कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ६८ / १६३ № 68 of 163 रचना ६८ / १६३
२ अप्रैल २०१४ 2 April 2014 २ अप्रैल २०१४

खुशबू के पल भीने से khushaboo ke pal bheene se खुशबू के पल भीने से

रंग चले निज गेह, सिखाकर

मत घबराना जीने से।

जंग छेड़नी है देहों को

सूरज,

धूप, पसीने से।

शीत विदा हो गई पलटकर।

लू लपटें हँस रहीं झपटकर।

वनचर कैद हुए खोहों में

पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।

सुबह शाम जन लिपट रहे हैं

तरण ताल के सीने से।

तले भुने पकवान दंग हैं।

शायद इनसे लोग तंग हैं।

देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे

फल,

सलाद, रस के प्रसंग हैं।

rang chale nij geh, sikhaakar

·

mat ghabaraanaa jeene se

·

jang chedanee hai dehon ko

·

sooraj,

dhoop, paseene se

·

sheet widaa ho gaee palatakar

·

loo lapaten hans raheen jhapatakar

·

wanachar kaid hue khohon men

·

paakhee baithe need simatakar

·

subah shaam jan lipat rahe hain

·

taran taal ke seene se

·

tale bhune pakawaan dang hain

·

shaayad inase log tang hain

·

dekh rahe hain tukur-tukur we

·

phal,

salaad, ras ke prasang hain

रंग चले निज गेह, सिखाकर

मत घबराना जीने से।

जंग छेड़नी है देहों को

सूरज,

धूप, पसीने से।

शीत विदा हो गई पलटकर।

लू लपटें हँस रहीं झपटकर।

वनचर कैद हुए खोहों में

पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।

सुबह शाम जन लिपट रहे हैं

तरण ताल के सीने से।

तले भुने पकवान दंग हैं।

शायद इनसे लोग तंग हैं।

देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे

फल,

सलाद, रस के प्रसंग हैं।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗