कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३८ / २०४ № 38 of 204 रचना ३८ / २०४
७ अप्रैल २०१४ 7 April 2014 ७ अप्रैल २०१४

समय हमें क्या दिखा रहा है samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai समय हमें क्या दिखा रहा है

समय हमें क्या दिखा रहा है।

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

कोई बनाता है घर तो कोई,

बने हुए को ढहा रहा है।

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

वो रोशनी में नहा रहा है।

गुलों को माली ही बेदखल कर,

चमन में काँटे उगा रहा है।

कुचलता आया जहाँ उसी को,

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

जो जग की खातिर उगाता रोटी,

वो भूख से बिलबिला रहा है।

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

सदा ही खाली घड़ा रहा है।

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

गज़ल को ये गम सता रहा है।

ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,

दुखों का ही दिल दुखा रहा है।

------कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai

·

kahaan zamaanaa ye jaa rahaa hai

·

koee banaataa hai ghar to koee,

·

bane hue ko dhahaa rahaa hai

·

bujhaae laakhon ke deep jisane,

·

wo roshanee men nahaa rahaa hai

·

gulon ko maalee hee bedakhal kar,

·

chaman men kaante ugaa rahaa hai

·

kuchalataa aayaa jahaan usee ko,

·

jo phool khushaboo lutaa rahaa hai

·

jo jag kee khaatir ugaataa rotee,

·

wo bhookh se bilabilaa rahaa hai

·

ho baaढ़ yaa sookhaa deen kaa to,

·

sadaa hee khaalee ghadaa rahaa hai

·

khaphaa hain kyon kaaphiye bahar se,

·

gazal ko ye gam sataa rahaa hai

·

ye “kalpanaa” rab kaa nyaay kaisaa,

·

dukhon kaa hee dil dukhaa rahaa hai

·

------kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

समय हमें क्या दिखा रहा है।

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

कोई बनाता है घर तो कोई,

बने हुए को ढहा रहा है।

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

वो रोशनी में नहा रहा है।

गुलों को माली ही बेदखल कर,

चमन में काँटे उगा रहा है।

कुचलता आया जहाँ उसी को,

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

जो जग की खातिर उगाता रोटी,

वो भूख से बिलबिला रहा है।

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

सदा ही खाली घड़ा रहा है।

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

गज़ल को ये गम सता रहा है।

ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,

दुखों का ही दिल दुखा रहा है।

------कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗