समय हमें क्या दिखा रहा है samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai समय हमें क्या दिखा रहा है
समय हमें क्या दिखा रहा है।
कहाँ ज़माना ये जा रहा है।
कोई बनाता है घर तो कोई,
बने हुए को ढहा रहा है।
बुझाए लाखों के दीप जिसने,
वो रोशनी में नहा रहा है।
गुलों को माली ही बेदखल कर,
चमन में काँटे उगा रहा है।
कुचलता आया जहाँ उसी को,
जो फूल खुशबू लुटा रहा है।
जो जग की खातिर उगाता रोटी,
वो भूख से बिलबिला रहा है।
हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,
सदा ही खाली घड़ा रहा है।
खफा हैं क्यों काफिये बहर से,
गज़ल को ये गम सता रहा है।
ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,
दुखों का ही दिल दुखा रहा है।
------कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai
kahaan zamaanaa ye jaa rahaa hai
koee banaataa hai ghar to koee,
bane hue ko dhahaa rahaa hai
bujhaae laakhon ke deep jisane,
wo roshanee men nahaa rahaa hai
gulon ko maalee hee bedakhal kar,
chaman men kaante ugaa rahaa hai
kuchalataa aayaa jahaan usee ko,
jo phool khushaboo lutaa rahaa hai
jo jag kee khaatir ugaataa rotee,
wo bhookh se bilabilaa rahaa hai
ho baaढ़ yaa sookhaa deen kaa to,
sadaa hee khaalee ghadaa rahaa hai
khaphaa hain kyon kaaphiye bahar se,
gazal ko ye gam sataa rahaa hai
ye “kalpanaa” rab kaa nyaay kaisaa,
dukhon kaa hee dil dukhaa rahaa hai
------kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
समय हमें क्या दिखा रहा है।
कहाँ ज़माना ये जा रहा है।
कोई बनाता है घर तो कोई,
बने हुए को ढहा रहा है।
बुझाए लाखों के दीप जिसने,
वो रोशनी में नहा रहा है।
गुलों को माली ही बेदखल कर,
चमन में काँटे उगा रहा है।
कुचलता आया जहाँ उसी को,
जो फूल खुशबू लुटा रहा है।
जो जग की खातिर उगाता रोटी,
वो भूख से बिलबिला रहा है।
हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,
सदा ही खाली घड़ा रहा है।
खफा हैं क्यों काफिये बहर से,
गज़ल को ये गम सता रहा है।
ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,
दुखों का ही दिल दुखा रहा है।
------कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी