कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १५२ / २०४ № 152 of 204 रचना १५२ / २०४
२८ अगस्त २०१९ 28 August 2019 २८ अगस्त २०१९

खेत-खेत उपजेगा सोना khet-khet upajegaa sonaa खेत-खेत उपजेगा सोना

कल पुर्जों पर, ही यह जीवन

यदि मानव का निर्भर होगा।

नई सदी में, ज़रा सोचिए

जीना कितना दुष्कर होगा।

यंत्रों की हो रहीं खेतियाँ

खाद-बीज निर्जीव सभी हैं

फल क्यों जीवित हमें मिलेंगे

अगर जीन ही जर्जर होगा?

रोटी, शिक्षा, रोजगार, घर

मूल समस्याएँ जन-जन की

मिलकर सब जन अगर विचारें

समाधान भी बेहतर होगा।

कल पर ही क्यों नज़रें होतीं

काल कभी कहकर आया है?

आज अगर यह अवसर खोया

महाप्रलय का मंजर होगा।

मूढ़ खिवैया, डगमग नैया

बीच भँवर में फँसी बेबसी

होश तभी आएगा शायद

जब पानी सिर ऊपर होगा।

हुक्मरान ने उलझाया है

हर हिसाब को जाल बिछाकर

सुलझेंगे तब मसले सारे

जब हर एक जन साक्षर होगा।

शिक्षित हाथों में हल लेकर

सिंचित हो यदि श्रम की खेती

खेत-खेत उपजेगा सोना

हरा गाँव का हर घर होगा।

संकल्पों की थाम लेखनी

लेख उकेरें पाषाणों पर

जो लिक्खेंगे आज ‘कल्पना’

वही मील का पत्थर होगा।

kal purjon par, hee yah jeewan

yadi maanaw kaa nirbhar hogaa

naee sadee men, zaraa sochie

jeenaa kitanaa dushkar hogaa

·

yantron kee ho raheen khetiyaan

khaad-beej nirjeew sabhee hain

phal kyon jeewit hamen milenge

agar jeen hee jarjar hogaa?

·

rotee, shikshaa, rojagaar, ghar

mool samasyaaen jan-jan kee

milakar sab jan agar wichaaren

samaadhaan bhee behatar hogaa

·

kal par hee kyon nazaren hoteen

kaal kabhee kahakar aayaa hai?

aaj agar yah awasar khoyaa

mahaapralay kaa manjar hogaa

·

mooढ़ khiwaiyaa, dagamag naiyaa

beech bhanvar men phansee bebasee

hosh tabhee aaegaa shaayad

jab paanee sir oopar hogaa

·

hukmaraan ne ulajhaayaa hai

har hisaab ko jaal bichaakar

sulajhenge tab masale saare

jab har ek jan saakshar hogaa

·

shikshit haathon men hal lekar

sinchit ho yadi shram kee khetee

khet-khet upajegaa sonaa

haraa gaanv kaa har ghar hogaa

·

sankalpon kee thaam lekhanee

lekh ukeren paashaanon par

jo likkhenge aaj ‘kalpanaa’

wahee meel kaa patthar hogaa

कल पुर्जों पर, ही यह जीवन

यदि मानव का निर्भर होगा।

नई सदी में, ज़रा सोचिए

जीना कितना दुष्कर होगा।

यंत्रों की हो रहीं खेतियाँ

खाद-बीज निर्जीव सभी हैं

फल क्यों जीवित हमें मिलेंगे

अगर जीन ही जर्जर होगा?

रोटी, शिक्षा, रोजगार, घर

मूल समस्याएँ जन-जन की

मिलकर सब जन अगर विचारें

समाधान भी बेहतर होगा।

कल पर ही क्यों नज़रें होतीं

काल कभी कहकर आया है?

आज अगर यह अवसर खोया

महाप्रलय का मंजर होगा।

मूढ़ खिवैया, डगमग नैया

बीच भँवर में फँसी बेबसी

होश तभी आएगा शायद

जब पानी सिर ऊपर होगा।

हुक्मरान ने उलझाया है

हर हिसाब को जाल बिछाकर

सुलझेंगे तब मसले सारे

जब हर एक जन साक्षर होगा।

शिक्षित हाथों में हल लेकर

सिंचित हो यदि श्रम की खेती

खेत-खेत उपजेगा सोना

हरा गाँव का हर घर होगा।

संकल्पों की थाम लेखनी

लेख उकेरें पाषाणों पर

जो लिक्खेंगे आज ‘कल्पना’

वही मील का पत्थर होगा।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗