कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १२९ / २०४ № 129 of 204 रचना १२९ / २०४
९ जुलाई २०१६ 9 July 2016 ९ जुलाई २०१६

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं kushabuon ke band sab baazaar hain ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

बिक रहे चहुं ओर केवल खार हैं

पिस रही कदमों तले इंसानियत

शीर्ष सजते पाशविक व्यवहार हैं

वक्र रेखाओं से हैं सहमी सरल

उलझनों में ज्यामितिक आकार हैं

हों भ्रमित ना, देखकर आकाश को

भूमि पर दम तोड़ते आधार हैं

क्या वे सब हकदार हैं सम्मान के

कंठ में जिनके पड़े गुल हार हैं?

बाँध लें पुल प्रेम का उनके लिए

जो खड़े नफ़रत लिए उस पार हैं

उन जड़ों पर बेअसर हैं विष सभी

सींचते जिनको अमिय-संस्कार हैं

ज़िंदगी को अर्थ दें, इस जन्म में

‘कल्पना’ केवल मिले दिन चार हैं

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

kushabuon ke band sab baazaar hain

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bik rahe chahun or kewal khaar hain

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pis rahee kadamon tale insaaniyat

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sheersh sajate paashawik wyawahaar hain

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wakr rekhaaon se hain sahamee saral

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ulajhanon men jyaamitik aakaar hain

·

hon bhramit naa, dekhakar aakaash ko

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bhoomi par dam todate aadhaar hain

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kyaa we sab hakadaar hain sammaan ke

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kanth men jinake pade gul haar hain?

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baandh len pul prem kaa unake lie

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jo khade nafarat lie us paar hain

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un jadon par beasar hain wish sabhee

·

seenchate jinako amiy-sanskaar hain

·

zindagee ko arth den, is janm men

·

‘kalpanaa’ kewal mile din chaar hain

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- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

ख़ुशबुओं के बंद सब बाज़ार हैं

बिक रहे चहुं ओर केवल खार हैं

पिस रही कदमों तले इंसानियत

शीर्ष सजते पाशविक व्यवहार हैं

वक्र रेखाओं से हैं सहमी सरल

उलझनों में ज्यामितिक आकार हैं

हों भ्रमित ना, देखकर आकाश को

भूमि पर दम तोड़ते आधार हैं

क्या वे सब हकदार हैं सम्मान के

कंठ में जिनके पड़े गुल हार हैं?

बाँध लें पुल प्रेम का उनके लिए

जो खड़े नफ़रत लिए उस पार हैं

उन जड़ों पर बेअसर हैं विष सभी

सींचते जिनको अमिय-संस्कार हैं

ज़िंदगी को अर्थ दें, इस जन्म में

‘कल्पना’ केवल मिले दिन चार हैं

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗