कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १३८ / १६३ № 138 of 163 रचना १३८ / १६३
१२ नवम्बर २०१९ 12 November 2019 १२ नवम्बर २०१९

कभी न धूमिल होना चंपा kabhee n dhoomil honaa chanpaa कभी न धूमिल होना चंपा

जब जब ताप बढ़ेगा चम्पा

पेड़ तुम्हारे छाँव करेंगे

रूप, सुगंध, गुणों की मलिका

तुम महकोगी, हम

महकेंगे।

नागफनी ने किया आक्रमण

जीवन के उद्यानों पर।

हर आँगन में बसा लिए हैं

अपने साथी अपने घर।

विचलित है अंतर जन-जन का

रंग तुम्हारे भाव भरेंगे।

तन कंचन, मन कोमल कलिका

तुम किलकोगी, हम

किलकेंगे।

जहाँ नहीं शुभ कदम तुम्हारे

हम बोएँगे बीज वहाँ।

अमलतास, कचनार, बाँस भी

संग तुम्हारे होंगे हाँ।

जब रोगों की होगी बरखा

प्राण-सुधा तुमसे हम लेंगे।

कभी न धूमिल होना चम्पा

तुम हर्षोगी, हम

हर्षेंगे।

jab jab taap bढ़egaa champaa

ped tumhaare chaanv karenge

roop, sugandh, gunon kee malikaa

tum mahakogee, ham

mahakenge

·

naagaphanee ne kiyaa aakraman

jeewan ke udyaanon par

har aangan men basaa lie hain

apane saathee apane ghar

·

wichalit hai antar jan-jan kaa

rang tumhaare bhaaw bharenge

tan kanchan, man komal kalikaa

tum kilakogee, ham

kilakenge

·

jahaan naheen shubh kadam tumhaare

ham boenge beej wahaan

amalataas, kachanaar, baans bhee

sang tumhaare honge haan

·

jab rogon kee hogee barakhaa

praan-sudhaa tumase ham lenge

kabhee n dhoomil honaa champaa

tum harshogee, ham

harshenge

जब जब ताप बढ़ेगा चम्पा

पेड़ तुम्हारे छाँव करेंगे

रूप, सुगंध, गुणों की मलिका

तुम महकोगी, हम

महकेंगे।

नागफनी ने किया आक्रमण

जीवन के उद्यानों पर।

हर आँगन में बसा लिए हैं

अपने साथी अपने घर।

विचलित है अंतर जन-जन का

रंग तुम्हारे भाव भरेंगे।

तन कंचन, मन कोमल कलिका

तुम किलकोगी, हम

किलकेंगे।

जहाँ नहीं शुभ कदम तुम्हारे

हम बोएँगे बीज वहाँ।

अमलतास, कचनार, बाँस भी

संग तुम्हारे होंगे हाँ।

जब रोगों की होगी बरखा

प्राण-सुधा तुमसे हम लेंगे।

कभी न धूमिल होना चम्पा

तुम हर्षोगी, हम

हर्षेंगे।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗