जब कलम को थामती मेरी गजल है jab kalam ko thaamatee meree gajal hai जब कलम को थामती मेरी गजल है
जब
क़लम को थामती, मेरी गज़ल है।
खूब
कहना जानती, मेरी गज़ल है।
पूर
होता जब गले तक सब्र-सागर
तब
किनारा लाँघती, मेरी गज़ल है।
दीन-दुखियों, बेबसों का हाथ
गहकर
हक़
में उनके बोलती, मेरी गज़ल है।
अंधविश्वासों
की परतों को परे कर
रूढ़ियों
को रौंदती, मेरी गज़ल है।
नफ़रतों
की बाढ़ से बिफरी नदी पर
नेह
का पुल बाँधती, मेरी गज़ल है।
हौसले
हारे जनों के हिय जगाकर
दुख
के कंटक काटती, मेरी गज़ल है।
देशद्रोही, ठग लुटेरों की
हरिक नस
‘कल्पना’ पहचानती, मेरी गज़ल है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
jab
qalam ko thaamatee, meree gazal hai
khoob
kahanaa jaanatee, meree gazal hai
poor
hotaa jab gale tak sabr-saagar
tab
kinaaraa laanghatee, meree gazal hai
deen-dukhiyon, bebason kaa haath
gahakar
haq
men unake bolatee, meree gazal hai
andhawishvaason
kee paraton ko pare kar
rooढ़iyon
ko raundatee, meree gazal hai
nafaraton
kee baaढ़ se bipharee nadee par
neh
kaa pul baandhatee, meree gazal hai
hausale
haare janon ke hiy jagaakar
dukh
ke kantak kaatatee, meree gazal hai
deshadrohee, thag luteron kee
harik nas
‘kalpanaa’ pahachaanatee, meree gazal hai
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
जब
क़लम को थामती, मेरी गज़ल है।
खूब
कहना जानती, मेरी गज़ल है।
पूर
होता जब गले तक सब्र-सागर
तब
किनारा लाँघती, मेरी गज़ल है।
दीन-दुखियों, बेबसों का हाथ
गहकर
हक़
में उनके बोलती, मेरी गज़ल है।
अंधविश्वासों
की परतों को परे कर
रूढ़ियों
को रौंदती, मेरी गज़ल है।
नफ़रतों
की बाढ़ से बिफरी नदी पर
नेह
का पुल बाँधती, मेरी गज़ल है।
हौसले
हारे जनों के हिय जगाकर
दुख
के कंटक काटती, मेरी गज़ल है।
देशद्रोही, ठग लुटेरों की
हरिक नस
‘कल्पना’ पहचानती, मेरी गज़ल है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी