कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १०७ / २०४ № 107 of 204 रचना १०७ / २०४
३० अक्तूबर २०१५ 30 October 2015 ३० अक्तूबर २०१५

कुछ पा लेना सब कुछ खोने से अच्छा है kuch paa lenaa sab kuch khone se achchaa hai कुछ पा लेना सब कुछ खोने से अच्छा है

कुछ

पा लेना, सब कुछ खोने से अच्छा है

छोटा

घर भी, बेघर होने से अच्छा है

पर

स्वतंत्र हों, पा लें चाहे रूखी रोटी

ज़र

परोसते कैदी कोने से अच्छा है

नहीं

ज़रूरी मिले सभी को पूरा सूरज

एक

चक्षु भी, अँधा होने से अच्छा है

जो

हासिल है, साथ उसी के हँसकर जीना

पास

नहीं, उसके हित रोने से अच्छा है

नवता के सँग, परम्पराओं को भी पूजना

हर-पल बोझिल जीवन ढोने से अच्छा है

जल

वो जीवन, जो कंठों की प्यास बुझाए

नदिया

बनना, सागर होने से अच्छा है

सिर्फ

ज़रूरत साथ रहे, यदि पार उतरना

बोझ

बढ़ाकर नाव डुबोने से अच्छा है

खुले दृगों से सदा ‘कल्पना’ कदम बढ़ाना

ठोकर खा, दृग, नीर भिगोने से अच्छा है

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

kuch

paa lenaa, sab kuch khone se achchaa hai

·

chotaa

ghar bhee, beghar hone se achchaa hai

·

par

svatantr hon, paa len chaahe rookhee rotee

·

zar

parosate kaidee kone se achchaa hai

·

naheen

zarooree mile sabhee ko pooraa sooraj

·

ek

chakshu bhee, andhaa hone se achchaa hai

·

jo

haasil hai, saath usee ke hansakar jeenaa

·

paas

naheen, usake hit rone se achchaa hai

·

nawataa ke sang, paramparaaon ko bhee poojanaa

·

har-pal bojhil jeewan dhone se achchaa hai

·

jal

wo jeewan, jo kanthon kee pyaas bujhaae

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nadiyaa

bananaa, saagar hone se achchaa hai

·

sirph

zaroorat saath rahe, yadi paar utaranaa

·

bojh

bढ़aakar naaw dubone se achchaa hai

·

khule driigon se sadaa ‘kalpanaa’ kadam bढ़aanaa

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thokar khaa, driig, neer bhigone se achchaa hai

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-kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

कुछ

पा लेना, सब कुछ खोने से अच्छा है

छोटा

घर भी, बेघर होने से अच्छा है

पर

स्वतंत्र हों, पा लें चाहे रूखी रोटी

ज़र

परोसते कैदी कोने से अच्छा है

नहीं

ज़रूरी मिले सभी को पूरा सूरज

एक

चक्षु भी, अँधा होने से अच्छा है

जो

हासिल है, साथ उसी के हँसकर जीना

पास

नहीं, उसके हित रोने से अच्छा है

नवता के सँग, परम्पराओं को भी पूजना

हर-पल बोझिल जीवन ढोने से अच्छा है

जल

वो जीवन, जो कंठों की प्यास बुझाए

नदिया

बनना, सागर होने से अच्छा है

सिर्फ

ज़रूरत साथ रहे, यदि पार उतरना

बोझ

बढ़ाकर नाव डुबोने से अच्छा है

खुले दृगों से सदा ‘कल्पना’ कदम बढ़ाना

ठोकर खा, दृग, नीर भिगोने से अच्छा है

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗