कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १६३ / २०४ № 163 of 204 रचना १६३ / २०४
६ नवम्बर २०१९ 6 November 2019 ६ नवम्बर २०१९

इक जहाँ ऐसा भी हो ik jahaan aisaa bhee ho इक जहाँ ऐसा भी हो

मौज के मेले जहाँ हों

इक जहाँ ऐसा भी हो।

नेह बरसे बादलों से

आसमाँ, ऐसा भी हो।

हों नदी सागर उफनते

और निर्झर वेगमय

शक्त पर्वत उर्वरा भू

स्वर्ग हाँ, ऐसा भी हो।

पंछियों को डर न हो

वन जीव हों निर्भय सभी

क़ातिलों का ही क़तल हो

कुछ वहाँ, ऐसा भी हो।

एक गुलशन सा दिखे यह

देश फूलों से भरा

स्नेह से सींचे उसे इक

बागबाँ, ऐसा भी हो।

एकता की ले पताका

चल पड़ें लाखों क़दम

हर शहर हर गाँव गुज़रे

कारवाँ, ऐसा भी हो।

खुशनुमा जनतंत्र हो

सुख की बसी हों बस्तियाँ

साथ अपने हों सदा, हर

आशियाँ, ऐसा भी हो।

थाम कर में लेखनी

लिखते रहें नित छंद जन

‘कल्पना’ इतिहास को

कुछ दें निशां, ऐसा भी हो।

mauj ke mele jahaan hon

ik jahaan aisaa bhee ho

neh barase baadalon se

aasamaan, aisaa bhee ho

·

hon nadee saagar uphanate

aur nirjhar wegamay

shakt parvat urvaraa bhoo

svarg haan, aisaa bhee ho

·

panchiyon ko dar n ho

wan jeew hon nirbhay sabhee

qaatilon kaa hee qatal ho

kuch wahaan, aisaa bhee ho

·

ek gulashan saa dikhe yah

desh phoolon se bharaa

sneh se seenche use ik

baagabaan, aisaa bhee ho

·

ekataa kee le pataakaa

chal paden laakhon qadam

har shahar har gaanv guzare

kaarawaan, aisaa bhee ho

·

khushanumaa janatantr ho

sukh kee basee hon bastiyaan

saath apane hon sadaa, har

aashiyaan, aisaa bhee ho

·

thaam kar men lekhanee

likhate rahen nit chand jan

‘kalpanaa’ itihaas ko

kuch den nishaan, aisaa bhee ho

मौज के मेले जहाँ हों

इक जहाँ ऐसा भी हो।

नेह बरसे बादलों से

आसमाँ, ऐसा भी हो।

हों नदी सागर उफनते

और निर्झर वेगमय

शक्त पर्वत उर्वरा भू

स्वर्ग हाँ, ऐसा भी हो।

पंछियों को डर न हो

वन जीव हों निर्भय सभी

क़ातिलों का ही क़तल हो

कुछ वहाँ, ऐसा भी हो।

एक गुलशन सा दिखे यह

देश फूलों से भरा

स्नेह से सींचे उसे इक

बागबाँ, ऐसा भी हो।

एकता की ले पताका

चल पड़ें लाखों क़दम

हर शहर हर गाँव गुज़रे

कारवाँ, ऐसा भी हो।

खुशनुमा जनतंत्र हो

सुख की बसी हों बस्तियाँ

साथ अपने हों सदा, हर

आशियाँ, ऐसा भी हो।

थाम कर में लेखनी

लिखते रहें नित छंद जन

‘कल्पना’ इतिहास को

कुछ दें निशां, ऐसा भी हो।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗