कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ८० / ११४ № 80 of 114 रचना ८० / ११४
३० अक्तूबर २०१९ 30 October 2019 ३० अक्तूबर २०१९

गृह-प्रवेश griih-prawesh गृह-प्रवेश

“मित्रवर! कल हमारे गृह-प्रवेश के शुभ अवसर पर आयोजित स्नेह-भोज में तुम्हारी सपरिवार उपस्थिति अनिवार्य है...” कहते हुए विमल ने एक सुंदर सा निमंत्रण-पत्र कमल की ओर बढ़ा दिया।

“अवश्य मित्र, तुम्हारी खुशी में शामिल होने मैं न आऊँ, यह कैसे हो सकता है?” मुस्कुराते हुए कमल ने उत्तर दिया।

एक ही दफ्तर में एक जैसे पद पर कार्यरत विमल और कमल में गाढ़ी मित्रता थी। दोनों के विचार काफी मिलते थे केवल एक ही बात पर मतभेद था-रिश्वत लेना… न लेना...।

अति सुंदर और सुसज्जित महलनुमा भवन को विस्फारित नज़रों से देखते हुए कमल ने हवन-पूजन के बाद नम्रतापूर्वक शुभकामनाओं के साथ लाए हुए उपहार का पैकेट विमल की ओर बढ़ाकर विदा ली।

उत्सुक विमल ने सबसे पहले उसी का उपहार खोला तो एक छोटा सा दमकता हुआ दर्पण देखकर उसका चमकता हुआ चेहरा विवर्ण हो गया।

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“mitrawar! kal hamaare griih-prawesh ke shubh awasar par aayojit sneh-bhoj men tumhaaree sapariwaar upasthiti aniwaary hai” kahate hue wimal ne ek sundar saa nimantran-patr kamal kee or bढ़aa diyaa

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“awashy mitr, tumhaaree khushee men shaamil hone main n aaoon, yah kaise ho sakataa hai?” muskuraate hue kamal ne uttar diyaa

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ek hee daphtar men ek jaise pad par kaaryarat wimal aur kamal men gaaढ़ee mitrataa thee donon ke wichaar kaaphee milate the kewal ek hee baat par matabhed thaa-rishvat lenaa… n lenaa

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ati sundar aur susajjit mahalanumaa bhawan ko wisphaarit nazaron se dekhate hue kamal ne hawan-poojan ke baad namrataapoorvak shubhakaamanaaon ke saath laae hue upahaar kaa paiket wimal kee or bढ़aakar widaa lee

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utsuk wimal ne sabase pahale usee kaa upahaar kholaa to ek chotaa saa damakataa huaa darpan dekhakar usakaa chamakataa huaa cheharaa wiwarn ho gayaa

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“मित्रवर! कल हमारे गृह-प्रवेश के शुभ अवसर पर आयोजित स्नेह-भोज में तुम्हारी सपरिवार उपस्थिति अनिवार्य है...” कहते हुए विमल ने एक सुंदर सा निमंत्रण-पत्र कमल की ओर बढ़ा दिया।

“अवश्य मित्र, तुम्हारी खुशी में शामिल होने मैं न आऊँ, यह कैसे हो सकता है?” मुस्कुराते हुए कमल ने उत्तर दिया।

एक ही दफ्तर में एक जैसे पद पर कार्यरत विमल और कमल में गाढ़ी मित्रता थी। दोनों के विचार काफी मिलते थे केवल एक ही बात पर मतभेद था-रिश्वत लेना… न लेना...।

अति सुंदर और सुसज्जित महलनुमा भवन को विस्फारित नज़रों से देखते हुए कमल ने हवन-पूजन के बाद नम्रतापूर्वक शुभकामनाओं के साथ लाए हुए उपहार का पैकेट विमल की ओर बढ़ाकर विदा ली।

उत्सुक विमल ने सबसे पहले उसी का उपहार खोला तो एक छोटा सा दमकता हुआ दर्पण देखकर उसका चमकता हुआ चेहरा विवर्ण हो गया।

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗