कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४२ / २०४ № 142 of 204 रचना १४२ / २०४
१३ जनवरी २०१७ 13 January 2017 १३ जनवरी २०१७

पतंगों के मेले patangon ke mele पतंगों के मेले

हवाओं का पैगाम पाकर फिज़ा से

लगे आसमां में पतंगों के मेले।

हुई रवि की संक्रांति ज्योंही मकर में

विजित शीत ने अपने सामां समेटे।

उड़ा जा रहा मन परिंदों की तरहा

कि मुट्ठी में डोरी उमंगों की थामे।

बढ़े दिन, खिली धूप ने कर बढ़ाया

चमन में नए रंग मौसम के बिखरे।

मनाने लगी हर दिशा पर्व पावन

भुलाकर सभी दर्द, गुजरे दिनों के

सखी, भेज अपनों को तिल-गुड़ का न्यौता

चलो ‘कल्पना’ गीत गाएँ शगुन के।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

hawaaon kaa paigaam paakar phizaa se

·

lage aasamaan men patangon ke mele

·

huee rawi kee sankraanti jyonhee makar men

·

wijit sheet ne apane saamaan samete

·

udaa jaa rahaa man parindon kee tarahaa

·

ki mutthee men doree umangon kee thaame

·

bढ़e din, khilee dhoop ne kar bढ़aayaa

·

chaman men nae rang mausam ke bikhare

·

manaane lagee har dishaa parv paawan

·

bhulaakar sabhee dard, gujare dinon ke

·

sakhee, bhej apanon ko til-gud kaa nyautaa

·

chalo ‘kalpanaa’ geet gaaen shagun ke

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हवाओं का पैगाम पाकर फिज़ा से

लगे आसमां में पतंगों के मेले।

हुई रवि की संक्रांति ज्योंही मकर में

विजित शीत ने अपने सामां समेटे।

उड़ा जा रहा मन परिंदों की तरहा

कि मुट्ठी में डोरी उमंगों की थामे।

बढ़े दिन, खिली धूप ने कर बढ़ाया

चमन में नए रंग मौसम के बिखरे।

मनाने लगी हर दिशा पर्व पावन

भुलाकर सभी दर्द, गुजरे दिनों के

सखी, भेज अपनों को तिल-गुड़ का न्यौता

चलो ‘कल्पना’ गीत गाएँ शगुन के।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗