कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८६ / २०४ № 86 of 204 रचना ८६ / २०४
२२ अप्रैल २०१५ 22 April 2015 २२ अप्रैल २०१५

छंद सब भूला पानी chand sab bhoolaa paanee छंद सब भूला पानी

कल तक कलकल गान सुनाता, बहता पानी

बोतल में हो बंद, छंद अब भूला पानी

प्यास

बुझाती थी जो सबकी दानी नदिया

है

तलाशती हलक हेतु कुछ मीठा पानी

हाथ

कटोरा धरे द्वार पर जोगी सावन

मानसून

से माँग रहा है भिक्षा, पानी

जब

संदेश दिया पाहुन का काँव-काँव ने

सूने

घट की आँखों में भर आया पानी

रहता

है अब महलों वाले तरण-ताल में

पनघट

का दिल तोड़ दे गया धोखा पानी

जाने

कब जल-पूरित हो पट पड़ा सकोरा

खुली

छतों से नित्य पूछती चिड़िया पानी

तैर

रहा था जो युग-युग से भव-सागर में

वही

“कल्पना” अब कलियुग में डूबा पानी

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

kal tak kalakal gaan sunaataa, bahataa paanee

·

botal men ho band, chand ab bhoolaa paanee

·

pyaas

bujhaatee thee jo sabakee daanee nadiyaa

·

hai

talaashatee halak hetu kuch meethaa paanee

·

haath

katoraa dhare dvaar par jogee saawan

·

maanasoon

se maang rahaa hai bhikshaa, paanee

·

jab

sandesh diyaa paahun kaa kaanv-kaanv ne

·

soone

ghat kee aankhon men bhar aayaa paanee

·

rahataa

hai ab mahalon waale taran-taal men

·

panaghat

kaa dil tod de gayaa dhokhaa paanee

·

jaane

kab jal-poorit ho pat padaa sakoraa

·

khulee

chaton se nity poochatee chidiyaa paanee

·

tair

rahaa thaa jo yug-yug se bhaw-saagar men

·

wahee

“kalpanaa” ab kaliyug men doobaa paanee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

कल तक कलकल गान सुनाता, बहता पानी

बोतल में हो बंद, छंद अब भूला पानी

प्यास

बुझाती थी जो सबकी दानी नदिया

है

तलाशती हलक हेतु कुछ मीठा पानी

हाथ

कटोरा धरे द्वार पर जोगी सावन

मानसून

से माँग रहा है भिक्षा, पानी

जब

संदेश दिया पाहुन का काँव-काँव ने

सूने

घट की आँखों में भर आया पानी

रहता

है अब महलों वाले तरण-ताल में

पनघट

का दिल तोड़ दे गया धोखा पानी

जाने

कब जल-पूरित हो पट पड़ा सकोरा

खुली

छतों से नित्य पूछती चिड़िया पानी

तैर

रहा था जो युग-युग से भव-सागर में

वही

“कल्पना” अब कलियुग में डूबा पानी

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗