कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १६७ / २०५ № 167 of 205 रचना १६७ / २०५
९ नवम्बर २०१९ 9 November 2019 ९ नवम्बर २०१९

कभी तो दिन वो आएगा kabhee to din wo aaegaa कभी तो दिन वो आएगा

कभी तो दिन वो आएगा

सभी के अपने घर होंगे।

मिलेंगी रोटियाँ सबको

न सपने दर-बदर होंगे।

॥

मिलेंगे बाग खेतों से

न होगी बीच में खाई

पलायन गाँव छोड़ेंगे

सदय पालक शहर होंगे।

॥

रखेंगे रास्ते पक्के

लगा सीने से गलियों को

बढ़ेंगे शुभ कदम जिस पथ

प्रगति के दर उधर होंगे।

॥

जुड़ेगी धूप छाया से

विभाजन की मिटा रेखा।

चढ़ेंगे गाँव जब सीढ़ी

शहर भी हमसफर होंगे।

॥

हवाएँ एक सी बहतीं

वही जल अन्न है सबका।

दिलों से दिल मिलेंगे

स्वाद भी साझे अगर होंगे।

॥

जलेंगे दीप घर घर में

रहेगा पर्व हर मौसम।

पपीहे मोर गाएँगे

मधुर कोकिल के स्वर होंगे।

॥

विफल हर चाल दुश्मन की

करेंगे देशप्रेमी सब।

हमारे दस्तखत जग के

फ़लक पर पुरअसर होंगे।

kabhee to din wo aaegaa

sabhee ke apane ghar honge

milengee rotiyaan sabako

n sapane dar-badar honge

·

milenge baag kheton se

n hogee beech men khaaee

palaayan gaanv chodenge

saday paalak shahar honge

·

rakhenge raaste pakke

lagaa seene se galiyon ko

bढ़enge shubh kadam jis path

pragati ke dar udhar honge

·

judegee dhoop chaayaa se

wibhaajan kee mitaa rekhaa

chढ़enge gaanv jab seeढ़ee

shahar bhee hamasaphar honge

·

hawaaen ek see bahateen

wahee jal ann hai sabakaa

dilon se dil milenge

svaad bhee saajhe agar honge

·

jalenge deep ghar ghar men

rahegaa parv har mausam

papeehe mor gaaenge

madhur kokil ke svar honge

·

wiphal har chaal dushman kee

karenge deshapremee sab

hamaare dastakhat jag ke

falak par puraasar honge

कभी तो दिन वो आएगा

सभी के अपने घर होंगे।

मिलेंगी रोटियाँ सबको

न सपने दर-बदर होंगे।

॥

मिलेंगे बाग खेतों से

न होगी बीच में खाई

पलायन गाँव छोड़ेंगे

सदय पालक शहर होंगे।

॥

रखेंगे रास्ते पक्के

लगा सीने से गलियों को

बढ़ेंगे शुभ कदम जिस पथ

प्रगति के दर उधर होंगे।

॥

जुड़ेगी धूप छाया से

विभाजन की मिटा रेखा।

चढ़ेंगे गाँव जब सीढ़ी

शहर भी हमसफर होंगे।

॥

हवाएँ एक सी बहतीं

वही जल अन्न है सबका।

दिलों से दिल मिलेंगे

स्वाद भी साझे अगर होंगे।

॥

जलेंगे दीप घर घर में

रहेगा पर्व हर मौसम।

पपीहे मोर गाएँगे

मधुर कोकिल के स्वर होंगे।

॥

विफल हर चाल दुश्मन की

करेंगे देशप्रेमी सब।

हमारे दस्तखत जग के

फ़लक पर पुरअसर होंगे।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗