कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १३५ / १६३ № 135 of 163 रचना १३५ / १६३
११ नवम्बर २०१९ 11 November 2019 ११ नवम्बर २०१९

बेला महके belaa mahake बेला महके

नर्म हुए दिन, रातें मधुरिम

बागों  जब  से

बेला महके।

मालिन सारे काज छोड़कर

चुनने फूल चली दीवानी।

आखिर इन अपनों ने ही तो

सींचा बचपन और जवानी।

नज़रें नूर, वदन नूरानी

मचल रहे हैं भाव

हृदय के।

इन फूलों ने गजरे गूँथे

देवों के हित हार बनाए।

लाख गुलाबों को गुमान हो

पर मुझको बेला ही भाए।

रूप-रंग श्वेताभ, गंध मृदु

क्यों न कलम मेरी

फिर बहके।

जब बहार बेला पर छाती

डालों कली-कली मुस्काती।

क्रूर पसीने से निजात दे

प्रणय, मिलन के गीत सुनाती।

खुशबू देकर ले जाती है

पीर भरे पल पवन

विरह के।

narm hue din, raaten madhurim

baagon jab se

belaa mahake

·

maalin saare kaaj chodakar

chunane phool chalee deewaanee

aakhir in apanon ne hee to

seenchaa bachapan aur jawaanee

·

nazaren noor, wadan nooraanee

machal rahe hain bhaaw

hriiday ke

·

in phoolon ne gajare goonthe

dewon ke hit haar banaae

laakh gulaabon ko gumaan ho

par mujhako belaa hee bhaae

·

roop-rang shvetaabh, gandh mriidu

kyon n kalam meree

phir bahake

·

jab bahaar belaa par chaatee

daalon kalee-kalee muskaatee

kroor paseene se nijaat de

pranay, milan ke geet sunaatee

·

khushaboo dekar le jaatee hai

peer bhare pal pawan

wirah ke

नर्म हुए दिन, रातें मधुरिम

बागों  जब  से

बेला महके।

मालिन सारे काज छोड़कर

चुनने फूल चली दीवानी।

आखिर इन अपनों ने ही तो

सींचा बचपन और जवानी।

नज़रें नूर, वदन नूरानी

मचल रहे हैं भाव

हृदय के।

इन फूलों ने गजरे गूँथे

देवों के हित हार बनाए।

लाख गुलाबों को गुमान हो

पर मुझको बेला ही भाए।

रूप-रंग श्वेताभ, गंध मृदु

क्यों न कलम मेरी

फिर बहके।

जब बहार बेला पर छाती

डालों कली-कली मुस्काती।

क्रूर पसीने से निजात दे

प्रणय, मिलन के गीत सुनाती।

खुशबू देकर ले जाती है

पीर भरे पल पवन

विरह के।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗