एक रोटी के लिए ek rotee ke lie एक रोटी के लिए
रात दिन जो एक करते
एक रोटी के लिए।
क्यों भला वे ही तरसते
एक रोटी के लिए।
अन्न दाता देश के ये
हल चलाते हैं सदा।
फिर भी गिरवी खेत रखते
एक रोटी के लिए।
है लहू सस्ता मगर
महँगी बहुत हैं रोटियाँ।
पेट कटते अंग बिकते
एक रोटी के लिए।
जो गए सपने सजाकर
गाँव के राजा शहर।
बन कुली सिर बोझ धरते
एक रोटी के लिए।
दीन बचपन रोटियों को
गर्द में है ढूँढता।
गर्द पर ही दिन गुजरते
एक रोटी के लिए।
पूछते हैं लोग उनसे
क्यों नहीं अक्षर पढ़ा।
भूख से जो गीत गढ़ते
एक रोटी के लिए।
आज यदि हावी न होती
भूख अपने देश पर।
लोग क्यों परदेस बसते
एक रोटी के लिए।
raat din jo ek karate
ek rotee ke lie
kyon bhalaa we hee tarasate
ek rotee ke lie
ann daataa desh ke ye
hal chalaate hain sadaa
phir bhee girawee khet rakhate
ek rotee ke lie
hai lahoo sastaa magar
mahangee bahut hain rotiyaan
pet katate ang bikate
ek rotee ke lie
jo gae sapane sajaakar
gaanv ke raajaa shahar
ban kulee sir bojh dharate
ek rotee ke lie
deen bachapan rotiyon ko
gard men hai dhoondhataa
gard par hee din gujarate
ek rotee ke lie
poochate hain log unase
kyon naheen akshar pढ़aa
bhookh se jo geet gढ़te
ek rotee ke lie
aaj yadi haawee n hotee
bhookh apane desh par
log kyon parades basate
ek rotee ke lie
रात दिन जो एक करते
एक रोटी के लिए।
क्यों भला वे ही तरसते
एक रोटी के लिए।
अन्न दाता देश के ये
हल चलाते हैं सदा।
फिर भी गिरवी खेत रखते
एक रोटी के लिए।
है लहू सस्ता मगर
महँगी बहुत हैं रोटियाँ।
पेट कटते अंग बिकते
एक रोटी के लिए।
जो गए सपने सजाकर
गाँव के राजा शहर।
बन कुली सिर बोझ धरते
एक रोटी के लिए।
दीन बचपन रोटियों को
गर्द में है ढूँढता।
गर्द पर ही दिन गुजरते
एक रोटी के लिए।
पूछते हैं लोग उनसे
क्यों नहीं अक्षर पढ़ा।
भूख से जो गीत गढ़ते
एक रोटी के लिए।
आज यदि हावी न होती
भूख अपने देश पर।
लोग क्यों परदेस बसते
एक रोटी के लिए।