खुशबू के पल भीने से khushaboo ke pal bheene se खुशबू के पल भीने से
रंग चले निज गेह, सिखाकर
मत घबराना जीने से।
जंग छेड़नी है देहों को
सूरज,
धूप, पसीने से।
शीत विदा हो गई पलटकर।
लू लपटें हँस रहीं झपटकर।
वनचर कैद हुए खोहों में
पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।
सुबह शाम जन लिपट रहे हैं
तरण ताल के सीने से।
तले भुने पकवान दंग हैं।
शायद इनसे लोग तंग हैं।
देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे
फल,
सलाद, रस के प्रसंग हैं।
rang chale nij geh, sikhaakar
mat ghabaraanaa jeene se
jang chedanee hai dehon ko
sooraj,
dhoop, paseene se
sheet widaa ho gaee palatakar
loo lapaten hans raheen jhapatakar
wanachar kaid hue khohon men
paakhee baithe need simatakar
subah shaam jan lipat rahe hain
taran taal ke seene se
tale bhune pakawaan dang hain
shaayad inase log tang hain
dekh rahe hain tukur-tukur we
phal,
salaad, ras ke prasang hain
रंग चले निज गेह, सिखाकर
मत घबराना जीने से।
जंग छेड़नी है देहों को
सूरज,
धूप, पसीने से।
शीत विदा हो गई पलटकर।
लू लपटें हँस रहीं झपटकर।
वनचर कैद हुए खोहों में
पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।
सुबह शाम जन लिपट रहे हैं
तरण ताल के सीने से।
तले भुने पकवान दंग हैं।
शायद इनसे लोग तंग हैं।
देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे
फल,
सलाद, रस के प्रसंग हैं।