कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८४ / २०४ № 184 of 204 रचना १८४ / २०४
१५ दिसम्बर २०१९ 15 December 2019 १५ दिसम्बर २०१९

फूल बेला के बिना{प्रेम) phool belaa ke binaa{prem) फूल बेला के बिना{प्रेम)

कंत लौटा फूल बेला के बिना

कामिनी सँवरी नहीं गजरे बिना

किस तरह स्वीकार कर ले मानिनी

और कोई फूल मन भाए बिना

रह गई माला अधूरी भाव की

गुंथ न पाई प्रेम के धागे बिना

राह तकता ही रहा बेला उधर

रात इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

देख फीके रंग ऐसे प्यार के

घन गए घर लौटकर बरसे बिना

चल पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

बाग वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

कंत बोला मान भी जाओ प्रिये

अब न आऊँगा कभी बेले बिना

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

भोर का तारा-गगन देखे बिना

kant lautaa phool belaa ke binaa

kaaminee sanvaree naheen gajare binaa

·

kis tarah sveekaar kar le maaninee

aur koee phool man bhaae binaa

·

rah gaee maalaa adhooree bhaaw kee

gunth n paaee prem ke dhaage binaa

·

raah takataa hee rahaa belaa udhar

raat idhar guzaree pranay-pal ke binaa

·

dekh pheeke rang aise pyaar ke

ghan gae ghar lautakar barase binaa

·

chal padee surabhit hawaa maayoos ho

baag waapas kushabuen baante binaa

·

kant bolaa maan bhee jaao priye

ab n aaoongaa kabhee bele binaa

·

‘kalpanaa’ sun band kaliyaan khil gaeen

bhor kaa taaraa-gagan dekhe binaa

कंत लौटा फूल बेला के बिना

कामिनी सँवरी नहीं गजरे बिना

किस तरह स्वीकार कर ले मानिनी

और कोई फूल मन भाए बिना

रह गई माला अधूरी भाव की

गुंथ न पाई प्रेम के धागे बिना

राह तकता ही रहा बेला उधर

रात इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

देख फीके रंग ऐसे प्यार के

घन गए घर लौटकर बरसे बिना

चल पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

बाग वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

कंत बोला मान भी जाओ प्रिये

अब न आऊँगा कभी बेले बिना

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

भोर का तारा-गगन देखे बिना

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗