कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १६६ / २०४ № 166 of 204 रचना १६६ / २०४
९ नवम्बर २०१९ 9 November 2019 ९ नवम्बर २०१९

कभी तो दिन वो आएगा kabhee to din wo aaegaa कभी तो दिन वो आएगा

कभी तो दिन वो आएगा

सभी के अपने घर होंगे।

मिलेंगी रोटियाँ सबको

न सपने दर-बदर होंगे।

मिलेंगे बाग खेतों से

न होगी बीच में खाई

पलायन गाँव छोड़ेंगे

सदय पालक शहर होंगे।

रखेंगे रास्ते पक्के

लगा सीने से गलियों को

बढ़ेंगे शुभ कदम जिस पथ

प्रगति के दर उधर होंगे।

जुड़ेगी धूप छाया से

विभाजन की मिटा रेखा।

चढ़ेंगे गाँव जब सीढ़ी

शहर भी हमसफर होंगे।

हवाएँ एक सी बहतीं

वही जल अन्न है सबका।

दिलों से दिल मिलेंगे

स्वाद भी साझे अगर होंगे।

जलेंगे दीप घर घर में

रहेगा पर्व हर मौसम।

पपीहे मोर गाएँगे

मधुर कोकिल के स्वर होंगे।

विफल हर चाल दुश्मन की

करेंगे देशप्रेमी सब।

हमारे दस्तखत जग के

फ़लक पर पुरअसर होंगे।

kabhee to din wo aaegaa

sabhee ke apane ghar honge

milengee rotiyaan sabako

n sapane dar-badar honge

·

milenge baag kheton se

n hogee beech men khaaee

palaayan gaanv chodenge

saday paalak shahar honge

·

rakhenge raaste pakke

lagaa seene se galiyon ko

bढ़enge shubh kadam jis path

pragati ke dar udhar honge

·

judegee dhoop chaayaa se

wibhaajan kee mitaa rekhaa

chढ़enge gaanv jab seeढ़ee

shahar bhee hamasaphar honge

·

hawaaen ek see bahateen

wahee jal ann hai sabakaa

dilon se dil milenge

svaad bhee saajhe agar honge

·

jalenge deep ghar ghar men

rahegaa parv har mausam

papeehe mor gaaenge

madhur kokil ke svar honge

·

wiphal har chaal dushman kee

karenge deshapremee sab

hamaare dastakhat jag ke

falak par puraasar honge

कभी तो दिन वो आएगा

सभी के अपने घर होंगे।

मिलेंगी रोटियाँ सबको

न सपने दर-बदर होंगे।

मिलेंगे बाग खेतों से

न होगी बीच में खाई

पलायन गाँव छोड़ेंगे

सदय पालक शहर होंगे।

रखेंगे रास्ते पक्के

लगा सीने से गलियों को

बढ़ेंगे शुभ कदम जिस पथ

प्रगति के दर उधर होंगे।

जुड़ेगी धूप छाया से

विभाजन की मिटा रेखा।

चढ़ेंगे गाँव जब सीढ़ी

शहर भी हमसफर होंगे।

हवाएँ एक सी बहतीं

वही जल अन्न है सबका।

दिलों से दिल मिलेंगे

स्वाद भी साझे अगर होंगे।

जलेंगे दीप घर घर में

रहेगा पर्व हर मौसम।

पपीहे मोर गाएँगे

मधुर कोकिल के स्वर होंगे।

विफल हर चाल दुश्मन की

करेंगे देशप्रेमी सब।

हमारे दस्तखत जग के

फ़लक पर पुरअसर होंगे।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗