मंज़िलें आगे खड़ी हैं manzilen aage khadee hain मंज़िलें आगे खड़ी हैं
मंज़िलें आगे खड़ी हैं, चल पड़ें, रुकना नहीं।
मुश्किलों के खौफ से, पीछे हटें अच्छा नहीं।
राह जो बाधा बने, उस पर विजय पुल बाँध लें
जो इरादों पर अटल है, वो कभी हारा नहीं।
धन गया, साथी गए, सब दूर अपने भी हुए
दृढ़ इरादे साथ हैं तो, जान कुछ खोया नहीं।
कोसते हैं भाग्य को जो, कर्म से मुँह मोड़कर
फल की चाहत किसलिए, जब बीज ही बोया नहीं।
व्यर्थ पिंजर में पड़े जो, पर कटे पंछी बने
क्यों मिले आकाश जब, उड़ना कभी चाहा नहीं।
ज़िक्र उसका अंजुमन में, किस तरह होगा भला
जब गजल का व्याकरण ही, आज तक सीखा नहीं।
ज़िंदगी का राज़ क्या है, क्या करेंगे जानकर
क्यों मिला मानुष जनम जब, “कल्पना” जाना नहीं।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
manzilen aage khadee hain, chal paden, rukanaa naheen
mushkilon ke khauph se, peeche haten achchaa naheen
raah jo baadhaa bane, us par wijay pul baandh len
jo iraadon par atal hai, wo kabhee haaraa naheen
dhan gayaa, saathee gae, sab door apane bhee hue
driiढ़ iraade saath hain to, jaan kuch khoyaa naheen
kosate hain bhaagy ko jo, karm se munh modakar
phal kee chaahat kisalie, jab beej hee boyaa naheen
wyarth pinjar men pade jo, par kate panchee bane
kyon mile aakaash jab, udanaa kabhee chaahaa naheen
zikr usakaa anjuman men, kis tarah hogaa bhalaa
jab gajal kaa wyaakaran hee, aaj tak seekhaa naheen
zindagee kaa raaz kyaa hai, kyaa karenge jaanakar
kyon milaa maanush janam jab, “kalpanaa” jaanaa naheen
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
मंज़िलें आगे खड़ी हैं, चल पड़ें, रुकना नहीं।
मुश्किलों के खौफ से, पीछे हटें अच्छा नहीं।
राह जो बाधा बने, उस पर विजय पुल बाँध लें
जो इरादों पर अटल है, वो कभी हारा नहीं।
धन गया, साथी गए, सब दूर अपने भी हुए
दृढ़ इरादे साथ हैं तो, जान कुछ खोया नहीं।
कोसते हैं भाग्य को जो, कर्म से मुँह मोड़कर
फल की चाहत किसलिए, जब बीज ही बोया नहीं।
व्यर्थ पिंजर में पड़े जो, पर कटे पंछी बने
क्यों मिले आकाश जब, उड़ना कभी चाहा नहीं।
ज़िक्र उसका अंजुमन में, किस तरह होगा भला
जब गजल का व्याकरण ही, आज तक सीखा नहीं।
ज़िंदगी का राज़ क्या है, क्या करेंगे जानकर
क्यों मिला मानुष जनम जब, “कल्पना” जाना नहीं।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी