दासता के दाग( पुरस्कृत कहानी ) daasataa ke daag( puraskriit kahaanee ) दासता के दाग( पुरस्कृत कहानी )
लघुकथा दासता के दाग
“मिनी बेटे जल्दी आ जाओ नाश्ता लगा दिया है...”
कहते हुए रवीना ने टेबल पर आलू-सैंडविच के साथ अलग-अलग दो प्रकार की चटनी की प्यालियाँ सजा दीं, अपनी सास सुवर्णा को उनके कमरे में नाश्ता देकर आई और पति असीम को भी आवाज़ लगाकर कुर्सी खींचकर बैठ गई।
असीम का सरकारी जॉब है और रवीना एक कॉनवेंट स्कूल में हिन्दी की शिक्षिका है। आज हिन्दी-दिवस है, रवीना सफ़ेद साड़ी और उसी के स्कूल की पहली कक्षा की छात्रा मिनी सफ़ेद यूनिफ़ोर्म में तैयार हुई थीं।
उसने मिनी को फिर से आवाज़ लगाई-
“बेटे जल्दी नाश्ता कर लो, आज थोड़ा जल्दी चलेंगे”।
-जी ममा, आती हूँ...
तभी असीम ने रवीना को टोक दिया- “रवीना, मैं तुम्हें कितनी बार समझा चुका हूँ, कि मिनी से अंग्रेजी में ही बात किया करो ताकि वो भी अंग्रेजी में जवाब दे सके. हिन्दी बोलने से उसका अंग्रेज़ी उच्चारण बिगड़ जाएगा”। कहते हुए असीम भी नाश्ते के लिए बैठ गया। पति की बात सुनते ही रवीना तैश में आकर बोली-
“देखिये, आप घर में उसे हिन्दी बोलने से नहीं रोक सकते। अंग्रेज़ी के लिए स्कूल परिसर ही काफी है”।
-देखो, मैं पहले भी कह चुका हूँ, मुझे उसे कूपमंडूक नहीं बनाना, नाश्ता करते हुए असीम बोला।
“और मैं उसे गुलाम पंख नहीं दे सकती...”
-समझने की कोशिश करो रवीना, यह उसके कैरियर का सवाल है।
“हिन्दी बोलने से कैरियर बिगड़ नहीं जाएगा असीम, आप अपनी ही मातृभाषा, राष्ट्रभाषा को हेय क्यों समझते हैं? आखिर कब तक हम इस तरह हिंदी का दमन करके अंग्रेजी को नमन करते रहेंगे?”
-मैं इस बारे में कुछ सुनना नहीं चाहता...और असीम गुस्से में नाश्ता छोड़ प्लेट को धक्का देकर उठ खड़ा हुआ… प्लेट चटनी की कटोरी से टकराई, और लुढ़कती हुई सामने बैठी रवीना की साड़ी पर चित्रकारी करती हुई नीचे जा गिरी। मिनी का सफ़ेद स्कर्ट भी छींटों से नहीं बच पाया। आवाज़ सुन सुवर्णा कमरे से बाहर आ गई तो देखा, बेटा जा चुका था और अपनी सफ़ेद साड़ी की दुर्दशा देखकर रवीना की आँखों से रुलाई फूटने को थी। अब वो क्या पहन कर स्कूल जाए..., हिंदी दिवस को भी आज सफ़ेद पोशाक के लिए नियत दिन को ही आना था. समय हो चुका था कार्यक्रम भी शुरू होने वाला होगा। मिनी हक्की-बक्की सी बैठी रह गई थी। सुवर्णा ने सारी स्थिति भाँपकर कहा-
बेटी तुम दोनों कमरे में चलो, कपड़े बदलकर मुझे दे दो, मेरे अनुभूत नुस्खों से सामना होते ही सारे जिद्दी दाग दफा हो जाते हैं, यह कुछ भी नहीं, दस मिनिट देर हो भी गई तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
कुछ ही देर में सुवर्णा ने साड़ी और स्कर्ट को इस तरह बेदाग कर दिया मानों कुछ हुआ ही न हो और मुस्कुराते हुए रवीना को कपड़े देकर बोली-
"अब जल्दी से तैयार हो जाओ बेटी, अपना मन ख़राब मत करो"
"माँ जी, कपड़ों के ये दाग तो पलक झपकते ही दूर हो गए लेकिन क्या आपका कोई नुस्खा भारत माँ के आँचल पर अंग्रेजों के छोड़े हुए दासता के दाग मिटा पाएगा”?
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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laghukathaa daasataa ke daag
“minee bete jaldee aa jaao naashtaa lagaa diyaa hai”
kahate hue raweenaa ne tebal par aaloo-saindawich ke saath alag-alag do prakaar kee chatanee kee pyaaliyaan sajaa deen, apanee saas suwarnaa ko unake kamare men naashtaa dekar aaee aur pati aseem ko bhee aawaaz lagaakar kursee kheenchakar baith gaee
aseem kaa sarakaaree jॉb hai aur raweenaa ek kॉnawent skool men hindee kee shikshikaa hai aaj hindee-diwas hai, raweenaa safed saadee aur usee ke skool kee pahalee kakshaa kee chaatraa minee safed yooniform men taiyaar huee theen
usane minee ko phir se aawaaz lagaaee-
“bete jaldee naashtaa kar lo, aaj thodaa jaldee chalenge”
-jee mamaa, aatee hoon
tabhee aseem ne raweenaa ko tok diyaa- “raweenaa, main tumhen kitanee baar samajhaa chukaa hoon, ki minee se angrejee men hee baat kiyaa karo taaki wo bhee angrejee men jawaab de sake hindee bolane se usakaa angrezee uchchaaran bigad jaaegaa” kahate hue aseem bhee naashte ke lie baith gayaa pati kee baat sunate hee raweenaa taish men aakar bolee-
“dekhiye, aap ghar men use hindee bolane se naheen rok sakate angrezee ke lie skool parisar hee kaaphee hai”
-dekho, main pahale bhee kah chukaa hoon, mujhe use koopamandook naheen banaanaa, naashtaa karate hue aseem bolaa
“aur main use gulaam pankh naheen de sakatee”
-samajhane kee koshish karo raweenaa, yah usake kairiyar kaa sawaal hai
“hindee bolane se kairiyar bigad naheen jaaegaa aseem, aap apanee hee maatriibhaashaa, raashtrabhaashaa ko hey kyon samajhate hain? aakhir kab tak ham is tarah hindee kaa daman karake angrejee ko naman karate rahenge?”
-main is baare men kuch sunanaa naheen chaahataaaur aseem gusse men naashtaa chod plet ko dhakkaa dekar uth khadaa huaa… plet chatanee kee katoree se takaraaee, aur luढ़katee huee saamane baithee raweenaa kee saadee par chitrakaaree karatee huee neeche jaa giree minee kaa safed skart bhee cheenton se naheen bach paayaa aawaaz sun suwarnaa kamare se baahar aa gaee to dekhaa, betaa jaa chukaa thaa aur apanee safed saadee kee durdashaa dekhakar raweenaa kee aankhon se rulaaee phootane ko thee ab wo kyaa pahan kar skool jaae, hindee diwas ko bhee aaj safed poshaak ke lie niyat din ko hee aanaa thaa samay ho chukaa thaa kaaryakram bhee shuroo hone waalaa hogaa minee hakkee-bakkee see baithee rah gaee thee suwarnaa ne saaree sthiti bhaanpakar kahaa-
betee tum donon kamare men chalo, kapade badalakar mujhe de do, mere anubhoot nuskhon se saamanaa hote hee saare jiddee daag daphaa ho jaate hain, yah kuch bhee naheen, das minit der ho bhee gaee to koee phark naheen padegaa
kuch hee der men suwarnaa ne saadee aur skart ko is tarah bedaag kar diyaa maanon kuch huaa hee n ho aur muskuraate hue raweenaa ko kapade dekar bolee-
"ab jaldee se taiyaar ho jaao betee, apanaa man karaab mat karo"
"maan jee, kapadon ke ye daag to palak jhapakate hee door ho gae lekin kyaa aapakaa koee nuskhaa bhaarat maan ke aanchal par angrejon ke chode hue daasataa ke daag mitaa paaegaa”?
kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
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लघुकथा दासता के दाग
“मिनी बेटे जल्दी आ जाओ नाश्ता लगा दिया है...”
कहते हुए रवीना ने टेबल पर आलू-सैंडविच के साथ अलग-अलग दो प्रकार की चटनी की प्यालियाँ सजा दीं, अपनी सास सुवर्णा को उनके कमरे में नाश्ता देकर आई और पति असीम को भी आवाज़ लगाकर कुर्सी खींचकर बैठ गई।
असीम का सरकारी जॉब है और रवीना एक कॉनवेंट स्कूल में हिन्दी की शिक्षिका है। आज हिन्दी-दिवस है, रवीना सफ़ेद साड़ी और उसी के स्कूल की पहली कक्षा की छात्रा मिनी सफ़ेद यूनिफ़ोर्म में तैयार हुई थीं।
उसने मिनी को फिर से आवाज़ लगाई-
“बेटे जल्दी नाश्ता कर लो, आज थोड़ा जल्दी चलेंगे”।
-जी ममा, आती हूँ...
तभी असीम ने रवीना को टोक दिया- “रवीना, मैं तुम्हें कितनी बार समझा चुका हूँ, कि मिनी से अंग्रेजी में ही बात किया करो ताकि वो भी अंग्रेजी में जवाब दे सके. हिन्दी बोलने से उसका अंग्रेज़ी उच्चारण बिगड़ जाएगा”। कहते हुए असीम भी नाश्ते के लिए बैठ गया। पति की बात सुनते ही रवीना तैश में आकर बोली-
“देखिये, आप घर में उसे हिन्दी बोलने से नहीं रोक सकते। अंग्रेज़ी के लिए स्कूल परिसर ही काफी है”।
-देखो, मैं पहले भी कह चुका हूँ, मुझे उसे कूपमंडूक नहीं बनाना, नाश्ता करते हुए असीम बोला।
“और मैं उसे गुलाम पंख नहीं दे सकती...”
-समझने की कोशिश करो रवीना, यह उसके कैरियर का सवाल है।
“हिन्दी बोलने से कैरियर बिगड़ नहीं जाएगा असीम, आप अपनी ही मातृभाषा, राष्ट्रभाषा को हेय क्यों समझते हैं? आखिर कब तक हम इस तरह हिंदी का दमन करके अंग्रेजी को नमन करते रहेंगे?”
-मैं इस बारे में कुछ सुनना नहीं चाहता...और असीम गुस्से में नाश्ता छोड़ प्लेट को धक्का देकर उठ खड़ा हुआ… प्लेट चटनी की कटोरी से टकराई, और लुढ़कती हुई सामने बैठी रवीना की साड़ी पर चित्रकारी करती हुई नीचे जा गिरी। मिनी का सफ़ेद स्कर्ट भी छींटों से नहीं बच पाया। आवाज़ सुन सुवर्णा कमरे से बाहर आ गई तो देखा, बेटा जा चुका था और अपनी सफ़ेद साड़ी की दुर्दशा देखकर रवीना की आँखों से रुलाई फूटने को थी। अब वो क्या पहन कर स्कूल जाए..., हिंदी दिवस को भी आज सफ़ेद पोशाक के लिए नियत दिन को ही आना था. समय हो चुका था कार्यक्रम भी शुरू होने वाला होगा। मिनी हक्की-बक्की सी बैठी रह गई थी। सुवर्णा ने सारी स्थिति भाँपकर कहा-
बेटी तुम दोनों कमरे में चलो, कपड़े बदलकर मुझे दे दो, मेरे अनुभूत नुस्खों से सामना होते ही सारे जिद्दी दाग दफा हो जाते हैं, यह कुछ भी नहीं, दस मिनिट देर हो भी गई तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
कुछ ही देर में सुवर्णा ने साड़ी और स्कर्ट को इस तरह बेदाग कर दिया मानों कुछ हुआ ही न हो और मुस्कुराते हुए रवीना को कपड़े देकर बोली-
"अब जल्दी से तैयार हो जाओ बेटी, अपना मन ख़राब मत करो"
"माँ जी, कपड़ों के ये दाग तो पलक झपकते ही दूर हो गए लेकिन क्या आपका कोई नुस्खा भारत माँ के आँचल पर अंग्रेजों के छोड़े हुए दासता के दाग मिटा पाएगा”?
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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