किसे सुनाएँ व्यथा वतन की kise sunaaen wyathaa watan kee किसे सुनाएँ व्यथा वतन की
किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।
है कौन बातें करे अमन की।
हुई हुकूमत हितों पे हावी
हताश है, हर गुहार जन की।
फिसल रहे पग हरेक मग पर
कुछ ऐसी काई जमी पतन की।
फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर
कदम तले बातें सत वचन की।
निगल के खुशबू को नागफनियाँ
कुचल रहीं आरज़ू चमन की।
ये किसके बुत क्यों बनाके रावण
निभा रहे हैं प्रथा दहन की।
ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं चर्चे
विमूढ़ चर्चा करें गगन की।
न जाने कब होगी “कल्पना” फिर
नवेली प्रातः नई किरन की।
- कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
kise sunaaen wyathaa watan kee
hai kaun baaten kare aman kee
huee hukoomat hiton pe haawee
hataash hai, har guhaar jan kee
phisal rahe pag harek mag par
kuch aisee kaaee jamee patan kee
phareb qaabiz hain kursiyon par
kadam tale baaten sat wachan kee
nigal ke khushaboo ko naagaphaniyaan
kuchal raheen aarazoo chaman kee
ye kisake but kyon banaake raawan
nibhaa rahe hain prathaa dahan kee
zameen ke muddon pe chup hain charche
wimooढ़ charchaa karen gagan kee
n jaane kab hogee “kalpanaa” phir
nawelee praatah naee kiran kee
- kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।
है कौन बातें करे अमन की।
हुई हुकूमत हितों पे हावी
हताश है, हर गुहार जन की।
फिसल रहे पग हरेक मग पर
कुछ ऐसी काई जमी पतन की।
फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर
कदम तले बातें सत वचन की।
निगल के खुशबू को नागफनियाँ
कुचल रहीं आरज़ू चमन की।
ये किसके बुत क्यों बनाके रावण
निभा रहे हैं प्रथा दहन की।
ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं चर्चे
विमूढ़ चर्चा करें गगन की।
न जाने कब होगी “कल्पना” फिर
नवेली प्रातः नई किरन की।
- कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी