कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २४ / २०४ № 24 of 204 रचना २४ / २०४
२४ दिसम्बर २०१३ 24 December 2013 २४ दिसम्बर २०१३

काश दिखलाए राह साल नया kaash dikhalaae raah saal nayaa काश दिखलाए राह साल नया

इस कदर ख्वाब वे सजा बैठे।

देश को दाँव पर लगा बैठे।

मानकर मिल्कियत महज अपनी

तख्त औ ताज को लजा बैठे।

मानवी मूल्य सब चढ़े सूली

फर्ज़ को कब्र में दबा बैठे।

दीप रौशन किए फ़कत अपने

आशियाँ औरों का जला बैठे।

आब आँखों की लुट चुकी उनकी

आबरू स्वत्व की लुटा बैठे।

डूबते खुद अगर मुनासिब था

बेरहम दुखियों को डुबा बैठे।

काश! दिखलाए राह साल नया

जो गए व्यर्थ ही गँवा बैठे।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

is kadar khvaab we sajaa baithe

·

desh ko daanv par lagaa baithe

·

maanakar milkiyat mahaj apanee

takht au taaj ko lajaa baithe

·

maanawee mooly sab chढ़e soolee

pharz ko kabr men dabaa baithe

·

deep raushan kie fakat apane

aashiyaan auron kaa jalaa baithe

·

aab aankhon kee lut chukee unakee

aabaroo svatv kee lutaa baithe

·

doobate khud agar munaasib thaa

beraham dukhiyon ko dubaa baithe

·

kaash! dikhalaae raah saal nayaa

jo gae wyarth hee ganvaa baithe

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

इस कदर ख्वाब वे सजा बैठे।

देश को दाँव पर लगा बैठे।

मानकर मिल्कियत महज अपनी

तख्त औ ताज को लजा बैठे।

मानवी मूल्य सब चढ़े सूली

फर्ज़ को कब्र में दबा बैठे।

दीप रौशन किए फ़कत अपने

आशियाँ औरों का जला बैठे।

आब आँखों की लुट चुकी उनकी

आबरू स्वत्व की लुटा बैठे।

डूबते खुद अगर मुनासिब था

बेरहम दुखियों को डुबा बैठे।

काश! दिखलाए राह साल नया

जो गए व्यर्थ ही गँवा बैठे।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗