कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ११७ / १६३ № 117 of 163 रचना ११७ / १६३
१० नवम्बर २०१५ 10 November 2015 १० नवम्बर २०१५

एक दीपक हम जलाएँ ek deepak ham jalaaen एक दीपक हम जलाएँ

भेद की बातें

भुलाकर

नेह की बाती सजाकर

जीव-जग हित

ज्योत्सना का

एक दीपक हम

जलाएँ।

तोड़ सच का कोट, लंका

जोड़ ली है झूठ ने।

हँस रहे पापी

अँधेरे

रब लगा है रूठने।

दुर्ग दुष्टों का

ढहाकर

जय दिशा में पग

बढ़ाकर

कर्म-साधित कामना

का

एक दीपक हम

जलाएँ।

पर्व पर दिखते नहीं

अब

फुलझड़ी के कहकहे।

लोलुपों के साथ बेबस

बम-पटाखे रह रहे।

द्वेष दुविधा को जलाकर

bhed kee baaten

bhulaakar

·

neh kee baatee sajaakar

·

jeew-jag hit

jyotsanaa kaa

·

ek deepak ham

·

jalaaen

·

tod sach kaa kot, lankaa

·

jod lee hai jhooth ne

·

hans rahe paapee

andhere

·

rab lagaa hai roothane

·

durg dushton kaa

dhahaakar

·

jay dishaa men pag

bढ़aakar

·

karm-saadhit kaamanaa

kaa

·

ek deepak ham

·

jalaaen

·

parv par dikhate naheen

ab

·

phulajhadee ke kahakahe

·

lolupon ke saath bebas

·

bam-pataakhe rah rahe

·

dvesh duwidhaa ko jalaakar

भेद की बातें

भुलाकर

नेह की बाती सजाकर

जीव-जग हित

ज्योत्सना का

एक दीपक हम

जलाएँ।

तोड़ सच का कोट, लंका

जोड़ ली है झूठ ने।

हँस रहे पापी

अँधेरे

रब लगा है रूठने।

दुर्ग दुष्टों का

ढहाकर

जय दिशा में पग

बढ़ाकर

कर्म-साधित कामना

का

एक दीपक हम

जलाएँ।

पर्व पर दिखते नहीं

अब

फुलझड़ी के कहकहे।

लोलुपों के साथ बेबस

बम-पटाखे रह रहे।

द्वेष दुविधा को जलाकर

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗