कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ४० / २०५ № 40 of 205 रचना ४० / २०५
१५ अप्रैल २०१४ 15 April 2014 १५ अप्रैल २०१४

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की kise sunaaen wyathaa watan kee किसे सुनाएँ व्यथा वतन की

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।

॥

है कौन बातें करे अमन की।

॥

हुई हुकूमत हितों पे हावी

॥

हताश है, हर गुहार जन की।

॥

फिसल रहे पग हरेक मग पर

॥

कुछ ऐसी काई जमी पतन की।

॥

फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर

॥

कदम तले बातें सत वचन की।

॥

निगल के खुशबू को नागफनियाँ

॥

कुचल रहीं आरज़ू चमन की।

॥

ये किसके बुत क्यों बनाके रावण

॥

निभा रहे हैं प्रथा दहन की।

॥

ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं चर्चे

॥

विमूढ़ चर्चा करें गगन की।

॥

न जाने कब होगी “कल्पना” फिर

॥

नवेली प्रातः नई किरन की।

॥

- कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

kise sunaaen wyathaa watan kee

·

hai kaun baaten kare aman kee

·

huee hukoomat hiton pe haawee

·

hataash hai, har guhaar jan kee

·

phisal rahe pag harek mag par

·

kuch aisee kaaee jamee patan kee

·

phareb qaabiz hain kursiyon par

·

kadam tale baaten sat wachan kee

·

nigal ke khushaboo ko naagaphaniyaan

·

kuchal raheen aarazoo chaman kee

·

ye kisake but kyon banaake raawan

·

nibhaa rahe hain prathaa dahan kee

·

zameen ke muddon pe chup hain charche

·

wimooढ़ charchaa karen gagan kee

·

n jaane kab hogee “kalpanaa” phir

·

nawelee praatah naee kiran kee

·

- kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।

॥

है कौन बातें करे अमन की।

॥

हुई हुकूमत हितों पे हावी

॥

हताश है, हर गुहार जन की।

॥

फिसल रहे पग हरेक मग पर

॥

कुछ ऐसी काई जमी पतन की।

॥

फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर

॥

कदम तले बातें सत वचन की।

॥

निगल के खुशबू को नागफनियाँ

॥

कुचल रहीं आरज़ू चमन की।

॥

ये किसके बुत क्यों बनाके रावण

॥

निभा रहे हैं प्रथा दहन की।

॥

ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं चर्चे

॥

विमूढ़ चर्चा करें गगन की।

॥

न जाने कब होगी “कल्पना” फिर

॥

नवेली प्रातः नई किरन की।

॥

- कल्पना रामानी

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प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗