कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८२ / २०४ № 82 of 204 रचना ८२ / २०४
१ अप्रैल २०१५ 1 April 2015 १ अप्रैल २०१५

सूरज उगलता आग जो बागान से गया sooraj ugalataa aag jo baagaan se gayaa सूरज उगलता आग जो बागान से गया

सूरज

उगलता आग जो बागान से गया

जिस

गुल पे प्यार आया, वो पहचान से गया

खाती

हैं गर्मियाँ भला किस खेत का अनाज

फसलों

का दाना-दाना तो खलिहान से गया

बहते

पसीने को जो दिखाया, घड़ा-गिलास

देके

दुवाएँ लाखों, दिलो-जान से गया

दहते

दिनों ने ऐसी है दहशत परोस दी

दानी

कुआँ भी मौके पे जलदान से गया

क्या

करता प्यासा पाखी, उड़ा लू लपेटकर

पानी

तलाशने जो गया प्राण से गया

पहुँचा

वो देर से ज़रा, मित्रों के भोज में

था

जश्न शेष, जल न था, जलपान से गया

वैसाख

पूर्णिमा की कथा, ध्यान से सुनो

नदिया

नहाने जो भी गया, स्नान से गया

खुश

‘कल्पना’ तो हो रहा भू को निचोड़कर

इंसान, खुद ही

सृष्टि के वरदान से गया

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

sooraj

ugalataa aag jo baagaan se gayaa

·

jis

gul pe pyaar aayaa, wo pahachaan se gayaa

·

khaatee

hain garmiyaan bhalaa kis khet kaa anaaj

·

phasalon

kaa daanaa-daanaa to khalihaan se gayaa

·

bahate

paseene ko jo dikhaayaa, ghadaa-gilaas

·

deke

duwaaen laakhon, dilo-jaan se gayaa

·

dahate

dinon ne aisee hai dahashat paros dee

·

daanee

kuaan bhee mauke pe jaladaan se gayaa

·

kyaa

karataa pyaasaa paakhee, udaa loo lapetakar

·

paanee

talaashane jo gayaa praan se gayaa

·

pahunchaa

wo der se zaraa, mitron ke bhoj men

·

thaa

jashn shesh, jal n thaa, jalapaan se gayaa

·

waisaakh

poornimaa kee kathaa, dhyaan se suno

·

nadiyaa

nahaane jo bhee gayaa, snaan se gayaa

·

khush

‘kalpanaa’ to ho rahaa bhoo ko nichodakar

·

insaan, khud hee

sriishti ke waradaan se gayaa

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सूरज

उगलता आग जो बागान से गया

जिस

गुल पे प्यार आया, वो पहचान से गया

खाती

हैं गर्मियाँ भला किस खेत का अनाज

फसलों

का दाना-दाना तो खलिहान से गया

बहते

पसीने को जो दिखाया, घड़ा-गिलास

देके

दुवाएँ लाखों, दिलो-जान से गया

दहते

दिनों ने ऐसी है दहशत परोस दी

दानी

कुआँ भी मौके पे जलदान से गया

क्या

करता प्यासा पाखी, उड़ा लू लपेटकर

पानी

तलाशने जो गया प्राण से गया

पहुँचा

वो देर से ज़रा, मित्रों के भोज में

था

जश्न शेष, जल न था, जलपान से गया

वैसाख

पूर्णिमा की कथा, ध्यान से सुनो

नदिया

नहाने जो भी गया, स्नान से गया

खुश

‘कल्पना’ तो हो रहा भू को निचोड़कर

इंसान, खुद ही

सृष्टि के वरदान से गया

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗