कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १६२ / २०४ № 162 of 204 रचना १६२ / २०४
५ नवम्बर २०१९ 5 November 2019 ५ नवम्बर २०१९

एक रोटी के लिए ek rotee ke lie एक रोटी के लिए

रात दिन जो एक करते

एक रोटी के लिए।

क्यों भला वे ही तरसते

एक रोटी के लिए।

अन्न दाता देश के ये

हल चलाते हैं सदा।

फिर भी गिरवी खेत रखते

एक रोटी के लिए।

है लहू सस्ता मगर

महँगी बहुत हैं रोटियाँ।

पेट कटते अंग बिकते

एक रोटी के लिए।

जो गए सपने सजाकर

गाँव के राजा शहर।

बन कुली सिर बोझ धरते

एक रोटी के लिए।

दीन बचपन रोटियों को

गर्द में है ढूँढता।

गर्द पर ही दिन गुजरते

एक रोटी के लिए।

पूछते हैं लोग उनसे

क्यों नहीं अक्षर पढ़ा।

भूख से जो गीत गढ़ते

एक रोटी के लिए।

आज यदि हावी न होती

भूख अपने देश पर।

लोग क्यों परदेस बसते

एक रोटी के लिए।

raat din jo ek karate

ek rotee ke lie

kyon bhalaa we hee tarasate

ek rotee ke lie

·

ann daataa desh ke ye

hal chalaate hain sadaa

phir bhee girawee khet rakhate

ek rotee ke lie

·

hai lahoo sastaa magar

mahangee bahut hain rotiyaan

pet katate ang bikate

ek rotee ke lie

·

jo gae sapane sajaakar

gaanv ke raajaa shahar

ban kulee sir bojh dharate

ek rotee ke lie

·

deen bachapan rotiyon ko

gard men hai dhoondhataa

gard par hee din gujarate

ek rotee ke lie

·

poochate hain log unase

kyon naheen akshar pढ़aa

bhookh se jo geet gढ़te

ek rotee ke lie

·

aaj yadi haawee n hotee

bhookh apane desh par

log kyon parades basate

ek rotee ke lie

रात दिन जो एक करते

एक रोटी के लिए।

क्यों भला वे ही तरसते

एक रोटी के लिए।

अन्न दाता देश के ये

हल चलाते हैं सदा।

फिर भी गिरवी खेत रखते

एक रोटी के लिए।

है लहू सस्ता मगर

महँगी बहुत हैं रोटियाँ।

पेट कटते अंग बिकते

एक रोटी के लिए।

जो गए सपने सजाकर

गाँव के राजा शहर।

बन कुली सिर बोझ धरते

एक रोटी के लिए।

दीन बचपन रोटियों को

गर्द में है ढूँढता।

गर्द पर ही दिन गुजरते

एक रोटी के लिए।

पूछते हैं लोग उनसे

क्यों नहीं अक्षर पढ़ा।

भूख से जो गीत गढ़ते

एक रोटी के लिए।

आज यदि हावी न होती

भूख अपने देश पर।

लोग क्यों परदेस बसते

एक रोटी के लिए।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗