कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १९४ / २०४ № 194 of 204 रचना १९४ / २०४
९ नवम्बर २०२० 9 November 2020 ९ नवम्बर २०२०

नम हवा फुलवारियों की nam hawaa phulawaariyon kee नम हवा फुलवारियों की

नम हवा फुलवारियों की

खूब भाती है मुझे।

नित्य नव जीवन भरी

कविता सुनाती है मुझे।

रात को जब नींद में

सपने सुनाते लोरियाँ

प्रात प्यारी शबनमी

आकर जगाती है मुझे।

लाल सूरज जब समंदर

में उतरता शाम को

तब क्षितिज की स्वर्ण सी

आभा लुभाती है मुझे

रूप जब विकराल होता

गर्मियों में धूप का

नीम की ठंडी हवा

झूला झुलाती है मुझे।

सावनी बरसात की

आँगन में लगती जब झड़ी

नाव कागज़ की वो भूली

याद आती है मुझे।

शीत जब परवान चढ़ती

काँपता थर-थर बदन

धूप अपनी गोद में

हँसकर बिठाती है मुझे।

प्रकृति के हर अंश में है

वंश जीवन का छिपा

‘कल्पना’ हर ऋतु परी

जीना सिखाती है मुझे।

- कल्पना रामानी

nam hawaa phulawaariyon kee

khoob bhaatee hai mujhe

nity naw jeewan bharee

kawitaa sunaatee hai mujhe

·

raat ko jab neend men

sapane sunaate loriyaan

praat pyaaree shabanamee

aakar jagaatee hai mujhe

·

laal sooraj jab samandar

men utarataa shaam ko

tab kshitij kee svarn see

aabhaa lubhaatee hai mujhe

·

roop jab wikaraal hotaa

garmiyon men dhoop kaa

neem kee thandee hawaa

jhoolaa jhulaatee hai mujhe

·

saawanee barasaat kee

aangan men lagatee jab jhadee

naaw kaagaz kee wo bhoolee

yaad aatee hai mujhe

·

sheet jab parawaan chढ़tee

kaanpataa thar-thar badan

dhoop apanee god men

hansakar bithaatee hai mujhe

·

prakriiti ke har ansh men hai

wansh jeewan kaa chipaa

‘kalpanaa’ har riitu paree

jeenaa sikhaatee hai mujhe

·

- kalpanaa raamaanee

नम हवा फुलवारियों की

खूब भाती है मुझे।

नित्य नव जीवन भरी

कविता सुनाती है मुझे।

रात को जब नींद में

सपने सुनाते लोरियाँ

प्रात प्यारी शबनमी

आकर जगाती है मुझे।

लाल सूरज जब समंदर

में उतरता शाम को

तब क्षितिज की स्वर्ण सी

आभा लुभाती है मुझे

रूप जब विकराल होता

गर्मियों में धूप का

नीम की ठंडी हवा

झूला झुलाती है मुझे।

सावनी बरसात की

आँगन में लगती जब झड़ी

नाव कागज़ की वो भूली

याद आती है मुझे।

शीत जब परवान चढ़ती

काँपता थर-थर बदन

धूप अपनी गोद में

हँसकर बिठाती है मुझे।

प्रकृति के हर अंश में है

वंश जीवन का छिपा

‘कल्पना’ हर ऋतु परी

जीना सिखाती है मुझे।

- कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗