कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९२ / २०५ № 92 of 205 रचना ९२ / २०५
२५ मई २०१५ 25 May 2015 २५ मई २०१५

खिड़की बाँस की khidakee baans kee खिड़की बाँस की

खुल

गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की

॥

झूमती

आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की

॥

किस

तरह साँचे ढला यह,

अनगिनत हाथों गुज़र

॥

श्रम-नगर

गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की

॥

वन

से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया

॥

इस

तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की

॥

सिर

चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से

॥

हम

किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की

॥

गाँव-शहरों

से अलग, हर लोभ लालच से परे

॥

दे

रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की

॥

रस-ऋचाओं

से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे

॥

शायरी

ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की

॥

करके

हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ

॥

हत

हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की

॥

इस

नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें

॥

रह

न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

khul

gaee man-anjuman men, ek khidakee baans kee

·

jhoomatee

aaee gazal, kahane kahaanee baans kee

·

kis

tarah saanche dhalaa yah,

anaginat haathon guzar

·

shram-nagar

gaathaa sunaataa, deergh-jeewee baans kee

·

wan

se hariyaalaa chalaa phir, khoob ise cheelaa gayaa

·

is

tarah chauke bichee, chikanee chataaee baans kee

·

sir

chढ़aa sophaa chiढ़aataa jab use to fakhr se

·

ham

kisee se kam naheen, kahatee hai kursee baans kee

·

gaanv-shaharon

se alag, har lobh laalach se pare

·

de

rahee aakaar inhen fanakaar bastee baans kee

·

ras-riichaaon

se nawaazaa, geet-kawitaa ne ise

·

shaayaree

ne bhee bajaaee khoob bansee baans kee

·

karake

hatyaa, wan-nihatthon kee magan hain aariyaan

·

hat

huee hai saadhanaa, tapate tapasvee baans kee

·

is

niyaamat kee hiphaazat ‘kalpanaa’ milakar karen

·

rah

n jaae sirph pannon, par nishaanee baans kee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

खुल

गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की

॥

झूमती

आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की

॥

किस

तरह साँचे ढला यह,

अनगिनत हाथों गुज़र

॥

श्रम-नगर

गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की

॥

वन

से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया

॥

इस

तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की

॥

सिर

चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से

॥

हम

किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की

॥

गाँव-शहरों

से अलग, हर लोभ लालच से परे

॥

दे

रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की

॥

रस-ऋचाओं

से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे

॥

शायरी

ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की

॥

करके

हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ

॥

हत

हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की

॥

इस

नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें

॥

रह

न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗