कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १९५ / २०५ № 195 of 205 रचना १९५ / २०५
९ नवम्बर २०२० 9 November 2020 ९ नवम्बर २०२०

नम हवा फुलवारियों की nam hawaa phulawaariyon kee नम हवा फुलवारियों की

नम हवा फुलवारियों की

खूब भाती है मुझे।

नित्य नव जीवन भरी

कविता सुनाती है मुझे।

॥

रात को जब नींद में

सपने सुनाते लोरियाँ

प्रात प्यारी शबनमी

आकर जगाती है मुझे।

॥

लाल सूरज जब समंदर

में उतरता शाम को

तब क्षितिज की स्वर्ण सी

आभा लुभाती है मुझे

॥

रूप जब विकराल होता

गर्मियों में धूप का

नीम की ठंडी हवा

झूला झुलाती है मुझे।

॥

सावनी बरसात की

आँगन में लगती जब झड़ी

नाव कागज़ की वो भूली

याद आती है मुझे।

॥

शीत जब परवान चढ़ती

काँपता थर-थर बदन

धूप अपनी गोद में

हँसकर बिठाती है मुझे।

॥

प्रकृति के हर अंश में है

वंश जीवन का छिपा

‘कल्पना’ हर ऋतु परी

जीना सिखाती है मुझे।

॥

- कल्पना रामानी

nam hawaa phulawaariyon kee

khoob bhaatee hai mujhe

nity naw jeewan bharee

kawitaa sunaatee hai mujhe

·

raat ko jab neend men

sapane sunaate loriyaan

praat pyaaree shabanamee

aakar jagaatee hai mujhe

·

laal sooraj jab samandar

men utarataa shaam ko

tab kshitij kee svarn see

aabhaa lubhaatee hai mujhe

·

roop jab wikaraal hotaa

garmiyon men dhoop kaa

neem kee thandee hawaa

jhoolaa jhulaatee hai mujhe

·

saawanee barasaat kee

aangan men lagatee jab jhadee

naaw kaagaz kee wo bhoolee

yaad aatee hai mujhe

·

sheet jab parawaan chढ़tee

kaanpataa thar-thar badan

dhoop apanee god men

hansakar bithaatee hai mujhe

·

prakriiti ke har ansh men hai

wansh jeewan kaa chipaa

‘kalpanaa’ har riitu paree

jeenaa sikhaatee hai mujhe

·

- kalpanaa raamaanee

नम हवा फुलवारियों की

खूब भाती है मुझे।

नित्य नव जीवन भरी

कविता सुनाती है मुझे।

॥

रात को जब नींद में

सपने सुनाते लोरियाँ

प्रात प्यारी शबनमी

आकर जगाती है मुझे।

॥

लाल सूरज जब समंदर

में उतरता शाम को

तब क्षितिज की स्वर्ण सी

आभा लुभाती है मुझे

॥

रूप जब विकराल होता

गर्मियों में धूप का

नीम की ठंडी हवा

झूला झुलाती है मुझे।

॥

सावनी बरसात की

आँगन में लगती जब झड़ी

नाव कागज़ की वो भूली

याद आती है मुझे।

॥

शीत जब परवान चढ़ती

काँपता थर-थर बदन

धूप अपनी गोद में

हँसकर बिठाती है मुझे।

॥

प्रकृति के हर अंश में है

वंश जीवन का छिपा

‘कल्पना’ हर ऋतु परी

जीना सिखाती है मुझे।

॥

- कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗