कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६० / २०५ № 60 of 205 रचना ६० / २०५
३० अक्तूबर २०१४ 30 October 2014 ३० अक्तूबर २०१४

हम सेवा मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए ham sewaa mukt hote hee kyaa-kyaa n ban gae हम सेवा मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए

हम

सेवा-मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए।

॥

अपने

ही घर के द्वार के दरबान बन गए।

॥

पूँजी

लुटा दी प्यार में,

कल तक जुटाई जो,

॥

कोने

में अब पड़े हुए सामान बन गए।

॥

बरगद

थे छाँव वाले कि वे आँधियाँ चलीं

॥

छोड़ा

जड़ों ने साथ यों,

बेजान बन गए।

॥

सोचा

तो था कि दोस्त सभी होंगे आस-पास

॥

पर

जानते थे जो, वे भी अंजान बन गए।

॥

होके

पराया चल दिया, अपना ही साया भी,

॥

तन्हाइयों

में घुल चुकी, पहचान बन गए।

॥

मझधार

से तो जूझके आए थे हम मगर,

॥

सीने

को तान, तीर पे तूफान बन गए।

॥

मन

में तो है सवाल ये भी ‘कल्पना’ अहम

॥

हम

जानते हुए भी क्यों, नादान बन गए।

॥

--कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

ham

sewaa-mukt hote hee kyaa-kyaa n ban gae

·

apane

hee ghar ke dvaar ke darabaan ban gae

·

poonjee

lutaa dee pyaar men,

kal tak jutaaee jo,

·

kone

men ab pade hue saamaan ban gae

·

baragad

the chaanv waale ki we aandhiyaan chaleen

·

chodaa

jadon ne saath yon,

bejaan ban gae

·

sochaa

to thaa ki dost sabhee honge aas-paas

·

par

jaanate the jo, we bhee anjaan ban gae

·

hoke

paraayaa chal diyaa, apanaa hee saayaa bhee,

·

tanhaaiyon

men ghul chukee, pahachaan ban gae

·

majhadhaar

se to joojhake aae the ham magar,

·

seene

ko taan, teer pe toophaan ban gae

·

man

men to hai sawaal ye bhee ‘kalpanaa’ aham

·

ham

jaanate hue bhee kyon, naadaan ban gae

·

--kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हम

सेवा-मुक्त होते ही क्या-क्या न बन गए।

॥

अपने

ही घर के द्वार के दरबान बन गए।

॥

पूँजी

लुटा दी प्यार में,

कल तक जुटाई जो,

॥

कोने

में अब पड़े हुए सामान बन गए।

॥

बरगद

थे छाँव वाले कि वे आँधियाँ चलीं

॥

छोड़ा

जड़ों ने साथ यों,

बेजान बन गए।

॥

सोचा

तो था कि दोस्त सभी होंगे आस-पास

॥

पर

जानते थे जो, वे भी अंजान बन गए।

॥

होके

पराया चल दिया, अपना ही साया भी,

॥

तन्हाइयों

में घुल चुकी, पहचान बन गए।

॥

मझधार

से तो जूझके आए थे हम मगर,

॥

सीने

को तान, तीर पे तूफान बन गए।

॥

मन

में तो है सवाल ये भी ‘कल्पना’ अहम

॥

हम

जानते हुए भी क्यों, नादान बन गए।

॥

--कल्पना रामानी

॥

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗