कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १३९ / १६३ № 139 of 163 रचना १३९ / १६३
१२ नवम्बर २०१९ 12 November 2019 १२ नवम्बर २०१९

फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ phool tumhen main kahaan sajaaoon फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ

फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ?

जहाँ सदा मुस्काता पाऊँ।

सोचूँ यही।

तुम्हें चढ़ाऊँ देव चरण में

बाद प्रवाहित कर दूँ जल में।

गलकर होगा अंत तुम्हारा

पानी दूषित होगा पल में।

ना ना नहीं।

सुंदरता के कदम तले गर

तुम्हें सजाऊँ सुमन बिछाकर।

कुचल जाय सौंदर्य तुम्हारा

होगा यह अपमान सरासर।

बिलकुल नहीं।

गजरे में जो करूँ सुशोभित

महतों का माला से स्वागत।

मगर सुमन मैं नहीं चाहती

फेंके जाओ बनो तिरस्कृत।

ऊँ हूँ नहीं।

यदि फैलाऊँ वीरों के पथ

घनी धूल से होगे लथपथ।

हश्र तुम्हारा देख देख कर

वीरों का मन होगा विचलित।

उफ्फ़ोह! नहीं।

तुम तो बने रहो बगिया में

महको इस सुंदर दुनिया में।

वंश बढ़ाओ परिवर्धित हो

शुद्ध हवाएँ बहें फिजा में।

चाहूँ यही।

phool tumhen main kahaan sajaaoon?

jahaan sadaa muskaataa paaoon

·

sochoon yahee

·

tumhen chढ़aaoon dew charan men

baad prawaahit kar doon jal men

galakar hogaa ant tumhaaraa

paanee dooshit hogaa pal men

·

naa naa naheen

·

sundarataa ke kadam tale gar

tumhen sajaaoon suman bichaakar

kuchal jaay saundary tumhaaraa

hogaa yah apamaan saraasar

bilakul naheen

·

gajare men jo karoon sushobhit

mahaton kaa maalaa se svaagat

magar suman main naheen chaahatee

phenke jaao bano tiraskriit

·

oon hoon naheen

·

yadi phailaaoon weeron ke path

ghanee dhool se hoge lathapath

hashr tumhaaraa dekh dekh kar

weeron kaa man hogaa wichalit

·

uphfoh! naheen

·

tum to bane raho bagiyaa men

mahako is sundar duniyaa men

wansh bढ़aao pariwardhit ho

shuddh hawaaen bahen phijaa men

·

chaahoon yahee

फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ?

जहाँ सदा मुस्काता पाऊँ।

सोचूँ यही।

तुम्हें चढ़ाऊँ देव चरण में

बाद प्रवाहित कर दूँ जल में।

गलकर होगा अंत तुम्हारा

पानी दूषित होगा पल में।

ना ना नहीं।

सुंदरता के कदम तले गर

तुम्हें सजाऊँ सुमन बिछाकर।

कुचल जाय सौंदर्य तुम्हारा

होगा यह अपमान सरासर।

बिलकुल नहीं।

गजरे में जो करूँ सुशोभित

महतों का माला से स्वागत।

मगर सुमन मैं नहीं चाहती

फेंके जाओ बनो तिरस्कृत।

ऊँ हूँ नहीं।

यदि फैलाऊँ वीरों के पथ

घनी धूल से होगे लथपथ।

हश्र तुम्हारा देख देख कर

वीरों का मन होगा विचलित।

उफ्फ़ोह! नहीं।

तुम तो बने रहो बगिया में

महको इस सुंदर दुनिया में।

वंश बढ़ाओ परिवर्धित हो

शुद्ध हवाएँ बहें फिजा में।

चाहूँ यही।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗