कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९१ / २०४ № 91 of 204 रचना ९१ / २०४
२५ मई २०१५ 25 May 2015 २५ मई २०१५

खिड़की बाँस की khidakee baans kee खिड़की बाँस की

खुल

गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की

झूमती

आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की

किस

तरह साँचे ढला यह,

अनगिनत हाथों गुज़र

श्रम-नगर

गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की

वन

से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया

इस

तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की

सिर

चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से

हम

किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की

गाँव-शहरों

से अलग, हर लोभ लालच से परे

दे

रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की

रस-ऋचाओं

से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे

शायरी

ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की

करके

हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ

हत

हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की

इस

नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें

रह

न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

khul

gaee man-anjuman men, ek khidakee baans kee

·

jhoomatee

aaee gazal, kahane kahaanee baans kee

·

kis

tarah saanche dhalaa yah,

anaginat haathon guzar

·

shram-nagar

gaathaa sunaataa, deergh-jeewee baans kee

·

wan

se hariyaalaa chalaa phir, khoob ise cheelaa gayaa

·

is

tarah chauke bichee, chikanee chataaee baans kee

·

sir

chढ़aa sophaa chiढ़aataa jab use to fakhr se

·

ham

kisee se kam naheen, kahatee hai kursee baans kee

·

gaanv-shaharon

se alag, har lobh laalach se pare

·

de

rahee aakaar inhen fanakaar bastee baans kee

·

ras-riichaaon

se nawaazaa, geet-kawitaa ne ise

·

shaayaree

ne bhee bajaaee khoob bansee baans kee

·

karake

hatyaa, wan-nihatthon kee magan hain aariyaan

·

hat

huee hai saadhanaa, tapate tapasvee baans kee

·

is

niyaamat kee hiphaazat ‘kalpanaa’ milakar karen

·

rah

n jaae sirph pannon, par nishaanee baans kee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

खुल

गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की

झूमती

आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की

किस

तरह साँचे ढला यह,

अनगिनत हाथों गुज़र

श्रम-नगर

गाथा सुनाता, दीर्घ-जीवी बाँस की

वन

से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया

इस

तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की

सिर

चढ़ा सोफा चिढ़ाता जब उसे तो फ़ख्र से

हम

किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की

गाँव-शहरों

से अलग, हर लोभ लालच से परे

दे

रही आकार इन्हें फ़नकार बस्ती बाँस की

रस-ऋचाओं

से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे

शायरी

ने भी बजाई खूब बंसी बाँस की

करके

हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ

हत

हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की

इस

नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें

रह

न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗