कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३३ / २०४ № 33 of 204 रचना ३३ / २०४
१२ फ़रवरी २०१४ 12 February 2014 १२ फ़रवरी २०१४

नीड़ का निर्माण फिर फिर टल रहा है need kaa nirmaan phir phir tal rahaa hai नीड़ का निर्माण फिर फिर टल रहा है

बल भी उसके सामने निर्बल रहा है।

घोर आँधी में जो दीपक जल रहा है।

डाल रक्षित ढूँढते,

हारा पखेरू,

नीड़ का निर्माण,

फिर फिर टल रहा है।

हाथ फैलाकर खड़ा दानी कुआँ वो,

शेष बूँदें अब न जिसमें जल रहा है।

सूर्य ने अपने नियम बदले हैं जब से,

दिन हथेली पर दिया ले चल रहा है।

क्यों तुला मानव उसी को नष्ट करने,

जो हरा भू का सदा आँचल रहा है।

देखिये इस बात पर कुछ गौर करके,

आज से बेहतर हमारा कल रहा है।

मन को जिसने आज तक शीतल रखा था,

सब्र का घन धीरे-धीरे गल रहा है।

ख्वाब है जनतन्त्र का अब तक अधूरा,

आदि से जो इन दृगों में पल रहा है।

-----कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

bal bhee usake saamane nirbal rahaa hai

·

ghor aandhee men jo deepak jal rahaa hai

·

daal rakshit dhoondhate,

haaraa pakheroo,

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need kaa nirmaan,

phir phir tal rahaa hai

·

haath phailaakar khadaa daanee kuaan wo,

·

shesh boonden ab n jisamen jal rahaa hai

·

soory ne apane niyam badale hain jab se,

·

din hathelee par diyaa le chal rahaa hai

·

kyon tulaa maanaw usee ko nasht karane,

·

jo haraa bhoo kaa sadaa aanchal rahaa hai

·

dekhiye is baat par kuch gaur karake,

·

aaj se behatar hamaaraa kal rahaa hai

·

man ko jisane aaj tak sheetal rakhaa thaa,

·

sabr kaa ghan dheere-dheere gal rahaa hai

·

khvaab hai janatantr kaa ab tak adhooraa,

·

aadi se jo in driigon men pal rahaa hai

·

-----kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

बल भी उसके सामने निर्बल रहा है।

घोर आँधी में जो दीपक जल रहा है।

डाल रक्षित ढूँढते,

हारा पखेरू,

नीड़ का निर्माण,

फिर फिर टल रहा है।

हाथ फैलाकर खड़ा दानी कुआँ वो,

शेष बूँदें अब न जिसमें जल रहा है।

सूर्य ने अपने नियम बदले हैं जब से,

दिन हथेली पर दिया ले चल रहा है।

क्यों तुला मानव उसी को नष्ट करने,

जो हरा भू का सदा आँचल रहा है।

देखिये इस बात पर कुछ गौर करके,

आज से बेहतर हमारा कल रहा है।

मन को जिसने आज तक शीतल रखा था,

सब्र का घन धीरे-धीरे गल रहा है।

ख्वाब है जनतन्त्र का अब तक अधूरा,

आदि से जो इन दृगों में पल रहा है।

-----कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗