कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३४ / २०४ № 34 of 204 रचना ३४ / २०४
१५ फ़रवरी २०१४ 15 February 2014 १५ फ़रवरी २०१४

फिर बसंत का हुआ आगमन phir basant kaa huaa aagaman फिर बसंत का हुआ आगमन

बदला मौसम,

फिर बसंत का, हुआ आगमन।

खिला खुशनुमा,

फूल-तितलियों, वाला उपवन।

कुदरत के नव-रंग देखकर, प्रेम अगन में

हुआ पतंगों का भी जलने को आतुर मन।

पींगें भरने,

लगे प्रेम की, भँवरे कलियाँ

लहराता लख,

हरित पीत वसुधा का दामन।

पल-पल झरते,

पात चतुर्दिश, बिखरे-बिखरे

रस-सुगंध से,

सींच रहे हैं, सारा आँगन।

देख जुगनुओं वाली रैना, पर्वत-झरने

खा जाता है मात चाँदनी का भी यौवन।

लगता है ज्यों, भू पर उतरी एक अप्सरा

प्रीत-प्रीत बन जाता है यह मदमाता मन।

रूप प्रकृति का बना रहे यह काश! "कल्पना"

और बीत जाए इनमें,

यह सारा जीवन।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

badalaa mausam,

phir basant kaa, huaa aagaman

·

khilaa khushanumaa,

phool-titaliyon, waalaa upawan

·

kudarat ke naw-rang dekhakar, prem agan men

·

huaa patangon kaa bhee jalane ko aatur man

·

peengen bharane,

lage prem kee, bhanvare kaliyaan

·

laharaataa lakh,

harit peet wasudhaa kaa daaman

·

pal-pal jharate,

paat chaturdish, bikhare-bikhare

·

ras-sugandh se,

seench rahe hain, saaraa aangan

·

dekh juganuon waalee rainaa, parvat-jharane

·

khaa jaataa hai maat chaandanee kaa bhee yauwan

·

lagataa hai jyon, bhoo par utaree ek apsaraa

·

preet-preet ban jaataa hai yah madamaataa man

·

roop prakriiti kaa banaa rahe yah kaash! "kalpanaa"

·

aur beet jaae inamen,

yah saaraa jeewan

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

बदला मौसम,

फिर बसंत का, हुआ आगमन।

खिला खुशनुमा,

फूल-तितलियों, वाला उपवन।

कुदरत के नव-रंग देखकर, प्रेम अगन में

हुआ पतंगों का भी जलने को आतुर मन।

पींगें भरने,

लगे प्रेम की, भँवरे कलियाँ

लहराता लख,

हरित पीत वसुधा का दामन।

पल-पल झरते,

पात चतुर्दिश, बिखरे-बिखरे

रस-सुगंध से,

सींच रहे हैं, सारा आँगन।

देख जुगनुओं वाली रैना, पर्वत-झरने

खा जाता है मात चाँदनी का भी यौवन।

लगता है ज्यों, भू पर उतरी एक अप्सरा

प्रीत-प्रीत बन जाता है यह मदमाता मन।

रूप प्रकृति का बना रहे यह काश! "कल्पना"

और बीत जाए इनमें,

यह सारा जीवन।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗