सच की सरिता sach kee saritaa सच की सरिता
जिनके मन में सच की सरिता बहती है
कुदरत भी उनकी होती हमजोली है
जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस
तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है
शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई
गुण, भावों की होती कभी न चोरी है
होते वे ही जलील जहां के तानों से
बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है
खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की
इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है
बनी कौन सी सुई, सिये जो सच के होंठ?
किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है
पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का
माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है
कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी
रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है
jinake man men sach kee saritaa bahatee hai
kudarat bhee unakee hotee hamajolee hai
jab-jab bढ़te lobh, paap, santraas, tamas
tab-tab kawitaa mukharit hokar bolee hai
shabd, ibaarat, kaagaz chaahe churaae koee
gun, bhaawon kee hotee kabhee n choree hai
hote we hee jaleel jahaan ke taanon se
bech zameer jinhonne ‘waah’ batoree hai
khoden khal buniyaad laakh achchaaee kee
is zameen men bandhu! bahut bal baakee hai
banee kaun see suee, siye jo sach ke honth?
kie jinhonne jatan, maat hee khaaee hai
paanee marataa dekh kutil besharmon kaa
maan dharatee bhee huee sharm se paanee hai
kalam ‘kalpanaa’ hai nirdosh rasit jisakee
rachanaa usakee khud wijnaapan hotee hai
जिनके मन में सच की सरिता बहती है
कुदरत भी उनकी होती हमजोली है
जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस
तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है
शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई
गुण, भावों की होती कभी न चोरी है
होते वे ही जलील जहां के तानों से
बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है
खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की
इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है
बनी कौन सी सुई, सिये जो सच के होंठ?
किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है
पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का
माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है
कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी
रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है