कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ५९ / २०४ № 59 of 204 रचना ५९ / २०४
३० अक्तूबर २०१४ 30 October 2014 ३० अक्तूबर २०१४

हम सेवा मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए ham sewaa mukt hote hee kyaa-kyaa n ban gae हम सेवा मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए

हम

सेवा-मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए।

अपने

ही घर के द्वार के दरबान बन गए।

पूँजी

लुटा दी प्यार में,

कल तक जुटाई जो,

कोने

में अब पड़े हुए सामान बन गए।

बरगद

थे छाँव वाले कि वे आँधियाँ चलीं

छोड़ा

जड़ों ने साथ यों,

बेजान बन गए।

सोचा

तो था कि दोस्त सभी होंगे आस-पास

पर

जानते थे जो, वे भी अंजान बन गए।

होके

पराया चल दिया, अपना ही साया भी,

तन्हाइयों

में घुल चुकी, पहचान बन गए।

मझधार

से तो जूझके आए थे हम मगर,

सीने

को तान, तीर पे तूफान बन गए।

मन

में तो है सवाल ये भी ‘कल्पना’ अहम

हम

जानते हुए भी क्यों, नादान बन गए।

--कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

ham

sewaa-mukt hote hee kyaa-kyaa n ban gae

·

apane

hee ghar ke dvaar ke darabaan ban gae

·

poonjee

lutaa dee pyaar men,

kal tak jutaaee jo,

·

kone

men ab pade hue saamaan ban gae

·

baragad

the chaanv waale ki we aandhiyaan chaleen

·

chodaa

jadon ne saath yon,

bejaan ban gae

·

sochaa

to thaa ki dost sabhee honge aas-paas

·

par

jaanate the jo, we bhee anjaan ban gae

·

hoke

paraayaa chal diyaa, apanaa hee saayaa bhee,

·

tanhaaiyon

men ghul chukee, pahachaan ban gae

·

majhadhaar

se to joojhake aae the ham magar,

·

seene

ko taan, teer pe toophaan ban gae

·

man

men to hai sawaal ye bhee ‘kalpanaa’ aham

·

ham

jaanate hue bhee kyon, naadaan ban gae

·

--kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हम

सेवा-मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए।

अपने

ही घर के द्वार के दरबान बन गए।

पूँजी

लुटा दी प्यार में,

कल तक जुटाई जो,

कोने

में अब पड़े हुए सामान बन गए।

बरगद

थे छाँव वाले कि वे आँधियाँ चलीं

छोड़ा

जड़ों ने साथ यों,

बेजान बन गए।

सोचा

तो था कि दोस्त सभी होंगे आस-पास

पर

जानते थे जो, वे भी अंजान बन गए।

होके

पराया चल दिया, अपना ही साया भी,

तन्हाइयों

में घुल चुकी, पहचान बन गए।

मझधार

से तो जूझके आए थे हम मगर,

सीने

को तान, तीर पे तूफान बन गए।

मन

में तो है सवाल ये भी ‘कल्पना’ अहम

हम

जानते हुए भी क्यों, नादान बन गए।

--कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗