कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १६७ / २०४ № 167 of 204 रचना १६७ / २०४
९ नवम्बर २०१९ 9 November 2019 ९ नवम्बर २०१९

ख़ुशबू से महकाओ मन kushaboo se mahakaao man ख़ुशबू से महकाओ मन

खुशबू से महकाओ मन, बागों की तरहा।

रंगों से भर दो जीवन, फूलों की तरहा।

कभी न बनकर बाँध, रोकना बहती धारा

सतत प्रवाहित रहो धार-नदियों की तरहा।

कितना प्यार जगत में, देखो थोड़ा नमकर

अकड़न, ऐंठन छोड़, फलित डालों की तरहा।

ऋतुएँ रूठें, करो न ऐसी खल करतूतें

रौंद रहे क्यों भू को, यमदूतों की तरहा।

किया प्रदूषण अब तक अर्पित नीर-पवन को

बनो चमन मन! हरो दोष, पेड़ों की तरहा।

अँधियारों को राह दिखाओ जुगनू बनकर

उजियारों से तम काटो तारों की तरहा।

बोल लबों से कभी न फूटें अंगारे बन

मित्र! चहकते रहो सदा चिड़ियों की तरहा।

बात पुरानी कहने का अंदाज़ नया हो

ज्यों महफिल तुमको गाए, गज़लों की तरहा।

मनुष बनाकर तुम्हें ईश ने भू पर भेजा

कर्म “कल्पना” फिर क्यों हों पशुओं की तरहा।

khushaboo se mahakaao man, baagon kee tarahaa

rangon se bhar do jeewan, phoolon kee tarahaa

·

kabhee n banakar baandh, rokanaa bahatee dhaaraa

satat prawaahit raho dhaar-nadiyon kee tarahaa

·

kitanaa pyaar jagat men, dekho thodaa namakar

akadan, ainthan chod, phalit daalon kee tarahaa

·

riituen roothen, karo n aisee khal karatooten

raund rahe kyon bhoo ko, yamadooton kee tarahaa

·

kiyaa pradooshan ab tak arpit neer-pawan ko

bano chaman man! haro dosh, pedon kee tarahaa

·

andhiyaaron ko raah dikhaao juganoo banakar

ujiyaaron se tam kaato taaron kee tarahaa

·

bol labon se kabhee n phooten angaare ban

mitr! chahakate raho sadaa chidiyon kee tarahaa

·

baat puraanee kahane kaa andaaz nayaa ho

jyon mahaphil tumako gaae, gazalon kee tarahaa

·

manush banaakar tumhen eesh ne bhoo par bhejaa

karm “kalpanaa” phir kyon hon pashuon kee tarahaa

खुशबू से महकाओ मन, बागों की तरहा।

रंगों से भर दो जीवन, फूलों की तरहा।

कभी न बनकर बाँध, रोकना बहती धारा

सतत प्रवाहित रहो धार-नदियों की तरहा।

कितना प्यार जगत में, देखो थोड़ा नमकर

अकड़न, ऐंठन छोड़, फलित डालों की तरहा।

ऋतुएँ रूठें, करो न ऐसी खल करतूतें

रौंद रहे क्यों भू को, यमदूतों की तरहा।

किया प्रदूषण अब तक अर्पित नीर-पवन को

बनो चमन मन! हरो दोष, पेड़ों की तरहा।

अँधियारों को राह दिखाओ जुगनू बनकर

उजियारों से तम काटो तारों की तरहा।

बोल लबों से कभी न फूटें अंगारे बन

मित्र! चहकते रहो सदा चिड़ियों की तरहा।

बात पुरानी कहने का अंदाज़ नया हो

ज्यों महफिल तुमको गाए, गज़लों की तरहा।

मनुष बनाकर तुम्हें ईश ने भू पर भेजा

कर्म “कल्पना” फिर क्यों हों पशुओं की तरहा।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗