कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ५४ / २०४ № 54 of 204 रचना ५४ / २०४
३ सितम्बर २०१४ 3 September 2014 ३ सितम्बर २०१४

शाम ढल जाने के बाद shaam dhal jaane ke baad शाम ढल जाने के बाद

दृग

खुले रखना किसी से, प्रीत पल जाने के बाद।

जग

नहीं देता सहारा, पग फिसल जाने के बाद।

चार

होते ही नयन, कर लो हजारों कोशिशें

त्राण

है मुश्किल, नज़र का बाण चल जाने के बाद।

बाँध

लो प्रेमिल पलों को, ज़िंदगी भर के लिए।

फिर

नहीं आता वही मौसम, निकल जाने के बाद।

प्यार तो होता खरा, पर खार करता है जहाँ

इसलिए मिलते हैं दो दिल, शाम ढल जाने के बाद।

सब्र

से सींचो हृदय में, प्रेम रूपी बीज को

ख़ुशबुएँ

देता रहेगा, फूल-फल जाने के बाद।

प्रेम

के अतिरेक का,

कैसा मिला है फल उसे

जान

पाता है कहाँ,

परवाना जल जाने के बाद।

क्यों

डरें हम “कल्पना” जब मीत हर-दम साथ है

हाथ यह छूटेगा अब तो, दम निकल जाने के बाद।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

driig

khule rakhanaa kisee se, preet pal jaane ke baad

·

jag

naheen detaa sahaaraa, pag phisal jaane ke baad

·

chaar

hote hee nayan, kar lo hajaaron koshishen

·

traan

hai mushkil, nazar kaa baan chal jaane ke baad

·

baandh

lo premil palon ko, zindagee bhar ke lie

·

phir

naheen aataa wahee mausam, nikal jaane ke baad

·

pyaar to hotaa kharaa, par khaar karataa hai jahaan

·

isalie milate hain do dil, shaam dhal jaane ke baad

·

sabr

se seencho hriiday men, prem roopee beej ko

·

kushabuen

detaa rahegaa, phool-phal jaane ke baad

·

prem

ke atirek kaa,

kaisaa milaa hai phal use

·

jaan

paataa hai kahaan,

parawaanaa jal jaane ke baad

·

kyon

daren ham “kalpanaa” jab meet har-dam saath hai

·

haath yah chootegaa ab to, dam nikal jaane ke baad

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

दृग

खुले रखना किसी से, प्रीत पल जाने के बाद।

जग

नहीं देता सहारा, पग फिसल जाने के बाद।

चार

होते ही नयन, कर लो हजारों कोशिशें

त्राण

है मुश्किल, नज़र का बाण चल जाने के बाद।

बाँध

लो प्रेमिल पलों को, ज़िंदगी भर के लिए।

फिर

नहीं आता वही मौसम, निकल जाने के बाद।

प्यार तो होता खरा, पर खार करता है जहाँ

इसलिए मिलते हैं दो दिल, शाम ढल जाने के बाद।

सब्र

से सींचो हृदय में, प्रेम रूपी बीज को

ख़ुशबुएँ

देता रहेगा, फूल-फल जाने के बाद।

प्रेम

के अतिरेक का,

कैसा मिला है फल उसे

जान

पाता है कहाँ,

परवाना जल जाने के बाद।

क्यों

डरें हम “कल्पना” जब मीत हर-दम साथ है

हाथ यह छूटेगा अब तो, दम निकल जाने के बाद।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗