कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८७ / २०५ № 87 of 205 रचना ८७ / २०५
२२ अप्रैल २०१५ 22 April 2015 २२ अप्रैल २०१५

छंद सब भूला पानी chand sab bhoolaa paanee छंद सब भूला पानी

कल तक कलकल गान सुनाता, बहता पानी

॥

बोतल में हो बंद, छंद अब भूला पानी

॥

प्यास

बुझाती थी जो सबकी दानी नदिया

॥

है

तलाशती हलक हेतु कुछ मीठा पानी

॥

हाथ

कटोरा धरे द्वार पर जोगी सावन

॥

मानसून

से माँग रहा है भिक्षा, पानी

॥

जब

संदेश दिया पाहुन का काँव-काँव ने

॥

सूने

घट की आँखों में भर आया पानी

॥

रहता

है अब महलों वाले तरण-ताल में

॥

पनघट

का दिल तोड़ दे गया धोखा पानी

॥

जाने

कब जल-पूरित हो पट पड़ा सकोरा

॥

खुली

छतों से नित्य पूछती चिड़िया पानी

॥

तैर

रहा था जो युग-युग से भव-सागर में

॥

वही

“कल्पना” अब कलियुग में डूबा पानी

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

kal tak kalakal gaan sunaataa, bahataa paanee

·

botal men ho band, chand ab bhoolaa paanee

·

pyaas

bujhaatee thee jo sabakee daanee nadiyaa

·

hai

talaashatee halak hetu kuch meethaa paanee

·

haath

katoraa dhare dvaar par jogee saawan

·

maanasoon

se maang rahaa hai bhikshaa, paanee

·

jab

sandesh diyaa paahun kaa kaanv-kaanv ne

·

soone

ghat kee aankhon men bhar aayaa paanee

·

rahataa

hai ab mahalon waale taran-taal men

·

panaghat

kaa dil tod de gayaa dhokhaa paanee

·

jaane

kab jal-poorit ho pat padaa sakoraa

·

khulee

chaton se nity poochatee chidiyaa paanee

·

tair

rahaa thaa jo yug-yug se bhaw-saagar men

·

wahee

“kalpanaa” ab kaliyug men doobaa paanee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

कल तक कलकल गान सुनाता, बहता पानी

॥

बोतल में हो बंद, छंद अब भूला पानी

॥

प्यास

बुझाती थी जो सबकी दानी नदिया

॥

है

तलाशती हलक हेतु कुछ मीठा पानी

॥

हाथ

कटोरा धरे द्वार पर जोगी सावन

॥

मानसून

से माँग रहा है भिक्षा, पानी

॥

जब

संदेश दिया पाहुन का काँव-काँव ने

॥

सूने

घट की आँखों में भर आया पानी

॥

रहता

है अब महलों वाले तरण-ताल में

॥

पनघट

का दिल तोड़ दे गया धोखा पानी

॥

जाने

कब जल-पूरित हो पट पड़ा सकोरा

॥

खुली

छतों से नित्य पूछती चिड़िया पानी

॥

तैर

रहा था जो युग-युग से भव-सागर में

॥

वही

“कल्पना” अब कलियुग में डूबा पानी

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗