कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ८७ / ११४ № 87 of 114 रचना ८७ / ११४
१४ नवम्बर २०१९ 14 November 2019 १४ नवम्बर २०१९

अधूरी प्रेम कहानी adhooree prem kahaanee अधूरी प्रेम कहानी

रात के १२ बज चुके थे मगर मनीष की आँखों से नींद गायब थी. उसकी अधूरी प्रेम कहानी आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी. पेशे से तो वो इंजीनियर था मगर उसे कहानी लेखन का भी बड़ा शौक था. हर विषय पर उसकी पकड़ थी और उसके धाराप्रवाह लेखन का मुकाबला कम लेखक ही कर पाते थे. स्तरीय पत्रिकाओं में उसकी कहानियों की माँग बनी ही रहती थी. फलस्वरूप प्रकाशकों से उचित मानदेय भी उसे मिल जाता था.

साल भर पहले ही उसका विवाह उसीके गाँव की लड़की जया के साथ हुआ था. लेकिन नौकरी के कारण दोनों शहर में आकर रहने लगे थे. पढी लिखी जया सुन्दर होने के साथ ही सीधी साधी और समझदार भी थी. मनीष भी उसे अत्यधिक प्यार करता था.

विवाह से पहले मनीष की हर कहानी एक सप्ताह के अन्दर पूरी हो जाती थी मगर अब उसे कोई भी कहानी पूरी करने में एक महीने से भी अधिक समय लग जाता था. लिखने के लिए उसे रात का समय ही उपयुक्त लगता था लेकिन जैसे ही लिखने बैठता, तो निकट ही पलंग पर उसके इंतजार में लेटी हुई जया की उपस्थिति उसका ध्यान भंग कर देती थी. और वो दो चार पंक्तियाँ घसीटकर उठ जाया करता था.

इस बार एक नामी पत्रिका के सम्पादक ने अपने प्रेम-कथा विशेषांक के लिए एक प्रेम कहानी लिखने का न केवल अनुरोध किया था, बल्कि दो गुने मानदेय के साथ एक सप्ताह के अन्दर पूरी करके भेजने का दबाव भी बनाया था. अब भला जया के होते हुए यह कैसे संभव होता, तो काफी विचार के बाद उसने एक सप्ताह के लिए उसे  मायके भेजने का मन बनाया.

जया से बात करके जब उसने उसे अपनी दुविधा बताई तो वो तुरंत जाने के लिए तैयार हो गई. गाँव निकट ही था अतः जया ने बस द्वारा जाना तय किया. ससुराल और मायका एक ही गाँव में होने के कारण उसने वहाँ दोनों घरों में अपने आने की सूचना भेज दी.

जया के जाते ही मनीष ने अपना पूरा ध्यान कहानी पर केन्द्रित करना चाहा. क्योंकि वो प्रेम-कहानी पहली बार लिख रहा था. अतः दफ्तर में भी पूरा दिन उसके दिमाग में उसकी रूपरेखा बनती रही थी.

रात में जैसे ही वो लिखने बैठा तो जया के बिना घर भूत-खाना नज़र आने लगा. न जाने क्यों उसके भाव ही नहीं बन रहे थे. सोचने लगा कि जया होती तो उसका उत्साह वर्धन ही करती... उसने उसे भेजकर शायद गलती की है. मगर अब वो क्या करे?

इसी सोच में डूबे  हुए मनीष का ध्यान अचानक रसोई से आती हुई आवाजों ने भंग किया. वो देखने के लिए अन्दर गया तो वहाँ का नज़ारा देखकर दंग रह गया.

रसोईघर में चहल-पहल मची हुई थी. सारे बर्तन अपने अपने दडबों से निकलकर इधर-उधर उछल-कूद मचा रहे थे. तभी एक बड़े से भगोने को आता देखकर सब चुप हो गए. वो शायद सबका नेता था. शीघ्र ही उसने रसोई के गैस चूल्हे के पास अपना स्थान ग्रहण किया और आदेशात्मक लहजे में सबको संबोधित करते हुए कहा.

मित्रो, मेरी बात ध्यान से सुनिए. इस घर का स्वामी एक प्रेम-कहानी में उलझा हुआ है और शुरू नहीं कर पा रहा. मैं चाहता हूँ कि हम उसकी इस कार्य में सहायता करें...मगर कैसे...इस बात पर चर्चा करने के लिए ही मैंने आप सबको आमंत्रित किया है.

भगोने की बात सुनकर एक बड़े से लोटे ने आगे आकर बोलने की अनुमति माँगी. भगोने की स्वीकृति पाकर वो उत्साह से बोलने लगा-

मित्रो, ज़रा सोचकर बताइए कि क्या प्रेयसी की अनुपस्थिति में भी कोई प्रेम कहानी संपन्न हो सकती है?

सभी बर्तन एक साथ ठठाकर हँसते हुए बोल उठे-

नहीं... कभी नहीं...

लोटे ने आगे कहा-

तो मित्रो, हमें ही अब मालकिन की अनुपस्थिति में मालिक को  इस तरह सम्मोहित करना होगा कि वो यथा शीघ्र मालकिन को घर वापस ले आए. इसके लिए मैं भगोने महाशय के सामने अपना प्रस्ताव रखता हूँ कि इस कार्य को वे अपने नेतृत्व में शुरू करवाएं.

भगोने ने लोटे का इशारा समझकर कुछ दूरी पर बैठी कढ़ाई को आँख मारकर इशारे  से पास बुलाया. कढ़ाई कुछ शरमाती कुछ मुस्काती भगोने के निकट सरक आई. भगोना अपनी स्थूलकाय प्रेमिका की गोद में बैठ गया. नेता की रंगीन मिजाजी देखकर रसोईघर में जैसे भूचाल ही आ गया. सभी साजन जोड़ी बनाने के लिए सजनियों को फुसलाने में जुट गए. गिलास थाली का आलिंगन करते नज़र आए तो चमचों ने कटोरियों को गले लगाना शुरू कर दिया.  डिब्बे सरककर बरनियों से गलबहियां करने चले. चिमटे ने संड़सी को बगल में बिठा दिया तो तवे ने खुरपी के साथ जोड़ी बना ली.

यही नहीं उन सबके शोरगुल से फ्रिज के अन्दर सोए हुए फल सब्जी भी जाग गए और एक के बाद एक अपनी अलग-अलग थैलियों से निकलकर बाहर आने लगे. सबको जोड़ी बनाते देखकर उन्होंने भी जाति-धर्म का निर्वाह करते हुए जोड़ियाँ बना लीं. तोरई का हाथ टिंडे ने थामा तो लौकी के मन को कद्दू भा गया. सलाद के लिए एक साथ रखी हुई गाजर-मूलियाँ सहारे के लिए टमाटरों को लुभाने में लग गईं तो सहजन फली आलू का प्रणय निवेदन स्वीकार करके गर्व से उसकी तरफ बढ़ गई. बाकी जो साजन या सजनियाँ जोड़ी नहीं बना सके, वे एक साथ मित्रवत मिलकर खड़े हो गए. अब सबको अपने बॉस भगोने के अगले आदेश का इंतज़ार था.

भगोने ने सबको एक गोल घेरा बनाकर खड़े होने का आदेश दिया और स्वयंसेवक प्याज को म्युज़िक चालू करने के लिए कहा. मनीष तो वैसे ही हँस-हँसकर लोटपोट हुआ जा रहा था, म्युज़िक ऑन होते ही सबके बीच पहुंचकर वो भी थिरकने लगा.

थोड़ी देर बाद सेवफल ने अंत्याक्षरी का प्रस्ताव रखा जो बहुमत से पारित हो गया. सब अपनी-अपनी बारी पर प्रेम प्रदर्शित करने वाले गीत गा गाकर सुनाने लगे. तभी अचानक डोर बेल बजी और मनीष की नींद खुल गई. खुद को पसीने से तरबतर बिस्तर पर देखकर वो समझ गया कि वो सपना देख रहा था.

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अलसाए मनीष ने आँखें मलते हुए द्वार खोला. उसका अनुमान सही था, काम वाली राधा बाई थी. राधा ने ज्योंही रसोई में प्रवेश किया तो वहाँ का नज़ारा देकर उसकी आँखें झपकना ही भूल गईं. रसोई का सारा सामान अस्त-व्यस्त देखकर उलटे पाँव बाहर आई और हाँफते हुए मनीष से कहने लगी-

बाबूजी, ज़रा चलकर देखिये, सारी रसोई अस्तव्यस्त पड़ी है, लगता है रात में कोई चोर घर में घुसा है और आपको पता ही नहीं चला.

मनीष ने हैरानी से कहा-

ऐसा कैसे हो सकता है राधा बाई...चलो मैं देखता हूँ.

लेकिन रसोई में प्रवेश के साथ ही सपने वाला सारा घटनाक्रम चलचित्र की तरह उसके आगे सजीव हो उठा. सब कुछ वैसा ही तो था जैसा उसने देखा था. केवल अब किसी भी वस्तु में हलचल नहीं हो रही थी. मगर यह सत्य कैसे हो गया.

न जाने क्या पहेली है. किससे पूछे और किसे सुनाए. सुनाने वाली को तो उसने

बिना दोष के सजा भोगने के लिए भेज दिया था...उसने लापरवाही से सर झटक कर राधा को सपने वाली बात न सुनाकर सामान व्यवस्थित करने के लिए कहा. राधा ने मनीष की बात तो मान ली लेकिन उसके मन में डर ने डेरा डाल ही लिया था. अपना काम निपटाकर वो जाते-जाते मनीष को सावधान रहने की हिदायत देना न भूली.

राधा अधेड़ उम्र की महिला थी और इस घर में मनीष की शादी के बाद से ही काम करती आई थी अतः मनीष ने उसके प्रति सम्मान दिखाते हुए हामी भरी लेकिन वास्तविकता क्या थी इसके लिए उसे चिंता ने घेर लिया.

इसी उधेड़बुन में वो तैयार होकर दफ्तर चला गया. रात में मन ही मन कहानी पूरी करने का संकल्प करके टेबललैम्प जलाकर बैठा तो सही मगर सपने वाली लोटे की आवाजें बार-बार गूँजकर उसका ध्यान भंग करने लगीं.

“बिना प्रेयसी के भी कभी प्रेम-कहानी पूरी हुई है?...”

क्या सचमुच उसकी कहानी प्रेयसी यानी जया के बिना पूरी नहीं होगी? उसे जया की याद सताने लगी. सूनी दीवारें देखकर उसका लिखने का सारा उत्साह ही जाता रहा. वो होती तो उसे उलाहने भी देती और बीच-बीच में चाय-पानी भी पूछती रहती. जया के होने का अहसास ही उसकी कलम को ऊर्जावान बना देता था. अब कैसे उसकी कहानी पूरी होगी. कल का दिन तो बिना कुछ लिखे बेकार गया ही साथ ही सपने वाली घटना ने उसके जोश का किला ही ध्वस्त कर दिया.

एक बार उठकर उसने सावधानी से सारे घर का  निरीक्षण किया फिर अपना ध्यान पुनः कहानी पर केन्द्रित करने का प्रयास किया. कलम तो तैयार थी मगर दिल-दिमाग ने आज भी साथ नहीं दिया. टेबल पर बैठे-बैठे वो कब सोया और नींद में खोया उसे पता ही नहीं चला. सुबह जब राधा बाई ने बेल बजाई तो उसे याद आया कि आज भी रात में उसने वही सपना देखा था. वो धड़कते दिल से राधा के साथ ही रसोई तक चला गया तो पुनः कल वाला नज़ारा देखकर घबराहट के मारे काँप उठा. आज भी वही नज़ारा...? आखिर उसका सपना हूबहू सच कैसे हो रहा है? उसने राधा को डरा हुआ देखकर सांत्वना दी और स्वयं को काबू में रखकर जया को फोन करके वापस आने के लिए कह दिया.

जया ने पूछा-

“ऐसे अचानक बुला रहे हो मनी, सब कुछ ठीक तो है न...तुम्हारी कहानी पूरी हो गई क्या?”

“नहीं...बिना प्रेयसी के भी कोई प्रेमकहानी पूरी हो सकती है क्या? कुछ भी ठीक नहीं है तुम आज ही बस पकड़कर रात तक पहुँच जाओ.” मनीष ने लोटे की कही हुई बात दोहराते हुए कहा.

“आखिर आ गए न सही रास्ते पर...मैं जानती थी यही होने वाला है.”

“तुम्हें कैसे पता कि क्या होने वाला है...वो तो सपना...”

“कैसा सपना मनी...बताओ न”

“बस यों ही...कुछ विशेष नहीं, बस तुम आओ तो फिर बताऊंगा. अभी दफ्तर को देर हो जाएगी”

कहते हुए मनीष ने फोन काट दिया, मन ही मन वो डरा हुआ तो था लेकिन राधा के सामने सामान्य दिखने का प्रयास करता रहा और जया के आने की सूचना भी दी.

राधा  ने जया के आने तक चुप रहना ही ठीक समझा और सब कुछ सहेजकर काम पूरा करके चली गई.

रात में जया के घर पहुँचने पर ही मनीष की जान में जान आई. उसने उसे फ्रेश होने के लिए कहकर सुबह का बना हुआ खाना गर्म करके टेबल पर रख दिया. वो आज के दिन कहानी न लिखकर जल्दी ही बिस्तर पर जाने के मूड में था. मगर जया ने सपने वाली बात सुने बिना खाना खाने से इनकार कर दिया. आखिर मनीष ने उसे विस्तार से सारी बातें बताईं तो वो इसे मनीष का वहम बताकर हँसते हुए टालने लगी मगर बात की गंभीरता को महसूस करके मन ही मन उसने उसकी तह तक जाने का निश्चय कर लिया. आखिर सपने की बात हूबहू सच कैसे होती है. उसकी चिंता स्वाभाविक ही थी. दो दिन उसके बाहर रहने से ऐसी क्या बात हो गई जिसने मनीष का चैन लूट लिया है.

खाना खाकर उसने मनीष से थकी होने का बहाना करके आराम करने की इच्छा जताई और उसे कहानी आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया. मनीष तो उसे बाँहों में लेने को व्याकुल था मगर जया की अनिच्छा के कारण उसने सब्र करना ही उचित समझा. वो अपनी टेबल पर आकर लिखने का प्रयास करने लगा और जया आँखें बंद करके निद्रामग्न होने का बहाना करके जागती रही. आखिर इतनी गंभीर बात को एकदम नकारा भी कैसे जा सकता है.

समय गुजरता रहा और वो कनखियों से मनीष को ताकती रही. उसे याद आया कि लिखने के बीच मनीष को चाय की तलब लगती है. लेकिन इस समय उठकर चाय बनाने और उसके निकट जाने से उसकी एकाग्रता टूट जाएगी और यह आज नहीं होना चाहिए. वैसे भी वो दो दिन बिना चाय के रह लिया है तो आज भी सही... आखिर १२ बजते बजते उसने देखा मनीष को टेबल पर ही झपकी लग गई थी. जया को उसका हाल देखकर प्यार उमड़ आया और वो ख्यालों में मिलन के मधुर क्षणों को जीने लगी. वो सोच ही रही थी कि मनीष को उठाकर बुला ले कि अचनाक मनीष उठकर बिना इधर-उधर देखे रसोई की तरफ बढ़ रहा था.

जया ने सोचा- पानी पीने के लिए उठा है, अब तो पलंग पर ही सोने आएगा.

मगर ये क्या? अन्दर से खटपट सी आ रही है...मनीष क्या कर रहा है? चाय तो नहीं बना रहा...? चलकर देखती हूँ...मन ही मन विचार करके जया भी रसोई में पहुँच गई और जो कुछ उसने देखा तो आश्चर्य चकित होकर रह गई.

मनीष सिलसिलेवार उन्हीं क्रियाकलापों को अंजाम दे रहा था जो उसने सपने में देखने की बात कही थी. सारा उलटफेर करने के बाद वो अचानक रसोई के बीचों-बीच थिरकने लगा.

यह सब देखकर पहले तो जया की हँसी छूट गई पर अगले ही पल मनीष की सेहत को लेकर वो चिंता में डूब गई.

“यह शायद कहानी पूरी न होने से उपजे हुए तनाव का परिणाम है जो नींद में चलने की बीमारी में बदल चुका है. इस समय तो उसे मनीष को असलियत से रूबरू करवाना ही है, फिर कल ही किसी मनोवैज्ञानिक से मिलना मुनासिब होगा.”

वो दौड़कर मोबाइल ले आई और फुल स्पीड पर म्युज़िक ऑन करके मोबाइल एक तरफ रखकर अपना एक हाथ मनीष की कमर में और एक उसके कंधे पर रखकर थिरकते हुए उसे खुद से सटा लिया.

जया का स्पर्श पाते ही मनीष की तंद्रा टूट गई और आँखें मल-मलकर अविश्वसनीय नज़रों से चारों ओर ताकने लगा. जया अब मनीष की नींद टूटी जानकर ठहाके लगाकर हँसने लगी. मनीष पहले तो नर्वस होकर मुँह छिपाने लगा मगर अगले ही पल सारी वस्तुस्थिति भाँपकर जया की हँसी में शामिल हो गया.

फिर हँसते हुए ही जया को अपनी गोद में उठाकर बिस्तर तक ले आया और कहने लगा –

“आज तो सचमुच इन बेजान वस्तुओं ने मेरी भावनाओं को जगाकर प्रेम कथा  का सूत्र समझा दिया है डियर...अब मेरी किताबी प्रेम-कहानी तो अवश्य समय पर पूरी हो जाएगी मगर उससे पहले मुझे अपनी असली प्रेम-कहानी को अंजाम देना होगा.” कहते हुए उसने जया को पलंग पर लिटाकर घर की सारी बत्तियाँ बुझा दीं.

- कल्पना रामानी (नवी मुम्बई)

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jayaa ne sochaa- paanee peene ke lie uthaa hai, ab to palang par hee sone aaegaa

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- kalpanaa raamaanee (nawee mumbaee)

रात के १२ बज चुके थे मगर मनीष की आँखों से नींद गायब थी. उसकी अधूरी प्रेम कहानी आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी. पेशे से तो वो इंजीनियर था मगर उसे कहानी लेखन का भी बड़ा शौक था. हर विषय पर उसकी पकड़ थी और उसके धाराप्रवाह लेखन का मुकाबला कम लेखक ही कर पाते थे. स्तरीय पत्रिकाओं में उसकी कहानियों की माँग बनी ही रहती थी. फलस्वरूप प्रकाशकों से उचित मानदेय भी उसे मिल जाता था.

साल भर पहले ही उसका विवाह उसीके गाँव की लड़की जया के साथ हुआ था. लेकिन नौकरी के कारण दोनों शहर में आकर रहने लगे थे. पढी लिखी जया सुन्दर होने के साथ ही सीधी साधी और समझदार भी थी. मनीष भी उसे अत्यधिक प्यार करता था.

विवाह से पहले मनीष की हर कहानी एक सप्ताह के अन्दर पूरी हो जाती थी मगर अब उसे कोई भी कहानी पूरी करने में एक महीने से भी अधिक समय लग जाता था. लिखने के लिए उसे रात का समय ही उपयुक्त लगता था लेकिन जैसे ही लिखने बैठता, तो निकट ही पलंग पर उसके इंतजार में लेटी हुई जया की उपस्थिति उसका ध्यान भंग कर देती थी. और वो दो चार पंक्तियाँ घसीटकर उठ जाया करता था.

इस बार एक नामी पत्रिका के सम्पादक ने अपने प्रेम-कथा विशेषांक के लिए एक प्रेम कहानी लिखने का न केवल अनुरोध किया था, बल्कि दो गुने मानदेय के साथ एक सप्ताह के अन्दर पूरी करके भेजने का दबाव भी बनाया था. अब भला जया के होते हुए यह कैसे संभव होता, तो काफी विचार के बाद उसने एक सप्ताह के लिए उसे  मायके भेजने का मन बनाया.

जया से बात करके जब उसने उसे अपनी दुविधा बताई तो वो तुरंत जाने के लिए तैयार हो गई. गाँव निकट ही था अतः जया ने बस द्वारा जाना तय किया. ससुराल और मायका एक ही गाँव में होने के कारण उसने वहाँ दोनों घरों में अपने आने की सूचना भेज दी.

जया के जाते ही मनीष ने अपना पूरा ध्यान कहानी पर केन्द्रित करना चाहा. क्योंकि वो प्रेम-कहानी पहली बार लिख रहा था. अतः दफ्तर में भी पूरा दिन उसके दिमाग में उसकी रूपरेखा बनती रही थी.

रात में जैसे ही वो लिखने बैठा तो जया के बिना घर भूत-खाना नज़र आने लगा. न जाने क्यों उसके भाव ही नहीं बन रहे थे. सोचने लगा कि जया होती तो उसका उत्साह वर्धन ही करती... उसने उसे भेजकर शायद गलती की है. मगर अब वो क्या करे?

इसी सोच में डूबे  हुए मनीष का ध्यान अचानक रसोई से आती हुई आवाजों ने भंग किया. वो देखने के लिए अन्दर गया तो वहाँ का नज़ारा देखकर दंग रह गया.

रसोईघर में चहल-पहल मची हुई थी. सारे बर्तन अपने अपने दडबों से निकलकर इधर-उधर उछल-कूद मचा रहे थे. तभी एक बड़े से भगोने को आता देखकर सब चुप हो गए. वो शायद सबका नेता था. शीघ्र ही उसने रसोई के गैस चूल्हे के पास अपना स्थान ग्रहण किया और आदेशात्मक लहजे में सबको संबोधित करते हुए कहा.

मित्रो, मेरी बात ध्यान से सुनिए. इस घर का स्वामी एक प्रेम-कहानी में उलझा हुआ है और शुरू नहीं कर पा रहा. मैं चाहता हूँ कि हम उसकी इस कार्य में सहायता करें...मगर कैसे...इस बात पर चर्चा करने के लिए ही मैंने आप सबको आमंत्रित किया है.

भगोने की बात सुनकर एक बड़े से लोटे ने आगे आकर बोलने की अनुमति माँगी. भगोने की स्वीकृति पाकर वो उत्साह से बोलने लगा-

मित्रो, ज़रा सोचकर बताइए कि क्या प्रेयसी की अनुपस्थिति में भी कोई प्रेम कहानी संपन्न हो सकती है?

सभी बर्तन एक साथ ठठाकर हँसते हुए बोल उठे-

नहीं... कभी नहीं...

लोटे ने आगे कहा-

तो मित्रो, हमें ही अब मालकिन की अनुपस्थिति में मालिक को  इस तरह सम्मोहित करना होगा कि वो यथा शीघ्र मालकिन को घर वापस ले आए. इसके लिए मैं भगोने महाशय के सामने अपना प्रस्ताव रखता हूँ कि इस कार्य को वे अपने नेतृत्व में शुरू करवाएं.

भगोने ने लोटे का इशारा समझकर कुछ दूरी पर बैठी कढ़ाई को आँख मारकर इशारे  से पास बुलाया. कढ़ाई कुछ शरमाती कुछ मुस्काती भगोने के निकट सरक आई. भगोना अपनी स्थूलकाय प्रेमिका की गोद में बैठ गया. नेता की रंगीन मिजाजी देखकर रसोईघर में जैसे भूचाल ही आ गया. सभी साजन जोड़ी बनाने के लिए सजनियों को फुसलाने में जुट गए. गिलास थाली का आलिंगन करते नज़र आए तो चमचों ने कटोरियों को गले लगाना शुरू कर दिया.  डिब्बे सरककर बरनियों से गलबहियां करने चले. चिमटे ने संड़सी को बगल में बिठा दिया तो तवे ने खुरपी के साथ जोड़ी बना ली.

यही नहीं उन सबके शोरगुल से फ्रिज के अन्दर सोए हुए फल सब्जी भी जाग गए और एक के बाद एक अपनी अलग-अलग थैलियों से निकलकर बाहर आने लगे. सबको जोड़ी बनाते देखकर उन्होंने भी जाति-धर्म का निर्वाह करते हुए जोड़ियाँ बना लीं. तोरई का हाथ टिंडे ने थामा तो लौकी के मन को कद्दू भा गया. सलाद के लिए एक साथ रखी हुई गाजर-मूलियाँ सहारे के लिए टमाटरों को लुभाने में लग गईं तो सहजन फली आलू का प्रणय निवेदन स्वीकार करके गर्व से उसकी तरफ बढ़ गई. बाकी जो साजन या सजनियाँ जोड़ी नहीं बना सके, वे एक साथ मित्रवत मिलकर खड़े हो गए. अब सबको अपने बॉस भगोने के अगले आदेश का इंतज़ार था.

भगोने ने सबको एक गोल घेरा बनाकर खड़े होने का आदेश दिया और स्वयंसेवक प्याज को म्युज़िक चालू करने के लिए कहा. मनीष तो वैसे ही हँस-हँसकर लोटपोट हुआ जा रहा था, म्युज़िक ऑन होते ही सबके बीच पहुंचकर वो भी थिरकने लगा.

थोड़ी देर बाद सेवफल ने अंत्याक्षरी का प्रस्ताव रखा जो बहुमत से पारित हो गया. सब अपनी-अपनी बारी पर प्रेम प्रदर्शित करने वाले गीत गा गाकर सुनाने लगे. तभी अचानक डोर बेल बजी और मनीष की नींद खुल गई. खुद को पसीने से तरबतर बिस्तर पर देखकर वो समझ गया कि वो सपना देख रहा था.

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अलसाए मनीष ने आँखें मलते हुए द्वार खोला. उसका अनुमान सही था, काम वाली राधा बाई थी. राधा ने ज्योंही रसोई में प्रवेश किया तो वहाँ का नज़ारा देकर उसकी आँखें झपकना ही भूल गईं. रसोई का सारा सामान अस्त-व्यस्त देखकर उलटे पाँव बाहर आई और हाँफते हुए मनीष से कहने लगी-

बाबूजी, ज़रा चलकर देखिये, सारी रसोई अस्तव्यस्त पड़ी है, लगता है रात में कोई चोर घर में घुसा है और आपको पता ही नहीं चला.

मनीष ने हैरानी से कहा-

ऐसा कैसे हो सकता है राधा बाई...चलो मैं देखता हूँ.

लेकिन रसोई में प्रवेश के साथ ही सपने वाला सारा घटनाक्रम चलचित्र की तरह उसके आगे सजीव हो उठा. सब कुछ वैसा ही तो था जैसा उसने देखा था. केवल अब किसी भी वस्तु में हलचल नहीं हो रही थी. मगर यह सत्य कैसे हो गया.

न जाने क्या पहेली है. किससे पूछे और किसे सुनाए. सुनाने वाली को तो उसने

बिना दोष के सजा भोगने के लिए भेज दिया था...उसने लापरवाही से सर झटक कर राधा को सपने वाली बात न सुनाकर सामान व्यवस्थित करने के लिए कहा. राधा ने मनीष की बात तो मान ली लेकिन उसके मन में डर ने डेरा डाल ही लिया था. अपना काम निपटाकर वो जाते-जाते मनीष को सावधान रहने की हिदायत देना न भूली.

राधा अधेड़ उम्र की महिला थी और इस घर में मनीष की शादी के बाद से ही काम करती आई थी अतः मनीष ने उसके प्रति सम्मान दिखाते हुए हामी भरी लेकिन वास्तविकता क्या थी इसके लिए उसे चिंता ने घेर लिया.

इसी उधेड़बुन में वो तैयार होकर दफ्तर चला गया. रात में मन ही मन कहानी पूरी करने का संकल्प करके टेबललैम्प जलाकर बैठा तो सही मगर सपने वाली लोटे की आवाजें बार-बार गूँजकर उसका ध्यान भंग करने लगीं.

“बिना प्रेयसी के भी कभी प्रेम-कहानी पूरी हुई है?...”

क्या सचमुच उसकी कहानी प्रेयसी यानी जया के बिना पूरी नहीं होगी? उसे जया की याद सताने लगी. सूनी दीवारें देखकर उसका लिखने का सारा उत्साह ही जाता रहा. वो होती तो उसे उलाहने भी देती और बीच-बीच में चाय-पानी भी पूछती रहती. जया के होने का अहसास ही उसकी कलम को ऊर्जावान बना देता था. अब कैसे उसकी कहानी पूरी होगी. कल का दिन तो बिना कुछ लिखे बेकार गया ही साथ ही सपने वाली घटना ने उसके जोश का किला ही ध्वस्त कर दिया.

एक बार उठकर उसने सावधानी से सारे घर का  निरीक्षण किया फिर अपना ध्यान पुनः कहानी पर केन्द्रित करने का प्रयास किया. कलम तो तैयार थी मगर दिल-दिमाग ने आज भी साथ नहीं दिया. टेबल पर बैठे-बैठे वो कब सोया और नींद में खोया उसे पता ही नहीं चला. सुबह जब राधा बाई ने बेल बजाई तो उसे याद आया कि आज भी रात में उसने वही सपना देखा था. वो धड़कते दिल से राधा के साथ ही रसोई तक चला गया तो पुनः कल वाला नज़ारा देखकर घबराहट के मारे काँप उठा. आज भी वही नज़ारा...? आखिर उसका सपना हूबहू सच कैसे हो रहा है? उसने राधा को डरा हुआ देखकर सांत्वना दी और स्वयं को काबू में रखकर जया को फोन करके वापस आने के लिए कह दिया.

जया ने पूछा-

“ऐसे अचानक बुला रहे हो मनी, सब कुछ ठीक तो है न...तुम्हारी कहानी पूरी हो गई क्या?”

“नहीं...बिना प्रेयसी के भी कोई प्रेमकहानी पूरी हो सकती है क्या? कुछ भी ठीक नहीं है तुम आज ही बस पकड़कर रात तक पहुँच जाओ.” मनीष ने लोटे की कही हुई बात दोहराते हुए कहा.

“आखिर आ गए न सही रास्ते पर...मैं जानती थी यही होने वाला है.”

“तुम्हें कैसे पता कि क्या होने वाला है...वो तो सपना...”

“कैसा सपना मनी...बताओ न”

“बस यों ही...कुछ विशेष नहीं, बस तुम आओ तो फिर बताऊंगा. अभी दफ्तर को देर हो जाएगी”

कहते हुए मनीष ने फोन काट दिया, मन ही मन वो डरा हुआ तो था लेकिन राधा के सामने सामान्य दिखने का प्रयास करता रहा और जया के आने की सूचना भी दी.

राधा  ने जया के आने तक चुप रहना ही ठीक समझा और सब कुछ सहेजकर काम पूरा करके चली गई.

रात में जया के घर पहुँचने पर ही मनीष की जान में जान आई. उसने उसे फ्रेश होने के लिए कहकर सुबह का बना हुआ खाना गर्म करके टेबल पर रख दिया. वो आज के दिन कहानी न लिखकर जल्दी ही बिस्तर पर जाने के मूड में था. मगर जया ने सपने वाली बात सुने बिना खाना खाने से इनकार कर दिया. आखिर मनीष ने उसे विस्तार से सारी बातें बताईं तो वो इसे मनीष का वहम बताकर हँसते हुए टालने लगी मगर बात की गंभीरता को महसूस करके मन ही मन उसने उसकी तह तक जाने का निश्चय कर लिया. आखिर सपने की बात हूबहू सच कैसे होती है. उसकी चिंता स्वाभाविक ही थी. दो दिन उसके बाहर रहने से ऐसी क्या बात हो गई जिसने मनीष का चैन लूट लिया है.

खाना खाकर उसने मनीष से थकी होने का बहाना करके आराम करने की इच्छा जताई और उसे कहानी आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया. मनीष तो उसे बाँहों में लेने को व्याकुल था मगर जया की अनिच्छा के कारण उसने सब्र करना ही उचित समझा. वो अपनी टेबल पर आकर लिखने का प्रयास करने लगा और जया आँखें बंद करके निद्रामग्न होने का बहाना करके जागती रही. आखिर इतनी गंभीर बात को एकदम नकारा भी कैसे जा सकता है.

समय गुजरता रहा और वो कनखियों से मनीष को ताकती रही. उसे याद आया कि लिखने के बीच मनीष को चाय की तलब लगती है. लेकिन इस समय उठकर चाय बनाने और उसके निकट जाने से उसकी एकाग्रता टूट जाएगी और यह आज नहीं होना चाहिए. वैसे भी वो दो दिन बिना चाय के रह लिया है तो आज भी सही... आखिर १२ बजते बजते उसने देखा मनीष को टेबल पर ही झपकी लग गई थी. जया को उसका हाल देखकर प्यार उमड़ आया और वो ख्यालों में मिलन के मधुर क्षणों को जीने लगी. वो सोच ही रही थी कि मनीष को उठाकर बुला ले कि अचनाक मनीष उठकर बिना इधर-उधर देखे रसोई की तरफ बढ़ रहा था.

जया ने सोचा- पानी पीने के लिए उठा है, अब तो पलंग पर ही सोने आएगा.

मगर ये क्या? अन्दर से खटपट सी आ रही है...मनीष क्या कर रहा है? चाय तो नहीं बना रहा...? चलकर देखती हूँ...मन ही मन विचार करके जया भी रसोई में पहुँच गई और जो कुछ उसने देखा तो आश्चर्य चकित होकर रह गई.

मनीष सिलसिलेवार उन्हीं क्रियाकलापों को अंजाम दे रहा था जो उसने सपने में देखने की बात कही थी. सारा उलटफेर करने के बाद वो अचानक रसोई के बीचों-बीच थिरकने लगा.

यह सब देखकर पहले तो जया की हँसी छूट गई पर अगले ही पल मनीष की सेहत को लेकर वो चिंता में डूब गई.

“यह शायद कहानी पूरी न होने से उपजे हुए तनाव का परिणाम है जो नींद में चलने की बीमारी में बदल चुका है. इस समय तो उसे मनीष को असलियत से रूबरू करवाना ही है, फिर कल ही किसी मनोवैज्ञानिक से मिलना मुनासिब होगा.”

वो दौड़कर मोबाइल ले आई और फुल स्पीड पर म्युज़िक ऑन करके मोबाइल एक तरफ रखकर अपना एक हाथ मनीष की कमर में और एक उसके कंधे पर रखकर थिरकते हुए उसे खुद से सटा लिया.

जया का स्पर्श पाते ही मनीष की तंद्रा टूट गई और आँखें मल-मलकर अविश्वसनीय नज़रों से चारों ओर ताकने लगा. जया अब मनीष की नींद टूटी जानकर ठहाके लगाकर हँसने लगी. मनीष पहले तो नर्वस होकर मुँह छिपाने लगा मगर अगले ही पल सारी वस्तुस्थिति भाँपकर जया की हँसी में शामिल हो गया.

फिर हँसते हुए ही जया को अपनी गोद में उठाकर बिस्तर तक ले आया और कहने लगा –

“आज तो सचमुच इन बेजान वस्तुओं ने मेरी भावनाओं को जगाकर प्रेम कथा  का सूत्र समझा दिया है डियर...अब मेरी किताबी प्रेम-कहानी तो अवश्य समय पर पूरी हो जाएगी मगर उससे पहले मुझे अपनी असली प्रेम-कहानी को अंजाम देना होगा.” कहते हुए उसने जया को पलंग पर लिटाकर घर की सारी बत्तियाँ बुझा दीं.

- कल्पना रामानी (नवी मुम्बई)

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗