खिड़की बाँस की khidakee baans kee खिड़की बाँस की
खुल
गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की
झूमती
आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की
किस
तरह साँचे ढला यह,
अनगिनत हाथों गुज़र
श्रम-नगर
गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की
वन
से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया
इस
तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की
सिर
चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से
हम
किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की
गाँव-शहरों
से अलग, हर लोभ लालच से परे
दे
रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की
रस-ऋचाओं
से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे
शायरी
ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की
करके
हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ
हत
हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की
इस
नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें
रह
न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
khul
gaee man-anjuman men, ek khidakee baans kee
jhoomatee
aaee gazal, kahane kahaanee baans kee
kis
tarah saanche dhalaa yah,
anaginat haathon guzar
shram-nagar
gaathaa sunaataa, deergh-jeewee baans kee
wan
se hariyaalaa chalaa phir, khoob ise cheelaa gayaa
is
tarah chauke bichee, chikanee chataaee baans kee
sir
chढ़aa sophaa chiढ़aataa jab use to fakhr se
ham
kisee se kam naheen, kahatee hai kursee baans kee
gaanv-shaharon
se alag, har lobh laalach se pare
de
rahee aakaar inhen fanakaar bastee baans kee
ras-riichaaon
se nawaazaa, geet-kawitaa ne ise
shaayaree
ne bhee bajaaee khoob bansee baans kee
karake
hatyaa, wan-nihatthon kee magan hain aariyaan
hat
huee hai saadhanaa, tapate tapasvee baans kee
is
niyaamat kee hiphaazat ‘kalpanaa’ milakar karen
rah
n jaae sirph pannon, par nishaanee baans kee
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
खुल
गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की
झूमती
आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की
किस
तरह साँचे ढला यह,
अनगिनत हाथों गुज़र
श्रम-नगर
गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की
वन
से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया
इस
तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की
सिर
चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से
हम
किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की
गाँव-शहरों
से अलग, हर लोभ लालच से परे
दे
रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की
रस-ऋचाओं
से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे
शायरी
ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की
करके
हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ
हत
हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की
इस
नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें
रह
न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी