जल की फुहार jal kee phuhaar जल की फुहार
उस छोटे से गाँव में इस बार मानसूनी वर्षा न होने से किसान बहुत दुखी और परेशान थे आसपास के जलाशय भी सूनी नज़रों से इस तरह आसमान को निहार रहे थे जैसे बादल उनकी दुर्दशा पर रहम खाकर उनकी प्यास बुझाने दौड़े आएँगे. ऐसी स्थिति तो कभी देखने में नहीं आई.
बिना पानी के तैयार फसल चौपट हो चुकी है, सब सोच रहे थे कि कैसे इस अकाल का सामना किया जाए. खलिहान खाली हो चुके हैं, भूखों मरने की स्थिति आ चुकी है. गाँव के साहूकार उनके लिए अपने अन्न के गोदाम खोलने के लिए तैयार तो थे मगर अपने पेट के गोदाम भरने के लिए उनके खेतों पर गिद्ध दृष्टि डाले हुए थे.
आज उस विशाल पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर रामदीन, मातादीन, रघुवेंद्र और जतिन बाबू इस समस्या पर चर्चा के लिए एकत्र हुए थे. इन चारों के खेत जैसे एक दूसरे के साथ मिले हुए थे, वैसे ही घर भी एक ही गली में होने से इनके दिलों के तार भी एक दूसरे से जुड़ चुके थे.
ये चारों पड़ोसी होने के नाते एकजुट होकर ही हर समस्या का समाधान खोजने इसी पीपल के नीचे इकट्ठे होते थे. उनके खेतों में साझा जलाशय भी था मगर वो भी इस बार सूख चुका था. आज की बैठक जतिन बाबू के युवा पुत्र राघव ने ही बुलाई थी. तेज़ दिमाग का धनी और अति महत्वाकांक्षी होने के कारण जतिन बाबू ने उसे गाँव के निकट ही शहर के सरकारी कोलेज में पढ़ाई के लिए भेजा था.
कृषक पुत्र होने के नाते वो कृषि-विज्ञान में ही अपना कैरियर बनाना चाहता था. जतिन बाबू की कमाई का बड़ा हिस्सा उसपर ही खर्च हो जाता था. अब उसे यही चिंता सताने लगी थी कि जब घर की जमा पूँजी पेट की भेंट चढ़ चुकी है तो राघव की पढाई का खर्च कहाँ से आएगा?
बैठक आरम्भ होते ही मातादीन ने राघव को संबोधित करके पूछा-
“बेटे, तुमने किस योजना पर चर्चा के लिए हमें एकत्रित किया है, क्या इस सूखे से निपटने का कोई उपाय तुम जानते हो?”
“जी अंकल, एक कारगर योजना मेरे दिमाग में आई है. अगर हम खेतों के बीच एक सबमर्सिबल पम्प लगवा लें तो हमें सिंचाई के लिए हमेशा वर्षा पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.”
“बात तो ठीक है बेटे, मगर इसके लिए तगड़ी रकम चाहिए, साहूकार तो हमसे स्टाम्प पेपर पर अंगूठा लगवाए बिना रकम देने से रहा और घर की औरतें भी अपनी जमा पूँजी निवालों के हवाले कर चुकी हैं. ऐसे में सबमर्सिबल के सपने तुम क्योंकर दिखा रहे हो?”
“देखिये अंकल, हमें हिम्मत से काम लेना होगा. इस बार हम साहूकार के लपेटे में नहीं आएँगे. शहर के व्यापारी इतने लालची नहीं होते उन्हें हमारे खेतों से कोई लेना-देना नहीं होता. मैंने एक व्यापारी से चर्चा करके ही आप सबको यहाँ बुलाया है. खेतों के कागज़ात तो हमें वहाँ भी गिरवी रखने पड़ेंगे मगर पम्प लगते ही जल-वर्षा से हमारे खेत इतने तृप्त हो जाएँगे कि बची हुई फसल से ही खलिहान खिलखिलाने लगेंगे और हमें भूखों मरने की नौबत नहीं आएगी. फिर अगली फसल में तो हमारे खेत सोना उगलने लगेंगे और निश्चित ही हम क़र्ज़-मुक्त हो जाएँगे.”
राघव की बात सुनते ही सबके मुरझाए चेहरों पर हर्ष की लहर दौड़ गई और रामदीन तुरंत बोल पड़ा-
“फिर तो बेटे यह काम हम तुम्हें ही सौंपते हैं.”
“मैं सारी बातें एक ठेकेदार से तय करके ही आया हूँ अंकल, कल ही ज़मीन का निरीक्षण करने वाले लोग आएँगे और सबमर्सिबल के साथ ही सेवाकर्मी भी...आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं होगी. बल्कि गाँव के अन्य किसानों के लिए भी यह एक उदाहरण बन जाएगा.”
अगले दिन सबमर्सिबल लगने के साथ ही जल की फुहार में सारे खेत नहा रहे थे और बच्चे बड़े सबकी जुबां यही गुनगुना रही थी- मेरे देश की धरती सोना उगले....
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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baithak aarambh hote hee maataadeen ne raaghaw ko sanbodhit karake poochaa-
“bete, tumane kis yojanaa par charchaa ke lie hamen ekatrit kiyaa hai, kyaa is sookhe se nipatane kaa koee upaay tum jaanate ho?”
“jee ankal, ek kaaragar yojanaa mere dimaag men aaee hai agar ham kheton ke beech ek sabamarsibal pamp lagawaa len to hamen sinchaaee ke lie hameshaa warshaa par hee nirbhar naheen rahanaa padegaa”
“baat to theek hai bete, magar isake lie tagadee rakam chaahie, saahookaar to hamase staamp pepar par angoothaa lagawaae binaa rakam dene se rahaa aur ghar kee auraten bhee apanee jamaa poonjee niwaalon ke hawaale kar chukee hain aise men sabamarsibal ke sapane tum kyonkar dikhaa rahe ho?”
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raaghaw kee baat sunate hee sabake murajhaae cheharon par harsh kee lahar daud gaee aur raamadeen turant bol padaa-
“phir to bete yah kaam ham tumhen hee saunpate hain”
“main saaree baaten ek thekedaar se tay karake hee aayaa hoon ankal, kal hee zameen kaa nireekshan karane waale log aaenge aur sabamarsibal ke saath hee sewaakarmee bheeaapako kuch karane kee aawashyakataa naheen hogee balki gaanv ke any kisaanon ke lie bhee yah ek udaaharan ban jaaegaa”
agale din sabamarsibal lagane ke saath hee jal kee phuhaar men saare khet nahaa rahe the aur bachche bade sabakee jubaan yahee gunagunaa rahee thee- mere desh kee dharatee sonaa ugale
kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
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उस छोटे से गाँव में इस बार मानसूनी वर्षा न होने से किसान बहुत दुखी और परेशान थे आसपास के जलाशय भी सूनी नज़रों से इस तरह आसमान को निहार रहे थे जैसे बादल उनकी दुर्दशा पर रहम खाकर उनकी प्यास बुझाने दौड़े आएँगे. ऐसी स्थिति तो कभी देखने में नहीं आई.
बिना पानी के तैयार फसल चौपट हो चुकी है, सब सोच रहे थे कि कैसे इस अकाल का सामना किया जाए. खलिहान खाली हो चुके हैं, भूखों मरने की स्थिति आ चुकी है. गाँव के साहूकार उनके लिए अपने अन्न के गोदाम खोलने के लिए तैयार तो थे मगर अपने पेट के गोदाम भरने के लिए उनके खेतों पर गिद्ध दृष्टि डाले हुए थे.
आज उस विशाल पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर रामदीन, मातादीन, रघुवेंद्र और जतिन बाबू इस समस्या पर चर्चा के लिए एकत्र हुए थे. इन चारों के खेत जैसे एक दूसरे के साथ मिले हुए थे, वैसे ही घर भी एक ही गली में होने से इनके दिलों के तार भी एक दूसरे से जुड़ चुके थे.
ये चारों पड़ोसी होने के नाते एकजुट होकर ही हर समस्या का समाधान खोजने इसी पीपल के नीचे इकट्ठे होते थे. उनके खेतों में साझा जलाशय भी था मगर वो भी इस बार सूख चुका था. आज की बैठक जतिन बाबू के युवा पुत्र राघव ने ही बुलाई थी. तेज़ दिमाग का धनी और अति महत्वाकांक्षी होने के कारण जतिन बाबू ने उसे गाँव के निकट ही शहर के सरकारी कोलेज में पढ़ाई के लिए भेजा था.
कृषक पुत्र होने के नाते वो कृषि-विज्ञान में ही अपना कैरियर बनाना चाहता था. जतिन बाबू की कमाई का बड़ा हिस्सा उसपर ही खर्च हो जाता था. अब उसे यही चिंता सताने लगी थी कि जब घर की जमा पूँजी पेट की भेंट चढ़ चुकी है तो राघव की पढाई का खर्च कहाँ से आएगा?
बैठक आरम्भ होते ही मातादीन ने राघव को संबोधित करके पूछा-
“बेटे, तुमने किस योजना पर चर्चा के लिए हमें एकत्रित किया है, क्या इस सूखे से निपटने का कोई उपाय तुम जानते हो?”
“जी अंकल, एक कारगर योजना मेरे दिमाग में आई है. अगर हम खेतों के बीच एक सबमर्सिबल पम्प लगवा लें तो हमें सिंचाई के लिए हमेशा वर्षा पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.”
“बात तो ठीक है बेटे, मगर इसके लिए तगड़ी रकम चाहिए, साहूकार तो हमसे स्टाम्प पेपर पर अंगूठा लगवाए बिना रकम देने से रहा और घर की औरतें भी अपनी जमा पूँजी निवालों के हवाले कर चुकी हैं. ऐसे में सबमर्सिबल के सपने तुम क्योंकर दिखा रहे हो?”
“देखिये अंकल, हमें हिम्मत से काम लेना होगा. इस बार हम साहूकार के लपेटे में नहीं आएँगे. शहर के व्यापारी इतने लालची नहीं होते उन्हें हमारे खेतों से कोई लेना-देना नहीं होता. मैंने एक व्यापारी से चर्चा करके ही आप सबको यहाँ बुलाया है. खेतों के कागज़ात तो हमें वहाँ भी गिरवी रखने पड़ेंगे मगर पम्प लगते ही जल-वर्षा से हमारे खेत इतने तृप्त हो जाएँगे कि बची हुई फसल से ही खलिहान खिलखिलाने लगेंगे और हमें भूखों मरने की नौबत नहीं आएगी. फिर अगली फसल में तो हमारे खेत सोना उगलने लगेंगे और निश्चित ही हम क़र्ज़-मुक्त हो जाएँगे.”
राघव की बात सुनते ही सबके मुरझाए चेहरों पर हर्ष की लहर दौड़ गई और रामदीन तुरंत बोल पड़ा-
“फिर तो बेटे यह काम हम तुम्हें ही सौंपते हैं.”
“मैं सारी बातें एक ठेकेदार से तय करके ही आया हूँ अंकल, कल ही ज़मीन का निरीक्षण करने वाले लोग आएँगे और सबमर्सिबल के साथ ही सेवाकर्मी भी...आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं होगी. बल्कि गाँव के अन्य किसानों के लिए भी यह एक उदाहरण बन जाएगा.”
अगले दिन सबमर्सिबल लगने के साथ ही जल की फुहार में सारे खेत नहा रहे थे और बच्चे बड़े सबकी जुबां यही गुनगुना रही थी- मेरे देश की धरती सोना उगले....
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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