कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६० / २०४ № 60 of 204 रचना ६० / २०४
६ नवम्बर २०१४ 6 November 2014 ६ नवम्बर २०१४

मंज़िलें आगे खड़ी हैं manzilen aage khadee hain मंज़िलें आगे खड़ी हैं

मंज़िलें आगे खड़ी हैं, चल पड़ें, रुकना नहीं।

मुश्किलों के खौफ से, पीछे हटें अच्छा नहीं।

राह जो बाधा बने, उस पर विजय पुल बाँध लें

जो इरादों पर अटल है, वो कभी हारा नहीं।

धन गया, साथी गए, सब दूर अपने भी हुए

दृढ़ इरादे साथ हैं तो, जान कुछ खोया नहीं।

कोसते हैं भाग्य को जो, कर्म से मुँह मोड़कर

फल की चाहत किसलिए, जब बीज ही बोया नहीं।

व्यर्थ पिंजर में पड़े जो, पर कटे पंछी बने

क्यों मिले आकाश जब, उड़ना कभी चाहा नहीं।

ज़िक्र उसका अंजुमन में, किस तरह होगा भला

जब गजल का व्याकरण ही, आज तक सीखा नहीं।

ज़िंदगी का राज़ क्या है, क्या करेंगे जानकर

क्यों मिला मानुष जनम जब, “कल्पना” जाना नहीं।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

manzilen aage khadee hain, chal paden, rukanaa naheen

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mushkilon ke khauph se, peeche haten achchaa naheen

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raah jo baadhaa bane, us par wijay pul baandh len

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jo iraadon par atal hai, wo kabhee haaraa naheen

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dhan gayaa, saathee gae, sab door apane bhee hue

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driiढ़ iraade saath hain to, jaan kuch khoyaa naheen

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kosate hain bhaagy ko jo, karm se munh modakar

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phal kee chaahat kisalie, jab beej hee boyaa naheen

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wyarth pinjar men pade jo, par kate panchee bane

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kyon mile aakaash jab, udanaa kabhee chaahaa naheen

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zikr usakaa anjuman men, kis tarah hogaa bhalaa

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jab gajal kaa wyaakaran hee, aaj tak seekhaa naheen

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zindagee kaa raaz kyaa hai, kyaa karenge jaanakar

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kyon milaa maanush janam jab, “kalpanaa” jaanaa naheen

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-kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

मंज़िलें आगे खड़ी हैं, चल पड़ें, रुकना नहीं।

मुश्किलों के खौफ से, पीछे हटें अच्छा नहीं।

राह जो बाधा बने, उस पर विजय पुल बाँध लें

जो इरादों पर अटल है, वो कभी हारा नहीं।

धन गया, साथी गए, सब दूर अपने भी हुए

दृढ़ इरादे साथ हैं तो, जान कुछ खोया नहीं।

कोसते हैं भाग्य को जो, कर्म से मुँह मोड़कर

फल की चाहत किसलिए, जब बीज ही बोया नहीं।

व्यर्थ पिंजर में पड़े जो, पर कटे पंछी बने

क्यों मिले आकाश जब, उड़ना कभी चाहा नहीं।

ज़िक्र उसका अंजुमन में, किस तरह होगा भला

जब गजल का व्याकरण ही, आज तक सीखा नहीं।

ज़िंदगी का राज़ क्या है, क्या करेंगे जानकर

क्यों मिला मानुष जनम जब, “कल्पना” जाना नहीं।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗