कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३९ / २०५ № 39 of 205 रचना ३९ / २०५
७ अप्रैल २०१४ 7 April 2014 ७ अप्रैल २०१४

समय हमें क्या दिखा रहा है samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai समय हमें क्या दिखा रहा है

समय हमें क्या दिखा रहा है।

॥

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

॥

कोई बनाता है घर तो कोई,

॥

बने हुए को ढहा रहा है।

॥

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

॥

वो रोशनी में नहा रहा है।

॥

गुलों को माली ही बेदखल कर,

॥

चमन में काँटे उगा रहा है।

॥

कुचलता आया जहाँ उसी को,

॥

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

॥

जो जग की खातिर उगाता रोटी,

॥

वो भूख से बिलबिला रहा है।

॥

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

॥

सदा ही खाली घड़ा रहा है।

॥

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

॥

गज़ल को ये गम सता रहा है।

॥

ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,

॥

दुखों का ही दिल दुखा रहा है।

॥

------कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

samay hamen kyaa dikhaa rahaa hai

·

kahaan zamaanaa ye jaa rahaa hai

·

koee banaataa hai ghar to koee,

·

bane hue ko dhahaa rahaa hai

·

bujhaae laakhon ke deep jisane,

·

wo roshanee men nahaa rahaa hai

·

gulon ko maalee hee bedakhal kar,

·

chaman men kaante ugaa rahaa hai

·

kuchalataa aayaa jahaan usee ko,

·

jo phool khushaboo lutaa rahaa hai

·

jo jag kee khaatir ugaataa rotee,

·

wo bhookh se bilabilaa rahaa hai

·

ho baaढ़ yaa sookhaa deen kaa to,

·

sadaa hee khaalee ghadaa rahaa hai

·

khaphaa hain kyon kaaphiye bahar se,

·

gazal ko ye gam sataa rahaa hai

·

ye “kalpanaa” rab kaa nyaay kaisaa,

·

dukhon kaa hee dil dukhaa rahaa hai

·

------kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

समय हमें क्या दिखा रहा है।

॥

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

॥

कोई बनाता है घर तो कोई,

॥

बने हुए को ढहा रहा है।

॥

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

॥

वो रोशनी में नहा रहा है।

॥

गुलों को माली ही बेदखल कर,

॥

चमन में काँटे उगा रहा है।

॥

कुचलता आया जहाँ उसी को,

॥

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

॥

जो जग की खातिर उगाता रोटी,

॥

वो भूख से बिलबिला रहा है।

॥

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

॥

सदा ही खाली घड़ा रहा है।

॥

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

॥

गज़ल को ये गम सता रहा है।

॥

ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,

॥

दुखों का ही दिल दुखा रहा है।

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------कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗