कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८३ / २०४ № 183 of 204 रचना १८३ / २०४
१२ दिसम्बर २०१९ 12 December 2019 १२ दिसम्बर २०१९

सच की सरिता sach kee saritaa सच की सरिता

जिनके मन में सच की सरिता बहती है

कुदरत भी उनकी होती हमजोली है

जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस

तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई

गुण, भावों की होती कभी न चोरी है

होते वे ही जलील जहां के तानों से

बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की

इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है

बनी कौन सी सुई, सिये जो सच के होंठ?

किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का

माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी

रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है

jinake man men sach kee saritaa bahatee hai

kudarat bhee unakee hotee hamajolee hai

·

jab-jab bढ़te lobh, paap, santraas, tamas

tab-tab kawitaa mukharit hokar bolee hai

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shabd, ibaarat, kaagaz chaahe churaae koee

gun, bhaawon kee hotee kabhee n choree hai

·

hote we hee jaleel jahaan ke taanon se

bech zameer jinhonne ‘waah’ batoree hai

·

khoden khal buniyaad laakh achchaaee kee

is zameen men bandhu! bahut bal baakee hai

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banee kaun see suee, siye jo sach ke honth?

kie jinhonne jatan, maat hee khaaee hai

·

paanee marataa dekh kutil besharmon kaa

maan dharatee bhee huee sharm se paanee hai

·

kalam ‘kalpanaa’ hai nirdosh rasit jisakee

rachanaa usakee khud wijnaapan hotee hai

जिनके मन में सच की सरिता बहती है

कुदरत भी उनकी होती हमजोली है

जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस

तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई

गुण, भावों की होती कभी न चोरी है

होते वे ही जलील जहां के तानों से

बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की

इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है

बनी कौन सी सुई, सिये जो सच के होंठ?

किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का

माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी

रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗