझे।
सावनी बरसात की
आँगन में लगती जब झड़ी
नाव कागज़ की वो भूली
याद आती है मुझे।
शीत जब परवान चढ़ती
काँपता थर-थर बदन
धूप अपनी गोद में
हँसकर बिठाती है मुझे।
प्रकृति के हर अंश में है
वंश जीवन का छिपा
‘कल्पना’ हर ऋतु परी
जीना सिखाती है मुझे।
- कल्पना रामानी