पतंगों के मेले patangon ke mele पतंगों के मेले
हवाओं का पैगाम पाकर फिज़ा से
लगे आसमां में पतंगों के मेले।
हुई रवि की संक्रांति ज्योंही मकर में
विजित शीत ने अपने सामां समेटे।
उड़ा जा रहा मन परिंदों की तरहा
कि मुट्ठी में डोरी उमंगों की थामे।
बढ़े दिन, खिली धूप ने कर बढ़ाया
चमन में नए रंग मौसम के बिखरे।
मनाने लगी हर दिशा पर्व पावन
भुलाकर सभी दर्द, गुजरे दिनों के
सखी, भेज अपनों को तिल-गुड़ का न्यौता
चलो ‘कल्पना’ गीत गाएँ शगुन के।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
hawaaon kaa paigaam paakar phizaa se
lage aasamaan men patangon ke mele
huee rawi kee sankraanti jyonhee makar men
wijit sheet ne apane saamaan samete
udaa jaa rahaa man parindon kee tarahaa
ki mutthee men doree umangon kee thaame
bढ़e din, khilee dhoop ne kar bढ़aayaa
chaman men nae rang mausam ke bikhare
manaane lagee har dishaa parv paawan
bhulaakar sabhee dard, gujare dinon ke
sakhee, bhej apanon ko til-gud kaa nyautaa
chalo ‘kalpanaa’ geet gaaen shagun ke
-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
हवाओं का पैगाम पाकर फिज़ा से
लगे आसमां में पतंगों के मेले।
हुई रवि की संक्रांति ज्योंही मकर में
विजित शीत ने अपने सामां समेटे।
उड़ा जा रहा मन परिंदों की तरहा
कि मुट्ठी में डोरी उमंगों की थामे।
बढ़े दिन, खिली धूप ने कर बढ़ाया
चमन में नए रंग मौसम के बिखरे।
मनाने लगी हर दिशा पर्व पावन
भुलाकर सभी दर्द, गुजरे दिनों के
सखी, भेज अपनों को तिल-गुड़ का न्यौता
चलो ‘कल्पना’ गीत गाएँ शगुन के।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी