कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८३ / २०५ № 83 of 205 रचना ८३ / २०५
१ अप्रैल २०१५ 1 April 2015 १ अप्रैल २०१५

सूरज उगलता आग जो बागान से गया sooraj ugalataa aag jo baagaan se gayaa सूरज उगलता आग जो बागान से गया

सूरज

उगलता आग जो बागान से गया

॥

जिस

गुल पे प्यार आया, वो पहचान से गया

॥

खाती

हैं गर्मियाँ भला किस खेत का अनाज

॥

फसलों

का दाना-दाना तो खलिहान से गया

॥

बहते

पसीने को जो दिखाया, घड़ा-गिलास

॥

देके

दुवाएँ लाखों, दिलो-जान से गया

॥

दहते

दिनों ने ऐसी है दहशत परोस दी

॥

दानी

कुआँ भी मौके पे जलदान से गया

॥

क्या

करता प्यासा पाखी, उड़ा लू लपेटकर

॥

पानी

तलाशने जो गया प्राण से गया

॥

पहुँचा

वो देर से ज़रा, मित्रों के भोज में

॥

था

जश्न शेष, जल न था, जलपान से गया

॥

वैसाख

पूर्णिमा की कथा, ध्यान से सुनो

॥

नदिया

नहाने जो भी गया, स्नान से गया

॥

खुश

‘कल्पना’ तो हो रहा भू को निचोड़कर

॥

इंसान, खुद ही

सृष्टि के वरदान से गया

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

sooraj

ugalataa aag jo baagaan se gayaa

·

jis

gul pe pyaar aayaa, wo pahachaan se gayaa

·

khaatee

hain garmiyaan bhalaa kis khet kaa anaaj

·

phasalon

kaa daanaa-daanaa to khalihaan se gayaa

·

bahate

paseene ko jo dikhaayaa, ghadaa-gilaas

·

deke

duwaaen laakhon, dilo-jaan se gayaa

·

dahate

dinon ne aisee hai dahashat paros dee

·

daanee

kuaan bhee mauke pe jaladaan se gayaa

·

kyaa

karataa pyaasaa paakhee, udaa loo lapetakar

·

paanee

talaashane jo gayaa praan se gayaa

·

pahunchaa

wo der se zaraa, mitron ke bhoj men

·

thaa

jashn shesh, jal n thaa, jalapaan se gayaa

·

waisaakh

poornimaa kee kathaa, dhyaan se suno

·

nadiyaa

nahaane jo bhee gayaa, snaan se gayaa

·

khush

‘kalpanaa’ to ho rahaa bhoo ko nichodakar

·

insaan, khud hee

sriishti ke waradaan se gayaa

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सूरज

उगलता आग जो बागान से गया

॥

जिस

गुल पे प्यार आया, वो पहचान से गया

॥

खाती

हैं गर्मियाँ भला किस खेत का अनाज

॥

फसलों

का दाना-दाना तो खलिहान से गया

॥

बहते

पसीने को जो दिखाया, घड़ा-गिलास

॥

देके

दुवाएँ लाखों, दिलो-जान से गया

॥

दहते

दिनों ने ऐसी है दहशत परोस दी

॥

दानी

कुआँ भी मौके पे जलदान से गया

॥

क्या

करता प्यासा पाखी, उड़ा लू लपेटकर

॥

पानी

तलाशने जो गया प्राण से गया

॥

पहुँचा

वो देर से ज़रा, मित्रों के भोज में

॥

था

जश्न शेष, जल न था, जलपान से गया

॥

वैसाख

पूर्णिमा की कथा, ध्यान से सुनो

॥

नदिया

नहाने जो भी गया, स्नान से गया

॥

खुश

‘कल्पना’ तो हो रहा भू को निचोड़कर

॥

इंसान, खुद ही

सृष्टि के वरदान से गया

॥

-कल्पना रामानी

॥

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗