कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ७९ / ११४ № 79 of 114 रचना ७९ / ११४
३० अक्तूबर २०१९ 30 October 2019 ३० अक्तूबर २०१९

चेहरा cheharaa चेहरा

बार-बार समझाने के बावजूद जब विभा ने उसकी बात नहीं मानी तो जाने-माने साहित्यकारों के सम्मान समारोह में आमंत्रित प्रथम पंक्ति में अपनी सहेली के साथ बैठी हुई आभा अकेली ही उस मंच की ओर बढ़ गई जहाँ पीछे की तरफ कार्यक्रम के कार्यकर्ता साहित्यकारों को निर्धारित शुल्क पर हर श्रेणी के सम्मान बेचकर आगे मंचासीन करवा रहे थे। कुछ ही देर में आभा हाथ में श्रीफल, गले में गुलहार और कंधों पर शॉल लपेटे गर्व से सिर ऊँचा किए हुए ओजमय चेहरा लिए विभा के पास पहुँच गई लेकिन विभा ने उसे देखकर ऐसी मुखमुद्रा बनाई जैसे उसे पहचाना ही नहीं। वो विभा को झिंझोड़कर बोली-

“तुम्हें क्या हुआ सखी, देखा नहीं कि मेरा कितना सम्मान हुआ? इंटरव्यू, कविता पाठ की वीडियो रिकार्डिंग, आहा! मन को कितना सुकून पहुँचा, तुम भी चलती तो...”

विभा ने चुपचाप अपना बैग खोला और एक छोटा सा आईना निकालकर आभा के सामने करके बोली-

“यह क्या तुम्हारा ही चेहरा है आभा?”

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baar-baar samajhaane ke baawajood jab wibhaa ne usakee baat naheen maanee to jaane-maane saahityakaaron ke sammaan samaaroh men aamantrit pratham pankti men apanee sahelee ke saath baithee huee aabhaa akelee hee us manch kee or bढ़ gaee jahaan peeche kee taraph kaaryakram ke kaaryakartaa saahityakaaron ko nirdhaarit shulk par har shrenee ke sammaan bechakar aage manchaaseen karawaa rahe the kuch hee der men aabhaa haath men shreephal, gale men gulahaar aur kandhon par shॉl lapete garv se sir oonchaa kie hue ojamay cheharaa lie wibhaa ke paas pahunch gaee lekin wibhaa ne use dekhakar aisee mukhamudraa banaaee jaise use pahachaanaa hee naheen wo wibhaa ko jhinjhodakar bolee-

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“tumhen kyaa huaa sakhee, dekhaa naheen ki meraa kitanaa sammaan huaa? intaravyoo, kawitaa paath kee weediyo rikaarding, aahaa! man ko kitanaa sukoon pahunchaa, tum bhee chalatee to”

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wibhaa ne chupachaap apanaa baig kholaa aur ek chotaa saa aaeenaa nikaalakar aabhaa ke saamane karake bolee-

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“yah kyaa tumhaaraa hee cheharaa hai aabhaa?”

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बार-बार समझाने के बावजूद जब विभा ने उसकी बात नहीं मानी तो जाने-माने साहित्यकारों के सम्मान समारोह में आमंत्रित प्रथम पंक्ति में अपनी सहेली के साथ बैठी हुई आभा अकेली ही उस मंच की ओर बढ़ गई जहाँ पीछे की तरफ कार्यक्रम के कार्यकर्ता साहित्यकारों को निर्धारित शुल्क पर हर श्रेणी के सम्मान बेचकर आगे मंचासीन करवा रहे थे। कुछ ही देर में आभा हाथ में श्रीफल, गले में गुलहार और कंधों पर शॉल लपेटे गर्व से सिर ऊँचा किए हुए ओजमय चेहरा लिए विभा के पास पहुँच गई लेकिन विभा ने उसे देखकर ऐसी मुखमुद्रा बनाई जैसे उसे पहचाना ही नहीं। वो विभा को झिंझोड़कर बोली-

“तुम्हें क्या हुआ सखी, देखा नहीं कि मेरा कितना सम्मान हुआ? इंटरव्यू, कविता पाठ की वीडियो रिकार्डिंग, आहा! मन को कितना सुकून पहुँचा, तुम भी चलती तो...”

विभा ने चुपचाप अपना बैग खोला और एक छोटा सा आईना निकालकर आभा के सामने करके बोली-

“यह क्या तुम्हारा ही चेहरा है आभा?”

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗