जिसको चाहा था तुम वही हो क्या jisako chaahaa thaa tum wahee ho kyaa जिसको चाहा था तुम वही हो क्या
जिसको चाहा था तुम वही हो क्या?
मेरी हमराह,
ज़िंदगी हो क्या?
कल तो हिरनी बनी उछलती रही,
क्या हुआ आज,
थक गई हो क्या?
ऐ बहारों की बोलती बुलबुल,
क्यों हुई मौन,
बंदिनी हो क्या?
ढूँढती हूँ तुम्हें उजालों में,
तुम अँधेरों से जा मिली हो क्या?
महफिलें अब नहीं सुहातीं तुम्हें?
कोई गुज़री हुई सदी हो क्या?
क्यों मेरे हौसले घटाती हो,
मेरी सरकार,
दिल-जली हो क्या?
प्यार से ही तो थी मिली तुमसे,
खुश नहीं फिर भी, सिरफिरी हो क्या?
थी नदी चंचला उफनती हुई,
सागरों से भला डरी हो क्या?
सुन रही हो,
कि जो कहा मैंने?
कोई फरियाद अनसुनी हो क्या?
“कल्पना” मैं कसूरवार नहीं,
रूठकर जा रही सखी हो क्या?
------कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
jisako chaahaa thaa tum wahee ho kyaa?
meree hamaraah,
zindagee ho kyaa?
kal to hiranee banee uchalatee rahee,
kyaa huaa aaj,
thak gaee ho kyaa?
ai bahaaron kee bolatee bulabul,
kyon huee maun,
bandinee ho kyaa?
dhoondhatee hoon tumhen ujaalon men,
tum andheron se jaa milee ho kyaa?
mahaphilen ab naheen suhaateen tumhen?
koee guzaree huee sadee ho kyaa?
kyon mere hausale ghataatee ho,
meree sarakaar,
dil-jalee ho kyaa?
pyaar se hee to thee milee tumase,
khush naheen phir bhee, siraphiree ho kyaa?
thee nadee chanchalaa uphanatee huee,
saagaron se bhalaa daree ho kyaa?
sun rahee ho,
ki jo kahaa mainne?
koee phariyaad anasunee ho kyaa?
“kalpanaa” main kasoorawaar naheen,
roothakar jaa rahee sakhee ho kyaa?
------kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
जिसको चाहा था तुम वही हो क्या?
मेरी हमराह,
ज़िंदगी हो क्या?
कल तो हिरनी बनी उछलती रही,
क्या हुआ आज,
थक गई हो क्या?
ऐ बहारों की बोलती बुलबुल,
क्यों हुई मौन,
बंदिनी हो क्या?
ढूँढती हूँ तुम्हें उजालों में,
तुम अँधेरों से जा मिली हो क्या?
महफिलें अब नहीं सुहातीं तुम्हें?
कोई गुज़री हुई सदी हो क्या?
क्यों मेरे हौसले घटाती हो,
मेरी सरकार,
दिल-जली हो क्या?
प्यार से ही तो थी मिली तुमसे,
खुश नहीं फिर भी, सिरफिरी हो क्या?
थी नदी चंचला उफनती हुई,
सागरों से भला डरी हो क्या?
सुन रही हो,
कि जो कहा मैंने?
कोई फरियाद अनसुनी हो क्या?
“कल्पना” मैं कसूरवार नहीं,
रूठकर जा रही सखी हो क्या?
------कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी