गर्व-गौरव सिन्धु, हिन्दी garv-gauraw sindhu, hindee गर्व-गौरव सिन्धु, हिन्दी
गंध-माटी
में बसी, माँ भारती की शान है।
गर्व-गौरव
सिंधु हिन्दी, देश की पहचान है।
भाव, रस,
छंदों से है, परिपूर्ण हिन्दी का सदन
जिसपे
भारतवासियों को सर्वदा अभिमान है।
थामती
ये हाथ हर भाषा का है कितनी उदार!
मान
हिन्दी का किया जिसने, लिया सम्मान है।
गैर
आए, बैर आए, टिक न पाए पैर पर
मात
खा हर घात ने, वापस किया प्रस्थान है।
छद्म-छल
क़ाबिज़ हुए, जड़ खोदने को बार-बार
पर
मिटे हिन्दी की हस्ती, यह नहीं आसान है।
बेल
अमर हिन्दी की ये,
बढ़ती रहेगी युग-युगों
कंटकों
को काट जो, चढ़ती रही परवान है।
चाहती
साहित्य-सरिता, हक़ से अपना पूर्ण हक़
हर
दिशा में ज्यों बहे, हिन्दी का ये अरमान है।
गौण
हैं अपने वतन में, किसलिए हिन्दी के गुण?
जबकि
इसका विश्व सारा, कर रहा गुणगान है।
जागते
रहना है ज्यों मुरझा न जाए फिर चमन
‘कल्पना’ हिन्दी से ही गुलज़ार हिंदुस्तान है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
gandh-maatee
men basee, maan bhaaratee kee shaan hai
garv-gauraw
sindhu hindee, desh kee pahachaan hai
bhaaw, ras,
chandon se hai, paripoorn hindee kaa sadan
jisape
bhaaratawaasiyon ko sarvadaa abhimaan hai
thaamatee
ye haath har bhaashaa kaa hai kitanee udaar!
maan
hindee kaa kiyaa jisane, liyaa sammaan hai
gair
aae, bair aae, tik n paae pair par
maat
khaa har ghaat ne, waapas kiyaa prasthaan hai
chadm-chal
qaabiz hue, jad khodane ko baar-baar
par
mite hindee kee hastee, yah naheen aasaan hai
bel
amar hindee kee ye,
bढ़tee rahegee yug-yugon
kantakon
ko kaat jo, chढ़tee rahee parawaan hai
chaahatee
saahity-saritaa, haq se apanaa poorn haq
har
dishaa men jyon bahe, hindee kaa ye aramaan hai
gaun
hain apane watan men, kisalie hindee ke gun?
jabaki
isakaa wishv saaraa, kar rahaa gunagaan hai
jaagate
rahanaa hai jyon murajhaa n jaae phir chaman
‘kalpanaa’ hindee se hee gulazaar hindustaan hai
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
गंध-माटी
में बसी, माँ भारती की शान है।
गर्व-गौरव
सिंधु हिन्दी, देश की पहचान है।
भाव, रस,
छंदों से है, परिपूर्ण हिन्दी का सदन
जिसपे
भारतवासियों को सर्वदा अभिमान है।
थामती
ये हाथ हर भाषा का है कितनी उदार!
मान
हिन्दी का किया जिसने, लिया सम्मान है।
गैर
आए, बैर आए, टिक न पाए पैर पर
मात
खा हर घात ने, वापस किया प्रस्थान है।
छद्म-छल
क़ाबिज़ हुए, जड़ खोदने को बार-बार
पर
मिटे हिन्दी की हस्ती, यह नहीं आसान है।
बेल
अमर हिन्दी की ये,
बढ़ती रहेगी युग-युगों
कंटकों
को काट जो, चढ़ती रही परवान है।
चाहती
साहित्य-सरिता, हक़ से अपना पूर्ण हक़
हर
दिशा में ज्यों बहे, हिन्दी का ये अरमान है।
गौण
हैं अपने वतन में, किसलिए हिन्दी के गुण?
जबकि
इसका विश्व सारा, कर रहा गुणगान है।
जागते
रहना है ज्यों मुरझा न जाए फिर चमन
‘कल्पना’ हिन्दी से ही गुलज़ार हिंदुस्तान है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी