कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ९१ / ११४ № 91 of 114 रचना ९१ / ११४
१९ दिसम्बर २०१९ 19 December 2019 १९ दिसम्बर २०१९

जहाँ हम जा रहे हैं jahaan ham jaa rahe hain जहाँ हम जा रहे हैं

गाड़ी आगे बढ़ी जा रही थी और विचारों में डूबी हुई सरला देवी के अंतर्मन का एक हिस्सा पीछे छूटती हुई वस्तुओं के साथ ही छूटा जा रहा था। उसने ठंडी साँस लेकर सीट पर पैर फैलाए ही थे कि बहू की आवाज़ से उसका ध्यान टूट गया.

“माँ जी, आप भोजन कर लीजिये, मैं अवि को खिला देती हूँ फिर उसे अपने पास ही सुला दीजियेगा...निखिल और मैं बाद में खा लेंगे”

सरला देवी ने चुपचाप भोजन ग्रहण करके अपने छः वर्षीय पोते अविनाश को अपने पास बिठा लिया और पुनः विचलित मन के विचारों की कड़ी जोड़ती उससे पहले ही अवि ने उसकी गोद में लेटते हुए अनुनय के स्वर में कहा-

“दादी कहानी सुनाओ न...”

“कहानी...?  ठीक है बेटे, आज मैं तुम्हें अमन-वन की कहानी सुनाती हूँ...” कुछ क्षण सोचने के बाद सरला देवी ने कहा.

“अमन-वन क्या होता है दादी?"

“बेटे, एक बहुत बड़ा जंगल था जिसका नाम अमन-वन था.”

“दादी, क्या वो चम्पक-वन जैसा था, जिसमें बहुत से जानवर रहते हैं?”

“हाँ बेटे, बिलकुल वैसा ही... उसमें बहुत बड़े-बड़े पेड़ भी होते थे.”

“दादी, वो हमारे घर वाले पेड़ों से भी बड़े थे?”

“हाँ, बेटे वे हमारे पेड़ों से बहुत बड़े थे.”

“अच्छा! फिर तो उनमें आम-अमरूद और जामुन भी बड़े बड़े लगते होंगे, है न!”

“हाँ हाँ बड़े और मीठे भी...और बहुत से पेड़ों पर अनेक रंगों के सुन्दर फूल भी लगते थे.”

“फिर क्या हुआ दादी?"

“उस जंगल में हर तरह के पक्षी पेड़ों पर अपने घोंसले और जानवर ज़मीन पर गुफाएँ बनाकर रहते थे. खाने के लिए मीठे फल और पीने के लिए पानी भी उन्हें वहीं पोखरों से मिल जाता था.”

“फिर क्या हुआ दादी?”

“फिर हुआ यह कि एक दिन उस विशाल जंगल पर कुछ दुष्ट इंसानों की नज़र पड़ गई. उन्हें वो जंगल बहुत पसंद आया और उन्होंने वहाँ अपनी कमाई के लिए शहर बनाने की योजना बनाई. धीरे-धीरे सभी पेड़ कटने लगे और पशु-पक्षियों में हाहाकार मच गया. जानवर शहर की तरफ भागने लगे तो उनको पकड़-पकड़ कर पिंजड़ों में डाल दिया गया. पक्षियों के घोंसले गिर गए. जो उड़ सकते थे उड़ गए जो छोटे थे, नहीं उड़ सकते थे वे वहीं मरने लगे."

“फिर  दादी वो पक्षी अपने बच्चों के लिए रोए होंगे न!”

“हाँ मुन्ने बहुत रोए थे और यह सब देखकर धरती काँप उठी थी। फिर उस धरती पर मशीनें चलाकर पूरा खोद दिया गया. जहाँ-जहाँ  पानी के पोखरे थे वहाँ अन्दर गहराई तक मशीनें लगाकर शहर के लोगों के लिए पीने का पानी खींचा जाने लगा। धरती रोती रही...और मशीनें उसे रौंदती रहीं. फिर उस धरती को बड़े बड़े पत्थरों से पाट दिया गया यानी उस अमन वन को दफनाकर बड़ी बड़ी इमारतों वाला नया शहर 'चमनगढ़' बसा लिया गया”

“धरती कैसे रोती है दादी?”

“बेटे, जैसे तुम्हें चोट लगती है तो तुम्हारी माँ रोती है वैसे ही धरती हम सबकी माँ है वो पेड़-पौधों की भी माँ होती है. उनको चोट लगती है तो वो भी रोती है. बस हम उसे रोते हुए देख नहीं सकते...वो हम मनुष्यों के लिए भी रोती है बेटे...वो सोचती है कि अभी तो मनुष्य  उसे पेड़ काट-काट कर और जल निचोड़कर बंजर बना रहे हैं फिर जब उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचेगा तो वे नई पीढ़ी को क्या जवाब देंगे.”

“ओह! दादी वो दुष्ट लोग भी उसी शहर में होंगे न?”

“हाँ बेटे...उन्होंने अपने लिए तो महल ही खड़े कर लिए थे.”

“लेकिन उन दुष्ट लोगों ने ऐसा क्यों किया दादी? मैं वहाँ होता तो पेड़ पर चढ़ जाता और उन्हें पत्थर मार-मार कर भगा देता...!”   मासूम अवि आँखें पोंछते हुए बोल उठा.

“वे इंसान खुद पत्थर ही होते हैं बेटे, पत्थरोँ को पत्थर कौन मार सकता है...?”

“वो कैसे दादी, वो क्या हम जैसे नहीं होते...?"

“होते तो हम जैसे ही हैं मगर उनका दिल पत्थर जैसा  और हाथ कठोर होते हैं वे किसी का दुख दर्द नहीं समझ सकते...वे सिर्फ अपने लिए सोचते हैं... वे नहीं सोचते कि ये मूक-पशु पक्षी बेघर होकर कहाँ जाएँगे...वे नहीं सोचते कि पेड़ों  को भी काटने से पीड़ा हो सकती है...”

संतप्त-मन सरला देवी की बोल तो जुबां रही थी,  मगर उसके मनस्पटल पर बीते हुए युग का दृश्य चित्रित होने लगा था. दो पीढ़ियों के बीच का अंतर  दो युगों के बीच का अंतर ही तो होता है ... सरला देवी ने जिस युग में आँखें खोलीं वो हरा-भरा प्रदूषण मुक्त युग था. उसने लबालब जलस्रोत, उपजाऊ मिट्टी में प्राकृतिक रूप से उगाए हुए प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न देखे थे. आधुनिक युग जैसी सुख-सुविधाएँ चाहे नहीं थी मगर लोगों को तब अभावों के बीच भी स्वच्छन्द जीवन जीने की कला बखूबी आती थी.

एक छोटे से शहर में रहने वाली सरला देवी को प्रकृति-प्रेम विरासत में ही मिला था. पति प्रायमरी सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और निखिल उनका इकलौता पुत्र था. उसने उसी शहर के कोलेज से पढ़ाई करके इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी. पिता की असमय मृत्यु के बाद उसने अच्छी नौकरी के लिए प्रयास जारी रखते हुए घर खर्च के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. वो चाहता तो पिता  स्थान पर शिक्षक की  नौकरी उसे मिल सकती थी मगर उसका सपना कहीं ऊँचा था,  वो जानता था की एक बार शिक्षक  पद  स्वीकार कर लेगा तो  उसी में  उलझकर रह जाएगा. अतः उसने  साफ़ इनकार कर दिया था .

चार कमरों वाले पक्के घर के चारों ओर बहुत सी खाली पड़ी ज़मीन पर सरला देवी ने एक तरफ फल-वृक्ष- आम, जामुन और अमरूद के पेड़ लगा लिए थे वहीं दूसरी तरफ क्यारियाँ बनाकर उगाई हुई सब्जियों से घर की पूर्ति के अलावा उसका शौक भी पूरा हो जाता था.

जैसे-जैसे समय के साथ विज्ञान ने तरक्की के ताले खोले वैसे-वैसे  जनसंख्या में भी बेहिसाब वृद्धि होती गई. फलस्वरूप मानव ने माँग-पूर्ति के लिए चाबी उलटी घुमाना शुरू कर दिया. धरती को बेहिसाब निचोड़ा जाने लगा. सरला देवी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन पति के सान्निध्य में रहते हुए प्रतिदिन अखबार अवश्य पढ़ती थी, अतः ऐसे समाचार उसका मन घायल कर देते थे.

पतिदेव उसके प्रकृति-प्रेम को देखकर कहा करते थे-

“निखिल की अम्मा, रिटायर होने के बाद निखिल की शादी की ज़िम्मेदारी से मुक्त होकर हम  अपना शेष जीवनकाल  लोगों को जागरूक करके पर्यावरण संरक्षण अभियान चलाकर  धरती माँ की सेवा में गुज़ार देंगे.” तब सरला देवी ने यह तो सोचा भी नहीं था कि वे सपने इस तरह बिखर जाएँगे।

उसे वो मनहूस घड़ी बार-बार याद आ रही थी जब निखिल ने उसे खुश होते हुए बताया था –

“माँ मुझे नौकरी के लिए एक नए बसाए हुए शहर में भेजा जा रहा है. वो यहाँ से अधिक दूर भी नहीं है माँ...रात को सुपर फास्ट ट्रेन में चढ़कर सुबह मुँह-अँधेरे ही वहाँ पहुँच जाते हैं. एक बहुत बड़े जंगल को काटकर वो शहर बसाया गया है.”

“नया शहर...? मगर जंगल काटकर शहर बसाने की क्या आवश्यकता थी...?”

“माँ, देश की जनसंख्या में दिनों-दिन वृद्धि होती जा रही है, ऐसी योजनाओं से  आवास की समस्या से बहुत कुछ राहत मिल सकती है.”

“कैसी राहत बेटे, क्या वन उजाड़कर पशु-पक्षियों को बेघर करने से पर्यावरण आहत न होगा?  आवास योजनाओं के दूसरे विकल्प क्यों नहीं खोजे जाते...? क्या धरती को रौंदे बिना यह नहीं हो सकता...? और हमें यहाँ भी तो कोई कमी नहीं है, फिर अपना घर-शहर छोड़ने की क्या आवश्यकता है?

“इतनी चिंता मत कीजिये  माँ,    यह सरकारी उपक्रम है, गैर-क़ानूनी नहीं...  जिन्होंने शहर बसाया है पर्यावरण की चिंता भी वे करेंगे...और  आप वहाँ चलकर ही समझ सकेंगी कि इतना खूबसूरत शहर भी हो सकता है. अभी तो मैंने भी नक़्शे में ही देखा है. शानदार फर्निश्ड दो बेडरूम वाला फ़्लैट, चौबीस घंटे बिजली-पानी...सैर करने के लिए कम्पनी की तरफ से गाड़ी...यह सब  हम यहाँ रहकर कभी नहीं जुटा सकेंगे. कम्पनी नई है इसलिए यह सब उपलब्ध करवाया जा रहा है.  हमें एक सप्ताह बाद ही शिफ्ट होना है, बस अब आप अपनी बहू के साथ मिलकर ले जाने वाले ज़रूरी सामान की सूची बना लेना. बाकी सारा कार्य पैकर्स कर लेंगे.”

"मगर बेटे, मेरी हरी भरी बगिया और फल वृक्षों के बिना मैं कैसे जियूंगी? मेरे बिना उनका क्या होगा ? चिंतातुर स्वर में वो बोली थी."

“आप नहीं जानतीं माँ, आज विज्ञान प्रकृति को भी मात दे रहा है. हम फूलों के पौधों के अलावा हर तरह के वृक्ष  भी गमलों में उगा सकते हैं. मैं आपके कमरे की बालकनी गमलों से भर दूंगा।”

यह सुनकर तो सरला देवी की आँखें नम होने लगी थीं. उसे उस जंगल की दुर्दशा पर तो  रोना आ ही रहा था, अपने  आँगन की बगिया के सूखे हुए अवशेष, और नाज़ों से पालकर बड़े किये हुए फल-वृक्ष जिन्हें अपना नेह निचोड़कर सींचा था,  बौने होते नज़र आने लगे थे. जो अपने विस्थापन का दर्द दिल मे छिपाए सजावटी रंगबिरंगे गमलों में सिमटकर बालकनी में स्थापित हो जाएँगे. तड़पकर बोली थी-

“मगर बेटे,  यह मत भूलो कि कुदरत का  एक  ही कानून होता है...अगर जीवन बचाना है तो धरती बचाओ वरना उसके प्रकोप से जन-जीवन को कोई सरकार नहीं बचा सकेगी. जैसे-जैसे जंगल कटते जाएँगे, वैसे-वैसे जल भी अंतर्ध्यान होता जाएगा.  धरती झुलसने लगेगी और लोग शुद्ध हवा को तरस जाएँगे। मशीनों द्वारा पिलाया हुआ विष उसकी हरी चादर को बेरंग कर देगा और इस तरह उसका रस निचुड़ता रहा तो वो मानव को ही  रसातल पहुंचा देगी."

"पर माँ मैंने नौकरी से इनकार किया तो मेरे स्थान पर किसी और को भेज दिया जाएगा फिर अवि के भविष्य का क्या होगा?"

"लेकिन बेटे,  धरती को बाँझ बनाकर नई पीढ़ी के भविष्य की नींव कैसे रखी जा सकती है? अवि भी तो नई पीढी का ही  हिस्सा है न!"

"ओह! माँ, मैने इस तरह से सोचा  ही नहीं...यह आप बिलकुल सही कह रही हैं।   माँ, आप वहाँ चलकर अपना वन-संरक्षण अभियान शुरू कर देना. मैं वादा करता हूँ कि वहाँ अपनी नौकरी बरकरार रखते हुए उस अभियान में मैं और नयना भी शमिल हो जाएँगे. अभी मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ माँ, मुझे यहाँ के बहुत से काम निपटाने हैं. यह घर भी हम किराए पर दे देंगे ताकि कुछ पैसे आने के साथ ही आपकी धरोहर भी सुरक्षित रहे.”

सरला देवी कुछ और बोलती उससे पहले ही निखिल वहाँ से चला गया था।

सरला देवी जानती थी कि निखिल से बहस करना व्यर्थ है. उसे चुपचाप अपने दिल पर पत्थर रखकर यह सब छोड़कर जाना स्वीकार करना होगा.  उसकी संवेदनाओं को समझने वाला कोई नहीं. जो समझ सकता था वो आठ वर्ष पहले ही अचानक उसका साथ छोड़कर अनंत में विलीन हो गया तो अब किससे और कैसी शिकायत...

वैसे परिवार में सब उसका सम्मान करते हैं. बहू नयना सुन्दर होने के साथ ही  समझदार भी है और उसे कभी शिकायत का अवसर नहीं देती. छः वर्षीय पोता अविनाश जिसे प्यार से सब अवि बुलाते हैं, अधिकतर उसी के आसपास खेलता कूदता रहता है और रात में भी उसके साथ ही चिपक कर सोता है. निखिल का विवाह उसने पति की मृत्यु के बाद ही किया था. वो चाहती तो जाने के लिए मना कर सकती थी मगर वो अपने परिवार के बिना नहीं  रह सकती थी.

“अब वो शहर कहाँ है दादी...?” अचानक उसके विचारों की कड़ी तोडती हुई उनींदे अवि की करुण आवाज़ गूँजी.

“वो शहर...????”

“हाँ दादी...”

“ जहाँ हम जा रहे हैं... "अस्फुट शब्दों में बुदबुदाते हुए सरला देवी ने अपनी तरल होती हुई आँखों को पोंछा और अवि को सुलाने के लिए सीधा किया तो देखा उसे नींद आ चुकी थी और आँखें  आँसुओं से भरी हुई थीं।

कल्पना रामानी, नवी मुंबई

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"par maan mainne naukaree se inakaar kiyaa to mere sthaan par kisee aur ko bhej diyaa jaaegaa phir awi ke bhawishy kaa kyaa hogaa?"

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saralaa dewee kuch aur bolatee usase pahale hee nikhil wahaan se chalaa gayaa thaa

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waise pariwaar men sab usakaa sammaan karate hain bahoo nayanaa sundar hone ke saath hee samajhadaar bhee hai aur use kabhee shikaayat kaa awasar naheen detee chah warsheey potaa awinaash jise pyaar se sab awi bulaate hain, adhikatar usee ke aasapaas khelataa koodataa rahataa hai aur raat men bhee usake saath hee chipak kar sotaa hai nikhil kaa wiwaah usane pati kee mriityu ke baad hee kiyaa thaa wo chaahatee to jaane ke lie manaa kar sakatee thee magar wo apane pariwaar ke binaa naheen rah sakatee thee

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“ab wo shahar kahaan hai daadee?” achaanak usake wichaaron kee kadee todatee huee uneende awi kee karun aawaaz goonjee

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“haan daadee”

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kalpanaa raamaanee, nawee munbaee

गाड़ी आगे बढ़ी जा रही थी और विचारों में डूबी हुई सरला देवी के अंतर्मन का एक हिस्सा पीछे छूटती हुई वस्तुओं के साथ ही छूटा जा रहा था। उसने ठंडी साँस लेकर सीट पर पैर फैलाए ही थे कि बहू की आवाज़ से उसका ध्यान टूट गया.

“माँ जी, आप भोजन कर लीजिये, मैं अवि को खिला देती हूँ फिर उसे अपने पास ही सुला दीजियेगा...निखिल और मैं बाद में खा लेंगे”

सरला देवी ने चुपचाप भोजन ग्रहण करके अपने छः वर्षीय पोते अविनाश को अपने पास बिठा लिया और पुनः विचलित मन के विचारों की कड़ी जोड़ती उससे पहले ही अवि ने उसकी गोद में लेटते हुए अनुनय के स्वर में कहा-

“दादी कहानी सुनाओ न...”

“कहानी...?  ठीक है बेटे, आज मैं तुम्हें अमन-वन की कहानी सुनाती हूँ...” कुछ क्षण सोचने के बाद सरला देवी ने कहा.

“अमन-वन क्या होता है दादी?"

“बेटे, एक बहुत बड़ा जंगल था जिसका नाम अमन-वन था.”

“दादी, क्या वो चम्पक-वन जैसा था, जिसमें बहुत से जानवर रहते हैं?”

“हाँ बेटे, बिलकुल वैसा ही... उसमें बहुत बड़े-बड़े पेड़ भी होते थे.”

“दादी, वो हमारे घर वाले पेड़ों से भी बड़े थे?”

“हाँ, बेटे वे हमारे पेड़ों से बहुत बड़े थे.”

“अच्छा! फिर तो उनमें आम-अमरूद और जामुन भी बड़े बड़े लगते होंगे, है न!”

“हाँ हाँ बड़े और मीठे भी...और बहुत से पेड़ों पर अनेक रंगों के सुन्दर फूल भी लगते थे.”

“फिर क्या हुआ दादी?"

“उस जंगल में हर तरह के पक्षी पेड़ों पर अपने घोंसले और जानवर ज़मीन पर गुफाएँ बनाकर रहते थे. खाने के लिए मीठे फल और पीने के लिए पानी भी उन्हें वहीं पोखरों से मिल जाता था.”

“फिर क्या हुआ दादी?”

“फिर हुआ यह कि एक दिन उस विशाल जंगल पर कुछ दुष्ट इंसानों की नज़र पड़ गई. उन्हें वो जंगल बहुत पसंद आया और उन्होंने वहाँ अपनी कमाई के लिए शहर बनाने की योजना बनाई. धीरे-धीरे सभी पेड़ कटने लगे और पशु-पक्षियों में हाहाकार मच गया. जानवर शहर की तरफ भागने लगे तो उनको पकड़-पकड़ कर पिंजड़ों में डाल दिया गया. पक्षियों के घोंसले गिर गए. जो उड़ सकते थे उड़ गए जो छोटे थे, नहीं उड़ सकते थे वे वहीं मरने लगे."

“फिर  दादी वो पक्षी अपने बच्चों के लिए रोए होंगे न!”

“हाँ मुन्ने बहुत रोए थे और यह सब देखकर धरती काँप उठी थी। फिर उस धरती पर मशीनें चलाकर पूरा खोद दिया गया. जहाँ-जहाँ  पानी के पोखरे थे वहाँ अन्दर गहराई तक मशीनें लगाकर शहर के लोगों के लिए पीने का पानी खींचा जाने लगा। धरती रोती रही...और मशीनें उसे रौंदती रहीं. फिर उस धरती को बड़े बड़े पत्थरों से पाट दिया गया यानी उस अमन वन को दफनाकर बड़ी बड़ी इमारतों वाला नया शहर 'चमनगढ़' बसा लिया गया”

“धरती कैसे रोती है दादी?”

“बेटे, जैसे तुम्हें चोट लगती है तो तुम्हारी माँ रोती है वैसे ही धरती हम सबकी माँ है वो पेड़-पौधों की भी माँ होती है. उनको चोट लगती है तो वो भी रोती है. बस हम उसे रोते हुए देख नहीं सकते...वो हम मनुष्यों के लिए भी रोती है बेटे...वो सोचती है कि अभी तो मनुष्य  उसे पेड़ काट-काट कर और जल निचोड़कर बंजर बना रहे हैं फिर जब उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचेगा तो वे नई पीढ़ी को क्या जवाब देंगे.”

“ओह! दादी वो दुष्ट लोग भी उसी शहर में होंगे न?”

“हाँ बेटे...उन्होंने अपने लिए तो महल ही खड़े कर लिए थे.”

“लेकिन उन दुष्ट लोगों ने ऐसा क्यों किया दादी? मैं वहाँ होता तो पेड़ पर चढ़ जाता और उन्हें पत्थर मार-मार कर भगा देता...!”   मासूम अवि आँखें पोंछते हुए बोल उठा.

“वे इंसान खुद पत्थर ही होते हैं बेटे, पत्थरोँ को पत्थर कौन मार सकता है...?”

“वो कैसे दादी, वो क्या हम जैसे नहीं होते...?"

“होते तो हम जैसे ही हैं मगर उनका दिल पत्थर जैसा  और हाथ कठोर होते हैं वे किसी का दुख दर्द नहीं समझ सकते...वे सिर्फ अपने लिए सोचते हैं... वे नहीं सोचते कि ये मूक-पशु पक्षी बेघर होकर कहाँ जाएँगे...वे नहीं सोचते कि पेड़ों  को भी काटने से पीड़ा हो सकती है...”

संतप्त-मन सरला देवी की बोल तो जुबां रही थी,  मगर उसके मनस्पटल पर बीते हुए युग का दृश्य चित्रित होने लगा था. दो पीढ़ियों के बीच का अंतर  दो युगों के बीच का अंतर ही तो होता है ... सरला देवी ने जिस युग में आँखें खोलीं वो हरा-भरा प्रदूषण मुक्त युग था. उसने लबालब जलस्रोत, उपजाऊ मिट्टी में प्राकृतिक रूप से उगाए हुए प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न देखे थे. आधुनिक युग जैसी सुख-सुविधाएँ चाहे नहीं थी मगर लोगों को तब अभावों के बीच भी स्वच्छन्द जीवन जीने की कला बखूबी आती थी.

एक छोटे से शहर में रहने वाली सरला देवी को प्रकृति-प्रेम विरासत में ही मिला था. पति प्रायमरी सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और निखिल उनका इकलौता पुत्र था. उसने उसी शहर के कोलेज से पढ़ाई करके इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी. पिता की असमय मृत्यु के बाद उसने अच्छी नौकरी के लिए प्रयास जारी रखते हुए घर खर्च के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. वो चाहता तो पिता  स्थान पर शिक्षक की  नौकरी उसे मिल सकती थी मगर उसका सपना कहीं ऊँचा था,  वो जानता था की एक बार शिक्षक  पद  स्वीकार कर लेगा तो  उसी में  उलझकर रह जाएगा. अतः उसने  साफ़ इनकार कर दिया था .

चार कमरों वाले पक्के घर के चारों ओर बहुत सी खाली पड़ी ज़मीन पर सरला देवी ने एक तरफ फल-वृक्ष- आम, जामुन और अमरूद के पेड़ लगा लिए थे वहीं दूसरी तरफ क्यारियाँ बनाकर उगाई हुई सब्जियों से घर की पूर्ति के अलावा उसका शौक भी पूरा हो जाता था.

जैसे-जैसे समय के साथ विज्ञान ने तरक्की के ताले खोले वैसे-वैसे  जनसंख्या में भी बेहिसाब वृद्धि होती गई. फलस्वरूप मानव ने माँग-पूर्ति के लिए चाबी उलटी घुमाना शुरू कर दिया. धरती को बेहिसाब निचोड़ा जाने लगा. सरला देवी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन पति के सान्निध्य में रहते हुए प्रतिदिन अखबार अवश्य पढ़ती थी, अतः ऐसे समाचार उसका मन घायल कर देते थे.

पतिदेव उसके प्रकृति-प्रेम को देखकर कहा करते थे-

“निखिल की अम्मा, रिटायर होने के बाद निखिल की शादी की ज़िम्मेदारी से मुक्त होकर हम  अपना शेष जीवनकाल  लोगों को जागरूक करके पर्यावरण संरक्षण अभियान चलाकर  धरती माँ की सेवा में गुज़ार देंगे.” तब सरला देवी ने यह तो सोचा भी नहीं था कि वे सपने इस तरह बिखर जाएँगे।

उसे वो मनहूस घड़ी बार-बार याद आ रही थी जब निखिल ने उसे खुश होते हुए बताया था –

“माँ मुझे नौकरी के लिए एक नए बसाए हुए शहर में भेजा जा रहा है. वो यहाँ से अधिक दूर भी नहीं है माँ...रात को सुपर फास्ट ट्रेन में चढ़कर सुबह मुँह-अँधेरे ही वहाँ पहुँच जाते हैं. एक बहुत बड़े जंगल को काटकर वो शहर बसाया गया है.”

“नया शहर...? मगर जंगल काटकर शहर बसाने की क्या आवश्यकता थी...?”

“माँ, देश की जनसंख्या में दिनों-दिन वृद्धि होती जा रही है, ऐसी योजनाओं से  आवास की समस्या से बहुत कुछ राहत मिल सकती है.”

“कैसी राहत बेटे, क्या वन उजाड़कर पशु-पक्षियों को बेघर करने से पर्यावरण आहत न होगा?  आवास योजनाओं के दूसरे विकल्प क्यों नहीं खोजे जाते...? क्या धरती को रौंदे बिना यह नहीं हो सकता...? और हमें यहाँ भी तो कोई कमी नहीं है, फिर अपना घर-शहर छोड़ने की क्या आवश्यकता है?

“इतनी चिंता मत कीजिये  माँ,    यह सरकारी उपक्रम है, गैर-क़ानूनी नहीं...  जिन्होंने शहर बसाया है पर्यावरण की चिंता भी वे करेंगे...और  आप वहाँ चलकर ही समझ सकेंगी कि इतना खूबसूरत शहर भी हो सकता है. अभी तो मैंने भी नक़्शे में ही देखा है. शानदार फर्निश्ड दो बेडरूम वाला फ़्लैट, चौबीस घंटे बिजली-पानी...सैर करने के लिए कम्पनी की तरफ से गाड़ी...यह सब  हम यहाँ रहकर कभी नहीं जुटा सकेंगे. कम्पनी नई है इसलिए यह सब उपलब्ध करवाया जा रहा है.  हमें एक सप्ताह बाद ही शिफ्ट होना है, बस अब आप अपनी बहू के साथ मिलकर ले जाने वाले ज़रूरी सामान की सूची बना लेना. बाकी सारा कार्य पैकर्स कर लेंगे.”

"मगर बेटे, मेरी हरी भरी बगिया और फल वृक्षों के बिना मैं कैसे जियूंगी? मेरे बिना उनका क्या होगा ? चिंतातुर स्वर में वो बोली थी."

“आप नहीं जानतीं माँ, आज विज्ञान प्रकृति को भी मात दे रहा है. हम फूलों के पौधों के अलावा हर तरह के वृक्ष  भी गमलों में उगा सकते हैं. मैं आपके कमरे की बालकनी गमलों से भर दूंगा।”

यह सुनकर तो सरला देवी की आँखें नम होने लगी थीं. उसे उस जंगल की दुर्दशा पर तो  रोना आ ही रहा था, अपने  आँगन की बगिया के सूखे हुए अवशेष, और नाज़ों से पालकर बड़े किये हुए फल-वृक्ष जिन्हें अपना नेह निचोड़कर सींचा था,  बौने होते नज़र आने लगे थे. जो अपने विस्थापन का दर्द दिल मे छिपाए सजावटी रंगबिरंगे गमलों में सिमटकर बालकनी में स्थापित हो जाएँगे. तड़पकर बोली थी-

“मगर बेटे,  यह मत भूलो कि कुदरत का  एक  ही कानून होता है...अगर जीवन बचाना है तो धरती बचाओ वरना उसके प्रकोप से जन-जीवन को कोई सरकार नहीं बचा सकेगी. जैसे-जैसे जंगल कटते जाएँगे, वैसे-वैसे जल भी अंतर्ध्यान होता जाएगा.  धरती झुलसने लगेगी और लोग शुद्ध हवा को तरस जाएँगे। मशीनों द्वारा पिलाया हुआ विष उसकी हरी चादर को बेरंग कर देगा और इस तरह उसका रस निचुड़ता रहा तो वो मानव को ही  रसातल पहुंचा देगी."

"पर माँ मैंने नौकरी से इनकार किया तो मेरे स्थान पर किसी और को भेज दिया जाएगा फिर अवि के भविष्य का क्या होगा?"

"लेकिन बेटे,  धरती को बाँझ बनाकर नई पीढ़ी के भविष्य की नींव कैसे रखी जा सकती है? अवि भी तो नई पीढी का ही  हिस्सा है न!"

"ओह! माँ, मैने इस तरह से सोचा  ही नहीं...यह आप बिलकुल सही कह रही हैं।   माँ, आप वहाँ चलकर अपना वन-संरक्षण अभियान शुरू कर देना. मैं वादा करता हूँ कि वहाँ अपनी नौकरी बरकरार रखते हुए उस अभियान में मैं और नयना भी शमिल हो जाएँगे. अभी मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ माँ, मुझे यहाँ के बहुत से काम निपटाने हैं. यह घर भी हम किराए पर दे देंगे ताकि कुछ पैसे आने के साथ ही आपकी धरोहर भी सुरक्षित रहे.”

सरला देवी कुछ और बोलती उससे पहले ही निखिल वहाँ से चला गया था।

सरला देवी जानती थी कि निखिल से बहस करना व्यर्थ है. उसे चुपचाप अपने दिल पर पत्थर रखकर यह सब छोड़कर जाना स्वीकार करना होगा.  उसकी संवेदनाओं को समझने वाला कोई नहीं. जो समझ सकता था वो आठ वर्ष पहले ही अचानक उसका साथ छोड़कर अनंत में विलीन हो गया तो अब किससे और कैसी शिकायत...

वैसे परिवार में सब उसका सम्मान करते हैं. बहू नयना सुन्दर होने के साथ ही  समझदार भी है और उसे कभी शिकायत का अवसर नहीं देती. छः वर्षीय पोता अविनाश जिसे प्यार से सब अवि बुलाते हैं, अधिकतर उसी के आसपास खेलता कूदता रहता है और रात में भी उसके साथ ही चिपक कर सोता है. निखिल का विवाह उसने पति की मृत्यु के बाद ही किया था. वो चाहती तो जाने के लिए मना कर सकती थी मगर वो अपने परिवार के बिना नहीं  रह सकती थी.

“अब वो शहर कहाँ है दादी...?” अचानक उसके विचारों की कड़ी तोडती हुई उनींदे अवि की करुण आवाज़ गूँजी.

“वो शहर...????”

“हाँ दादी...”

“ जहाँ हम जा रहे हैं... "अस्फुट शब्दों में बुदबुदाते हुए सरला देवी ने अपनी तरल होती हुई आँखों को पोंछा और अवि को सुलाने के लिए सीधा किया तो देखा उसे नींद आ चुकी थी और आँखें  आँसुओं से भरी हुई थीं।

कल्पना रामानी, नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗