कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ३६ / ६५ № 36 of 65 रचना ३६ / ६५
४ अप्रैल २०१४ 4 April 2014 ४ अप्रैल २०१४

चुपके-चुपके चैत ने chupake-chupake chait ne चुपके-चुपके चैत ने

चुपके-चुपके

चैत ने, घोला अपना रंग।

और बदन की

स्वेद से, शुरू हो गई जंग।

पल-पल तपते

सूर्य की, ऐसी बिछी बिसात।

हर बाज़ी वो

जीतकर, हमें दे रहा मात।

लू लपटों

ने कर लिया, दुपहर पर अधिकार।

दिन भर

तनकर घूमता, दिनकर चौकीदार।

हरियाली

गुम हो गई, प्रखर हो गई धूप।

पीत वर्ण

अब हो चला, उद्यानों का

रूप।

व्याकुल

पंछी फिर रहे, सूखे

chupake-chupake

chait ne, gholaa apanaa rang

·

aur badan kee

sved se, shuroo ho gaee jang

·

pal-pal tapate

soory kee, aisee bichee bisaat

·

har baazee wo

jeetakar, hamen de rahaa maat

·

loo lapaton

ne kar liyaa, dupahar par adhikaar

·

din bhar

tanakar ghoomataa, dinakar chaukeedaar

·

hariyaalee

gum ho gaee, prakhar ho gaee dhoop

·

peet warn

ab ho chalaa, udyaanon kaa

roop

·

wyaakul

panchee phir rahe, sookhe

चुपके-चुपके

चैत ने, घोला अपना रंग।

और बदन की

स्वेद से, शुरू हो गई जंग।

पल-पल तपते

सूर्य की, ऐसी बिछी बिसात।

हर बाज़ी वो

जीतकर, हमें दे रहा मात।

लू लपटों

ने कर लिया, दुपहर पर अधिकार।

दिन भर

तनकर घूमता, दिनकर चौकीदार।

हरियाली

गुम हो गई, प्रखर हो गई धूप।

पीत वर्ण

अब हो चला, उद्यानों का

रूप।

व्याकुल

पंछी फिर रहे, सूखे

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗