कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६७ / २०४ № 67 of 204 रचना ६७ / २०४
४ फ़रवरी २०१५ 4 February 2015 ४ फ़रवरी २०१५

नज़र नज़र में जो हो जाए प्यार nazar nazar men jo ho jaae pyaar नज़र नज़र में जो हो जाए प्यार

नज़र-नज़र

में जो हो जाए प्यार, क्या कहिए।

बिना

बसंत के छाए बहार, क्या कहिए।

सपन

सुहाने चले आते बंद, पलकों में

पलक

झपकते ही होते करार, क्या कहिए।

धड़कते

दिल हैं धुँधलकों में साँझ होते ही

चमकते

नैनों में जुगनू हज़ार, क्या कहिए।

घनेरी

घाम में हैं दीखते घने बादल

अमा

के चाँद से झरता उजार,

क्या कहिए।

गरम

हवा से है आती सुगंध फूलों की

भिगोता

जेठ भी बनकर फुहार,

क्या कहिए।

कदम

पहुँचते वहीं जिस जगह जुड़े दो दिल

मिलन

की चाह में चल बार-बार, क्या कहिए।

ये

“कल्पना” है अगन प्यार की भला कैसी

हो

दिन या रात न जाता ख़ुमार, क्या कहिए।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

nazar-nazar

men jo ho jaae pyaar, kyaa kahie

·

binaa

basant ke chaae bahaar, kyaa kahie

·

sapan

suhaane chale aate band, palakon men

·

palak

jhapakate hee hote karaar, kyaa kahie

·

dhadakate

dil hain dhundhalakon men saanjh hote hee

·

chamakate

nainon men juganoo hazaar, kyaa kahie

·

ghaneree

ghaam men hain deekhate ghane baadal

·

amaa

ke chaand se jharataa ujaar,

kyaa kahie

·

garam

hawaa se hai aatee sugandh phoolon kee

·

bhigotaa

jeth bhee banakar phuhaar,

kyaa kahie

·

kadam

pahunchate waheen jis jagah jude do dil

·

milan

kee chaah men chal baar-baar, kyaa kahie

·

ye

“kalpanaa” hai agan pyaar kee bhalaa kaisee

·

ho

din yaa raat n jaataa kumaar, kyaa kahie

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

नज़र-नज़र

में जो हो जाए प्यार, क्या कहिए।

बिना

बसंत के छाए बहार, क्या कहिए।

सपन

सुहाने चले आते बंद, पलकों में

पलक

झपकते ही होते करार, क्या कहिए।

धड़कते

दिल हैं धुँधलकों में साँझ होते ही

चमकते

नैनों में जुगनू हज़ार, क्या कहिए।

घनेरी

घाम में हैं दीखते घने बादल

अमा

के चाँद से झरता उजार,

क्या कहिए।

गरम

हवा से है आती सुगंध फूलों की

भिगोता

जेठ भी बनकर फुहार,

क्या कहिए।

कदम

पहुँचते वहीं जिस जगह जुड़े दो दिल

मिलन

की चाह में चल बार-बार, क्या कहिए।

ये

“कल्पना” है अगन प्यार की भला कैसी

हो

दिन या रात न जाता ख़ुमार, क्या कहिए।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗