कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८५ / २०५ № 185 of 205 रचना १८५ / २०५
१५ दिसम्बर २०१९ 15 December 2019 १५ दिसम्बर २०१९

फूल बेला के बिना{प्रेम) phool belaa ke binaa{prem) फूल बेला के बिना{प्रेम)

कंत लौटा फूल बेला के बिना

कामिनी सँवरी नहीं गजरे बिना

॥

किस तरह स्वीकार कर ले मानिनी

और कोई फूल मन भाए बिना

॥

रह गई माला अधूरी भाव की

गुंथ न पाई प्रेम के धागे बिना

॥

राह तकता ही रहा बेला उधर

रात इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

॥

देख फीके रंग ऐसे प्यार के

घन गए घर लौटकर बरसे बिना

॥

चल पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

बाग वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

॥

कंत बोला मान भी जाओ प्रिये

अब न आऊँगा कभी बेले बिना

॥

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

भोर का तारा-गगन देखे बिना

kant lautaa phool belaa ke binaa

kaaminee sanvaree naheen gajare binaa

·

kis tarah sveekaar kar le maaninee

aur koee phool man bhaae binaa

·

rah gaee maalaa adhooree bhaaw kee

gunth n paaee prem ke dhaage binaa

·

raah takataa hee rahaa belaa udhar

raat idhar guzaree pranay-pal ke binaa

·

dekh pheeke rang aise pyaar ke

ghan gae ghar lautakar barase binaa

·

chal padee surabhit hawaa maayoos ho

baag waapas kushabuen baante binaa

·

kant bolaa maan bhee jaao priye

ab n aaoongaa kabhee bele binaa

·

‘kalpanaa’ sun band kaliyaan khil gaeen

bhor kaa taaraa-gagan dekhe binaa

कंत लौटा फूल बेला के बिना

कामिनी सँवरी नहीं गजरे बिना

॥

किस तरह स्वीकार कर ले मानिनी

और कोई फूल मन भाए बिना

॥

रह गई माला अधूरी भाव की

गुंथ न पाई प्रेम के धागे बिना

॥

राह तकता ही रहा बेला उधर

रात इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

॥

देख फीके रंग ऐसे प्यार के

घन गए घर लौटकर बरसे बिना

॥

चल पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

बाग वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

॥

कंत बोला मान भी जाओ प्रिये

अब न आऊँगा कभी बेले बिना

॥

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

भोर का तारा-गगन देखे बिना

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗