कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १३० / २०५ № 130 of 205 रचना १३० / २०५
९ जुलाई २०१६ 9 July 2016 ९ जुलाई २०१६

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं kushabuon ke band sab baazaar hain ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

॥

बिक रहे चहुं ओर केवल खार हैं

॥

पिस रही कदमों तले इंसानियत

॥

शीर्ष सजते पाशविक व्यवहार हैं

॥

वक्र रेखाओं से हैं सहमी सरल

॥

उलझनों में ज्यामितिक आकार हैं

॥

हों भ्रमित ना, देखकर आकाश को

॥

भूमि पर दम तोड़ते आधार हैं

॥

क्या वे सब हकदार हैं सम्मान के

॥

कंठ में जिनके पड़े गुल हार हैं?

॥

बाँध लें पुल प्रेम का उनके लिए

॥

जो खड़े नफ़रत लिए उस पार हैं

॥

उन जड़ों पर बेअसर हैं विष सभी

॥

सींचते जिनको अमिय-संस्कार हैं

॥

ज़िंदगी को अर्थ दें, इस जन्म में

॥

‘कल्पना’ केवल मिले दिन चार हैं

॥

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

kushabuon ke band sab baazaar hain

·

bik rahe chahun or kewal khaar hain

·

pis rahee kadamon tale insaaniyat

·

sheersh sajate paashawik wyawahaar hain

·

wakr rekhaaon se hain sahamee saral

·

ulajhanon men jyaamitik aakaar hain

·

hon bhramit naa, dekhakar aakaash ko

·

bhoomi par dam todate aadhaar hain

·

kyaa we sab hakadaar hain sammaan ke

·

kanth men jinake pade gul haar hain?

·

baandh len pul prem kaa unake lie

·

jo khade nafarat lie us paar hain

·

un jadon par beasar hain wish sabhee

·

seenchate jinako amiy-sanskaar hain

·

zindagee ko arth den, is janm men

·

‘kalpanaa’ kewal mile din chaar hain

·

- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

॥

बिक रहे चहुं ओर केवल खार हैं

॥

पिस रही कदमों तले इंसानियत

॥

शीर्ष सजते पाशविक व्यवहार हैं

॥

वक्र रेखाओं से हैं सहमी सरल

॥

उलझनों में ज्यामितिक आकार हैं

॥

हों भ्रमित ना, देखकर आकाश को

॥

भूमि पर दम तोड़ते आधार हैं

॥

क्या वे सब हकदार हैं सम्मान के

॥

कंठ में जिनके पड़े गुल हार हैं?

॥

बाँध लें पुल प्रेम का उनके लिए

॥

जो खड़े नफ़रत लिए उस पार हैं

॥

उन जड़ों पर बेअसर हैं विष सभी

॥

सींचते जिनको अमिय-संस्कार हैं

॥

ज़िंदगी को अर्थ दें, इस जन्म में

॥

‘कल्पना’ केवल मिले दिन चार हैं

॥

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗