कुछ और नहीं kuch aur naheen कुछ और नहीं
खुदा से माँगा मेहर के सिवा कुछ और
नहीं।
दुआएँ देती नज़र के सिवा कुछ और नहीं।
दुखा के गाँव का दिल चल दिये मिला
लेकिन
दिलों से तंग शहर के सिवा कुछ और नहीं।
पिलाके नाग को पय, बाद
पूज लो चाहे
मिलेगा दंश-ज़हर के सिवा कुछ और नहीं।
चमन को सींच लहू से है सोचता माली
गुलों की लंबी उमर के सिवा कुछ और
नहीं।
लिया तो सौख्य नई पौध ने बुजुर्गों से
दिया है रंज-फिकर के सिवा कुछ और नहीं।
जवाबी तोहफे मिलेंगे हमें भी कुदरत से
सुनामी, बाढ़, कहर के सिवा कुछ और नहीं।
जो जानते ही नहीं, साज़, राग, उनके लिए
ग़ज़ल भी रूक्ष बहर के सिवा कुछ और नहीं।
विपन्न हैं जिन्हें दिखता हसीन दुनिया
में
उदास शाम सहर के सिवा कुछ और नहीं।
कुछ ऐसा हो कि बसे “कल्पना” हरिक
जन के
हृदय में प्रेमनगर के सिवा कुछ और नहीं।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
khudaa se maangaa mehar ke siwaa kuch aur
naheen
duaaen detee nazar ke siwaa kuch aur naheen
dukhaa ke gaanv kaa dil chal diye milaa
lekin
dilon se tang shahar ke siwaa kuch aur naheen
pilaake naag ko pay, baad
pooj lo chaahe
milegaa dansh-zahar ke siwaa kuch aur naheen
chaman ko seench lahoo se hai sochataa maalee
gulon kee lanbee umar ke siwaa kuch aur
naheen
liyaa to saukhy naee paudh ne bujurgon se
diyaa hai ranj-phikar ke siwaa kuch aur naheen
jawaabee tohaphe milenge hamen bhee kudarat se
sunaamee, baaढ़, kahar ke siwaa kuch aur naheen
jo jaanate hee naheen, saaz, raag, unake lie
gazal bhee rooksh bahar ke siwaa kuch aur naheen
wipann hain jinhen dikhataa haseen duniyaa
men
udaas shaam sahar ke siwaa kuch aur naheen
kuch aisaa ho ki base “kalpanaa” harik
jan ke
hriiday men premanagar ke siwaa kuch aur naheen
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
खुदा से माँगा मेहर के सिवा कुछ और
नहीं।
दुआएँ देती नज़र के सिवा कुछ और नहीं।
दुखा के गाँव का दिल चल दिये मिला
लेकिन
दिलों से तंग शहर के सिवा कुछ और नहीं।
पिलाके नाग को पय, बाद
पूज लो चाहे
मिलेगा दंश-ज़हर के सिवा कुछ और नहीं।
चमन को सींच लहू से है सोचता माली
गुलों की लंबी उमर के सिवा कुछ और
नहीं।
लिया तो सौख्य नई पौध ने बुजुर्गों से
दिया है रंज-फिकर के सिवा कुछ और नहीं।
जवाबी तोहफे मिलेंगे हमें भी कुदरत से
सुनामी, बाढ़, कहर के सिवा कुछ और नहीं।
जो जानते ही नहीं, साज़, राग, उनके लिए
ग़ज़ल भी रूक्ष बहर के सिवा कुछ और नहीं।
विपन्न हैं जिन्हें दिखता हसीन दुनिया
में
उदास शाम सहर के सिवा कुछ और नहीं।
कुछ ऐसा हो कि बसे “कल्पना” हरिक
जन के
हृदय में प्रेमनगर के सिवा कुछ और नहीं।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी