जवाब दीजिये (प्रेम और अलगाव की अनोखी कथा) jawaab deejiye (prem aur alagaaw kee anokhee kathaa) जवाब दीजिये (प्रेम और अलगाव की अनोखी कथा)
मई माह की जानलेवा गर्मी की प्रभात वेला में मुरुड़ बीच (महाराष्ट्र) पर स्थित होटल “डिवाइन होम स्टे” के अंदरूनी विशाल द्वार पर खड़ा आशीष अपने क़दमों में लोटते अनंत सागर की अथाह गहराई में खोया हुआ था कि अचानक उसकी मौन साधना को भंग करती हुई क़दमों की आहट उसके निकट ही आकर ठहर गई. पलटकर देखा तो एक १७- १८ वर्षीय प्यारी सी किशोर वय की बालिका मोबाइल हाथ में लिए उसी को निहार रही थी.
आशीष के पलटते ही उसने अपना मोबाइल का कैमरा ऑन करके उसे देते हुए अनुरोध भरे स्वर में कहा -
“अंकल, इस समुद्र के साथ मेरी कुछ तस्वीरें लीजिये न...” और बिना आशीष के उत्तर की प्रतीक्षा किये फुदकती हुई चिकने पत्थरों की सीढ़ी से नीचे उतरने लगी. उसे आगे बढ़ते देख आशीष का कलेजा काँप उठा, घबराकर बोला-
“अरे बिटिया बस! अब और नीचे मत जाओ, मैं यहीं तुम्हारे मनपसंद चित्र खींच लूँगा.”
“डरिये मत अंकल, मैं बहुत अच्छी तैराक हूँ और वैसे भी यहाँ पानी गहरा नहीं होगा. कुछ ही देर में लहरें वापस चली जाएँगी और रेत दिखने लगेगी. मगर आप कहते हैं तो यहीं खड़ी हो जाती हूँ.” बालिका ने मुस्कुराते हुए कहा
आशीष ने उसके विभिन्न मुद्राओं में कई चित्र खींचे और ऊपर आने का आग्रह किया. वो उसकी बातचीत के तरीके से बहुत प्रभावित हुआ था. प्यार से पूछा-
“तुम कहाँ रहती हो बिटिया और यहाँ किसके साथ आई हो?”
“मैं मुंबई में बोरीवली वेस्ट के एक फ़्लैट में रहती हूँ अंकल और अपनी कोलेज की सहेलियों के साथ यहाँ आई हूँ.”
“धन्य हैं तुम्हारे माँ-पिता बेटी, बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं तुम्हें...”
“सिर्फ माँ कहिये अंकल, मेरे पिता हमारे साथ नहीं रहते.” एकदम बेबाकी से किशोरी ने उत्तर दिया.
“क्यों भला?”
“आपके इस क्यों का जवाब देना मेरे लिए इतना आसान नहीं अंकल और अगर आपको सुनना ही हो तो पहले मेरे अनगिनत क्यों के जवाब देने होंगे...अगर आप इसके लिए तैयार हैं और आपके पास कुछ समय है तो चलिए अन्दर बैठते हैं, वहीँ चर्चा करेंगे... मेरी सहेलियाँ जल्दी नहीं उठने वालीं... मैं तो रात में अलार्म लगाकर सोई थी ताकि समुद्र के साथ सुनहरी भोर का नज़ारा कैमरे में उतार सकूँ. अच्छा हुआ यहाँ आप मिल गए वरना सेल्फी से ही संतोष करना पड़ता.”
“मैं फुर्सत में ही हूँ बेटी, इस सागर का किनारा ही मुझे यहाँ खींचकर लाता है, और अकेले ही चला आता हूँ, चलो चलते हैं.”
कुछ ही देर में वे दोनों नाश्ते के लिए रखी हुई एक टेबल पर आमने सामने थे. आशीष उस बालिका के सवाल सुनने को उत्सुक था बैठते ही बात छेड़ी-
“हाँ तो बिटिया, तुम क्या पूछना चाहती थी?”
“प्रथम तो यह बताइए अंकल कि आप स्त्री को. उसे कानूनी तौर पर मिले विशेषाधिकारों के अलावा पुरुष के समान अधिकार मिलने का कहाँ तक समर्थन करते हैं?”
आशीष पहले तो बालिका के मुँह से इतना परिपक्व सवाल सुनकर हैरानी से उसका मुँह ताकने लगा, फिर जल्दी ही सँभलकर बोला-
“अगर अधिकार मर्यादा की सीमा रेखा के अन्दर हों तो पूरी तरह समर्थन करता हूँ बेटी, मगर तुम्हारी उम्र अभी इस तरह के सवालों से उलझने की तो नहीं...”
“आप सही कहते हैं अंकल, मगर मुझे परिस्थितियों ने समय से पहले परिपक्व बना दिया है. मेरी सहेलियों के जवाब मुझे संतुष्ट नहीं कर पाते और आपकी बातों में मुझे अपनेपन की झलक दिखाई दी तो आज आपके सामने मन की बातें कह रही हूँ. हो सकता है आप पुरुष होने के नाते मेरी जिज्ञासा शांत कर दें.”
“बिलकुल हो सकता है बेटी, बेफिक्र होकर अपनी समस्या बताओ.”
“जी अंकल, आप यह बताइए कि अगर शादी के बाद स्त्री को अपने पति से वे अधिकार न मिलें तो उसे क्या करना चाहिए?”
“यह तो समय और परिस्थितियों पर निर्भर है बेटी, नारी तो शक्ति स्वरूपा है, उसे परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के प्रयास करने चाहियें.”
“और अगर ससुराल में परिस्थितियाँ अनुकूल न हो पाएँ यानी सास-बहू में हरसमय तनातनी चलती रहती हो तो पति की भूमिका क्या होनी चाहिए?”
“पति की स्थिति तो शादी होते ही चक्की के दो पाटों में पिसते हुए अनाज जैसी हो जाती है बेटी... वो बेचारा कर ही क्या सकता है, सिवाय चुप रहने के...”
“क्यों नहीं कर सकता अंकल, अभी आपने स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का समर्थन किया है...फिर अगर किसी भी उपाय से बात न बने तो गृह कलह से बचने के लिए क्या उसे अपनी गृहस्थी अलग नहीं कर लेनी चाहिए?”
“और अगर लड़का माँ-पिता का इकलौता बेटा हुआ तो...?”
“तो क्या? लड़की भी अपने माँ-पिता की इकलौती संतान हो सकती है...अगर वो शादी के बाद पति के साथ गृहस्थी बसाने के सपने सँजोए अपना परिवार छोड़कर आ सकती है तो लड़का क्यों नहीं...?"
"मगर इससे तो रिश्तों की रीढ़ ही टूट जाएगी बेटी... भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की पहचान ही खो जाएगी."
"आप रिश्तों की रीढ़ टूटने की बात कह रहे हैं अंकल, पर यदि नारी को रूढ़ियों की रगड़ से मुक्त नहीं किया गया तो रिश्ते ही रसातल को न चले जाएँगे...?और परम्पराओं की नींव भी तो नारी के अधिकारों को कुचलने के लिए नर-समाज द्वारा ही रखी गई थी न...अब वो ज़माना नहीं जब बड़े परिवार होते थे और लड़कियों को शिक्षा से अधिक घरेलू कामकाज में दक्ष होना आवश्यक होता था. आखिर आज भी क्यों उसे हर स्थिति में ससुराल वालों की प्रताड़ना सहते रहने के लिए बाध्य किया जाता है? जब कानून ने स्त्री को इतने विशेषाधिकार दिए हैं कि गिनते-गिनते ही थक जाएँ तो पुरुष समाज उसके स्वाभाविक समान अधिकारों का आज भी हनन करना क्यों जारी रखे हुए है?"
"हुम्म..."
"एक सवाल और -
मान लीजिये अंकल, अगर शादी के बाद कोई पत्नी लगातार अपने पति के, उसकी बात मानने के अनुरोध की अवहेलना करती रहे और मानसिक तनाव की स्थिति में पति अन्य महिला की सहानुभूति पाकर उससे प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर ले और पत्नी से विमुख होने लगे तो पता चलने पर उसकी पत्नी को क्या करना चाहिए? यानी उसे पति को दुश्चरित्र करार देकर अपनी ज़िन्दगी से निष्कासित कर देना चाहिए अथवा माफ़ करके संभलने का अवसर देना चाहिए?"
"ऐसा अक्सर होता रहता है बेटी, अगर पति की कही गई बात उचित हो तो उसकी अवहेलना करने के कारण पति के मानसिक तनाव के लिए प्रथम दृष्टया पत्नी ही दोषी मानी जाएगी. और अगर इस स्थिति में पति के कदम बहक जाएँ तो पत्नी का कर्तव्य उसे सहारा देकर सही मार्ग पर लाना और उसकी माँग पर पुनः विचार करके उचित निर्णय लेना चाहिए. एक छोटी सी भूल के लिए जीवन से निष्कासित करना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता..."
"बिलकुल सही कहा आपने अंकल और अगर यही भूल उन्हीं परिस्थितियों में पत्नी से हो जाए तो पति का भी वही कर्तव्य हो जाता है या उसके लिए अलग मापदंड होंगे? सोचकर बताइए अंकल, क्या यह प्रसंग नारी के समान अधिकारों से अलग है?
जवाब दीजिये अंकल, जवाब दीजिये...
मगर मैं जानती हूँ आप जवाब नहीं दे पाएँगे आखिर आप भी तो पुरुष ही हैं न...क्षमा कीजिये, मैं शायद कुछ अधिक ही बोल गई हूँ...”
“नहीं बेटी, मगर इन सवालों का मेरे उस सवाल से क्या सम्बन्ध है?.”
“है अंकल बिलकुल है...मेरी माँ से एक ऐसी भूल हो गई थी जिसे औरत के लिए बहुत बड़ी और पुरुष के लिए यह समाज मामूली मानता है... जब माँ के अलग गृहस्थी बसाने के लिए बार-बार अनुनय विनय और फ़रियाद के बावजूद पिताजी ने उसे ससुराल रूपी दमघोंटू पिंजरे से मुक्त करने का कोई प्रयास नहीं किया तो एक अन्य पुरुष की सहानुभूति पाकर वो उसकी तरफ आकर्षित हो गई थी...पता चलने पर मेरे पिता ने उसे माफ़ नहीं किया और दुश्चरित्र करार देकर घर से निष्कासित कर दिया. उन्होंने यह नहीं सोचा कि उस भूल के मूल में उनकी ही गलती है."
"फिर तो उनका तलाक हो गया होगा?”
“नहीं, इसके लिए किसी ने पहल नहीं की. दस साल बीत चुके हैं. माँ कहती है वो चाहती तो हर्जा-खर्चा वसूल कर सकती थी मगर उसने तो प्यार किया था...सौदा कैसे करती?”
“फिर गुजर-बसर किस तरह हो रही है बेटी...क्या तुम्हारी माँ नौकरी करती है?”
“जी अंकल, वो एक माध्यमिक स्कूल में शिक्षिका है. शादी के बाद पिताजी की शर्त के अनुसार उसने नौकरी छोड़ दी थी...एक बात और, वो अपने माँ-पिता से अलग रहते हुए भी परोक्ष रूप से उनकी देखरेख करके अपना फ़र्ज़ बखूबी निभा रही है..."
“वो देखिये अंकल, मेरी सहेलियाँ तैयार होकर आ गईं. नाश्ता लग चुका है, आप ले लीजिये, हमें भी नाश्ता करके यह होटल छोड़ना होगा, मेरा मोबाइल नंबर नोट कर लीजिये. कभी मेरे सवालों के जवाब मिल जाएँ तो संपर्क कर लीजियेगा...मेरा नाम आर्ची है...” कहते हुए बालिका अपनी सहेलियों की तरफ बढ़ गई.
आर्ची... आशीष को बालिका की बातों से कुछ अनुमान तो हो गया था कि यह कहानी उसी से संबंधित है...अब उसका नाम सुनते ही उसे पूरा विश्वास हो गया कि आर्ची उसी की बेटी है. अचानक उसका मस्तिष्क सुन्न होने लगा और वो नाश्ता भूलकर अपना सर पकड़कर वापस वहीं बैठ गया. उसकी आँखें मुंदी जा रही थीं और कहानी १० साल पहले की समय रेखा पर पहुँच गई थी.
नवी मुंबई के पनवेल शहर में रहने वाला आशीष अपने माँ-पिता की इकलौती संतान था. कालेज से बी. टेक की पढ़ाई पूरी होने के बाद वो किसी अच्छी कंपनी में जॉब करना चाहता था मगर उसके पिता चाहते थे कि वो उसके व्यवसाय में सहायता करे. आखिर आगे पीछे यह सब उसे ही सँभालना है.
आशीष अपने पिता की इच्छा के विपरीत नहीं जा सकता था अतः अपना कैरियर त्यागकर पिता के व्यवसाय से जुड़ गया. कोलेज छूटते ही उसके सारे मित्र छूट गए, वो मौज-मस्ती, आज़ादी सब भूल गया, बस नहीं भूला तो मुरुड़ का सागर-किनारा जो उसके दिल-दिमाग में गहरे रचा-बसा हुआ था.
वो गंभीर प्रकृति का युवक था. जहाँ उसके सहपाठी सैर-सपाटे का कार्यक्रम अपनी गर्ल-फ्रेंड्स के साथ बनाते थे वहीं आशीष अपने चुनिन्दा मित्रों के साथ १५-२० दिनों के अंतराल से मुरुड़-बीच पर ही जाना पसंद करता था और उसके रुकने का मनपसंद स्थान “डिवाइन होम स्टे” होटल ही हुआ करता था.व्यवसाय में आने के बाद उसने शीघ्र ही अपनी रुचि के कुछ मित्र बना लिए और मुरुड़-बीच पर जाने का क्रम जारी रहा. तीन-चार मित्र मिलकर सुबह निकल पड़ते, तीन घंटे सफ़र के बाद भोजन करके शाम तक बीच पर लहरों के साथ अठखेलियाँ करते और एक रात होटल में बिताकर अगले दिन वापस हो लेते थे.
प्रकृति-प्रेमी आशीष को अगले दिन की सुबह का बेसब्री से इंतज़ार रहता और वो मुँह-अँधेरे उठकर मित्रों को सोता छोड़कर नीचे आ जाता और भोजन परिसर में स्थित बड़े से गेट के पास कुर्सी पर बैठकर रात में ज्वार चढ़े सागर का सुबह की सुखद बयार में चरणों में लोटता हुआ रूप मुग्ध होकर आत्मसात करता रहता. शाम के समय होटल से कुछ दूर जो लहरें चंचलता की चुनरी ओढ़कर उछलकूद मचातीं वे सुबह की वेला में पुनः प्रिय-दर्शन के इंतज़ार में शांत और गंभीर रूप धारण कर लेती थीं.
यह नज़ारा उसे बहुत प्रिय था. जब तक मित्रगण उठकर नाश्ते के लिए नीचे पहुँचते, वो वहीं बैठा रहता था.ऐसी ही उस मुरुड़-बीच की एक सुहानी सुबह को आशीष अपने मित्रों को होटल के कमरे में सोता छोड़कर नीचे आकर सागर से मिलने उस गेट के पास पहुँचा तो सामने ही उसे एक युवती ढलान से कुछ नीचे उतरकर सेल्फी लेती हुई दिखाई दी.
उसकी पिंडलियाँ घुटनों से कुछ नीचे तक पानी में डूबी हुई थीं. वो गहरे नीले रंग के नाइट-सूट में एक जलपरी जैसी प्रतीत हो रही थी. आशीष खड़े होकर मुग्ध-मन उस रूपसी को निहारने लगा.आशीष प्रकृति के इस दोहरे सौंदर्य का रसपान कर ही रहा था कि अचानक युवती का पैर फिसला या वो पत्थर जिसपर वो खड़ी थी, वो नीचे की तरफ गिरते हुए जोर से चिल्ला उठी.
हतप्रभ आशीष जूते उतारकर मोबाइल वहीं पटककर तुरंत दौड़ पड़ा और उसने कुछ नीचे उतरकर झुककर अपना संतुलन बनाते हुए युवती को दोनों बाजुओं से कसकर पकड़ लिया. थर-थर काँपती युवती की जान में जान आई. मगर अब आशीष की स्थिति ऐसी थी कि वो घुटनों तक पानी में डूबी युवती को उस ढलान से ऊपर खींच नहीं पा रहा था. अधिक जोर लगाने पर चट्टान फिसलने का डर था. उसने सहायता के लिए जोर जोर से आवाजें लगाईं मगर आसपास कोई न होने से उसकी प्रतिध्वनि ही वापस सुनाई दी. अब वो क्या करता. उसने पीछे पलटकर चिकने पत्थरों से निर्मित ढलाननुमा सीढ़ी को देखा और युवती को जोर से बाँहों में भींचकर पीछे की ओर खिसकते हुए चित लेट गया. युवती उसके सीने से लगी उसके ऊपर ही पड़ी भय से काँप रही थी.
अब वे खतरे से बाहर आ गए थे. आशीष ने उसने युवती के हाथ में मोबाइल देखकर कहा-“प्लीज़ आप रिलेक्स हो जाइये और होटल मैनेजर को काल कीजिये मेरा मोबाइल ऊपर दूर पड़ा है.”युवती ने अपनी बढ़ी हुई धडकन पर काबू पाकर मैनेजर को काल करके अपनी स्थिति बयान कर दी.कुछ ही पलों में सिक्योरिटी के जवानों सहित मैनेजर भी वहाँ दौड़ा आया.
भीड़ देखकर कुछ लोग भी एकत्रित हो गए. अजीब नज़ारा था मगर उन्हें सुरक्षित ऊपर खींच लिया गया. दोनों के वस्त्र गीले हो चुके थे. एक दूसरे को देखकर उस स्पर्श का अहसास करके दोनों के होठों पर मुस्कान उभर आई. भीड़ छंटते ही आशीष ने उसे ऊपर जाकर तुरंत वस्त्र बदलने के लिए कहा मगर युवती को अभी भी बेहाल देखकर उसने उसका हाथ पकड़कर सीढियों से ऊपर तक पहुँचाया.
इत्तफाक से दोनों के कमरे एक ही गैलरी में थे. दोनों अपने अपने कमरे की और मुड़ गए.आशीष ने देखा, उसके साथी अभी तक आराम फरमा रहे थे. उसने बेआवाज़ वस्त्र बदले और पुनः नीचे आ गया.युवती के उस स्पर्श के अहसास से उसके होंठ रह रह कर मुस्कुरा उठते थे. और जैसा उसका अनुमान था, वस्त्र बदलकर वो युवती भी नीचे पहुँच गई और आशीष के निकट आकर शर्म से नज़रें नीची किये हुए ही बोली-
“बहुत बहुत धन्यवाद मि...”
“आशीष...मेरा नाम आशीष है मिस...”
“आप मुझे रचना कह सकते हैं, आशीष जी, आज अगर आप वहाँ न होते तो मेरा न जाने क्या हाल होता.”
“धन्यवाद तो ऊपरवाले को कहिये रचना जी, उसके मन में कुछ तो बात होगी जो हमें इस तरह मिलवाया... आइये, जब तक हमारे साथी नीचे आएँ हम वहाँ लान में चलते हैं.”
लॉन में साथ-साथ टहलते हुए ही उनके बीच परिचय से लेकर विचारों का आदान-प्रदान होता रहा. रचना मुंबई के ही बोरीवली वेस्ट में रहती थी और एक माध्यमिक स्कूल में शिक्षण कार्य करती थी. वो भी अपने माँ-पिता की इकलौती बेटी थी. यहाँ अपने स्कूल की शिक्षिकाओं के साथ घूमने आई थी. अब घर में उसके लिए वर खोजने की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी.
आशीष के माँ-पिता ने तो उसके लिए सुन्दर सुशिक्षित लड़कियों के चित्रों का ढेर ही लगा दिया था. बस उसकी पसंद और सहमति की ही देर थी. मगर अब एक दूसरे के उस मादक स्पर्श से दोनों के मन में प्रेम का बीज प्रस्फुटित होने लगा था जो उनके तन मन को उद्वेलित किये जा रहा था.
प्रेम के इज़हार के लिए पहल आशीष को ही करनी थी, फिर दुबारा यह अवसर मिले न मिले यह सोचकर आशीष ने बिना किसी भूमिका के रचना के आगे विवाह का प्रस्ताव रख दिया. रचना ने नज़रें झुकाकर मौन स्वीकृति दे दी. आशीष ने उत्साह पूर्वक प्यार से उसका हाथ थामा और दोनों निकट ही एक झूले पर बैठकर भविष्य के सपनों में खो गए.अब घर वालों को सूचित करना ही बाकी था.
एक ही जाति के होने से उनके मिलन में किसी रुकावट की संभावना नहीं के बराबर थी. दोनों एक दूसरे से जुदा होना चाहते तो नहीं थे मगर दोनों के मित्रगण साथ थे, अतः सदा के लिए एक दूसरे का होने के वादे और मोबाइल नंबरों के आदान प्रदान के साथ वे अपने अपने कमरों की ओर बढ़ गए.अब दोनों को घर पहुँचकर अपने अपने परिजनों को अपनी पसंद पर मुहर लगाने के लिए तैयार करने की जल्दी थी.
आशीष की माँ ने उसकी पसंद का स्वागत करते हुए एक ही शर्त रखी कि शादी के बाद रचना नौकरी नहीं करेगी, ताकि पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करना आसान हो. रचना के माँ-पिता के लिए बेटी की प्रसन्नता ही सबसे बढ़कर थी. बस रचना को इतनी पढ़ाई के बाद घर बैठना गवारा नहीं था, लेकिन अपने प्यार की खातिर उसने अपने सपनों की बलि देना भी स्वीकार कर लिया.
शीघ्र ही देखने दिखाने की औपचारिकता के साथ सगाई हो गई और शादी का शुभ मुहूर्त भी निकलवा लिया गया जो छः महीने बाद का था. तब तक उन्होंने हर सप्ताहांत में उसी बीच पर मिलते रहने का एक दूसरे से वादा किया.आशीष और रचना के लिए प्रेम ऋतू शुरू हो चुकी थी. सप्ताह के पाँच दिन तो काटे नहीं कटते थे और अंतिम दो दिन समय जैसे पंख पहन लेता था.
वे आने-जाने के चंद घंटों के अलावा सारा दिन हाथों में हाथ डाले बीच पर प्रेमालाप में बिताते और देर रात घर वालों की हिदायत के अनुसार होटल के अपने-अपने कमरों में सो जाते.उन्होंने शादी के बाद हनीमून के लिए भी आपसी सहमति से मुरुड बीच पर आना तय किया और आशीष ने मुरुड के सबसे अच्छे होटल में एक सप्ताह के लिए कमरा भी बुक करवा लिया.समय ने करवट बदली और छः महीने बीतते ही उनका शुभ-विवाह संपन्न हो गया. इस तरह दो प्रेमी सदा के लिए एक दूसरे के हो गए.
शादी के कुछ महीनों बाद ही रचना गर्भवती हो गई और समय पर एक स्वस्थ और सुन्दर बालिका को जन्म दिया. आशीष तो बेटी पाकर फूला नहीं समाया और उन दोनों ने अपने नामों को मिलाकर उसे आर्ची नाम दिया.बच्ची के जन्म के साथ ही रचना की पारिवारिक जवाबदारियों में वृद्धि होती गई और साथ ही नई परेशानी भी शुरू हो गई.
उसकी सास बहुत तुनकमिजाज महिला थी. वो रचना की हर गतिविधि में मीन-मेख निकालना और टोकते रहना अपना अधिकार समझती थी. पहले तो रचना समय पर सब ठीक होने की उम्मीद में चुपचाप सहन कर लेती थी मगर गुड़िया के जन्म के बाद उसके मानसिक शोषण में वृद्धि होती गई और वो उस दमघोंटू पिंजरे में बंद कैदी सी छटपटाने लगी थी. रात में अगर वो आशीष से शिकायत करती तो वो सुनी अनसुनी कर देता या रचना को ही सामंजस्य बनाए रखने की हिदायत देता. रचना अब बुझी बुझी सी रहने लगी थी. उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था...
एक दिन रात को प्रेमालाप के पलों में रचना ने आशीष को प्यार से अपनी परेशानी बताकर गृहस्थी अलग बसाने की बात कही तो वो भड़क गया और बोला-“यह तुम क्या कह रही हो रचना...मैं अपने माँ-पिता का इकलौता बेटा हूँ, यह नहीं हो सकता. फिर कभी यह बात अपने मुँह से न निकालना..."
रंग में भंग होते ही दोनों मुँह फेरकर सो गए. रचना को अब आशीष से विरक्ति सी होने लगी थी, रात को उसके पास जाने से कतराने लगी. दिन में बाहर से सब ठीक लगता. कभी-कभी मित्रगण सपत्नीक आते तो उसकी उदासी कुछ कम हो जाती. मगर एक दिन आशीष के नजदीकी मित्र सुबोध ने उसकी मनोदशा को ताड़ लिया और पत्नी के सामने ही उसे विश्वास में लेकर उसके मन की बात जान ली.
उसके बाद सुबोध जब-तब उसे कुरेदकर सहानुभूति जताता रहता. धीरे-धीरे रचना उसकी ओर आकर्षित होने लगी और आशीष से विकर्षण बढ़ता गया. उनके प्यार को तो जैसे दीमक चाट गई थी.आशीष रचना के इस व्यवहार से दुखी रहने लगा. वो स्थिति सुधारने के लिए हर संभव प्रयास करता मगर प्रेम इज़हार के समय रचना अपनी माँग प्रस्तुत कर देती और मुँह फेरकर सो जाती. उनका सम्बन्ध अब नाम मात्र को ही रह गया था, मगर आशीष ने इसकी भनक अपने माँ-पिता को नहीं लगने दी.
रचना ने अपना सारा ध्यान अब बिटिया पर ही केन्द्रित कर लिया. जिस तरह आशीष उसकी बात सुनी-अनसुनी कर देता था, वो भी अब सास की कही हर बात की अवहेलना करने लगी. सास उसके व्यवहार की शिकायत बेटे से करती तो वो इस तरफ से भी कान बंद करके चुप्पी ओढ़ लेता. अब वो अक्सर रात को देर से आने लगा था. जब घर पहुँचता तब तक रचना बिटिया के साथ सो चुकी होती. समय गुजरता रहा और उनके बीच की खाई बढ़ती ही चली गई.
आर्ची आठ साल की हो चुकी थी और प्रायमरी स्कूल की दूसरी कक्षा में पहुँच गई थी.आशीष का मित्रों से मिलना अब घर पर ही कभी कभी होता था, मुरुड बीच पर भी अब उसका मन जाने को तैयार नहीं होता था. हाँ, सुबोध का उसके घर आना जाना बढ़ गया था. वो उसके पड़ोस में ही रहता था और हर सप्ताह पत्नी सहित आ जाया करता था.आशीष के माँ-पिता अक्सर अपने वरिष्ठ मित्रों के साथ घूमने चले जाते थे.
ऐसे ही एक बार वे ७-८ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. आशीष दिन में केवल छुट्टी के दिन ही घर पर रहता था. बाकी दिन देर रात आना ही उसका नियम बन गया था. एक दिन वो तबियत भारी होने से दिन में ही अपना कामकाज कर्मचारियों को समझाकर आराम करने के विचार से घर पहुँचा. रचना को सूचित करना उसने आवश्यक नहीं समझा. मुख्य द्वार की चाबी सबके पास रहती थी,
उसने लॉक खोलकर जैसे ही अन्दर प्रवेश किया, बैठक का दृश्य देखकर जैसे उसे लकवा मार गया. रचना और सुबोध सोफे पर ही आलिंगन-बद्ध होकर प्रेमालाप में व्यस्त थे. आशीष पर नज़र पड़ते ही सुबोध उठा और सर झुकाए हुए तीर की भांति द्वार से बाहर हो गया.उसके जाते ही आशीष गुस्से के मारे दहाड़कर बोला-
'धोखेबाज़ औरत, मुझे तुमसे ऐसी नीच हरकत की उम्मीद नहीं थी. मुझसे इसी कारण दूर भागने लगी थी न...अच्छा हुआ तुम्हारी असलियत सामने आ गई...अब तुम्हें मेरे घर में रहने का कोई अधिकार नहीं है, तुम जहाँ चाहो जा सकती हो...मैं तुम्हें आज़ाद करता हूँ ."
रचना हक्की बक्की थर-थर काँप रही थी कि यह क्या हो गया... वो समझ नहीं पा रही थी कि उससे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई...वो रो-रो कर आशीष को सफाई देने लगी कि सुबोध पहली बार ही अकेले में आया था और बातों में वो न जाने कैसे बहक गई. उनका सम्बन्ध बोलचाल तक ही सीमित था. वो उसे माफ़ कर दे...फिर कभी उसके किसी मित्र के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखेगी.
मगर आशीष नहीं पिघला और सख्त लहजे में कहा -
“हमारा रिश्ता समाप्त हो चुका है, अपने पिता से कहो वो तुम्हें आकर ले जाए...”
रचना चली गई...आशीष की दुनिया वीरान हो चुकी थी...उसका प्यार और वफ़ा से विश्वास उठ गया था...माँ पिता के आने पर यही बताया कि वो घर की परेशानी के कारण चली गई है. कुछ दिन गुजरने पर माँ ने उसे ले आने के लिए कहा तो उसने जवाब दिया कि अब वो यहाँ कभी नहीं आएगी.
रचना को गए आज दस साल बीत चुके हैं. तलाक की पहल दोनों में से किसी ने नहीं की. आशीष ने जैसे संन्यास ओढ़ लिया था. घर में माँ-पिता की किसी बात का जवाब नहीं देता और हर सप्ताह मुरुड-बीच पर मन की शान्ति की तलाश में चला आता है मगर अब उसे सुबह का नज़ारा नहीं लुभाता. सारे रंग बुझे-बुझे लगते हैं. वो प्रतिपल खुद से ही सवाल करता रहता है कि उसने भी तो प्यार किया था... आखिर उससे भूल कहाँ हुई...?और आज आर्ची ने उसे उसकी भूल का अहसास दिला दिया था. फिर भी तय नहीं कर पा रहा कि उसके सवालों का क्या जवाब दे... कभी पितृत्व मोम होने लगता है तो रचना की बेवफाई याद करके मन शिला बन जाता है. बेटी का प्यार उसे अपनी भूल स्वीकार कर आगे बढ़ने और नया जीवन आरम्भ करने को कहता है तो अंतर का दम्भी पुरुष वापस उसे पीछे खींच लेता है. आखिर जाए तो कहाँ जाए...?
समाप्त
प्रिय पाठक
आप कहानी के अंत तक पहुंचे, इसके लिए दिल से धन्यवाद
कृपया अपनी प्रतिक्रिया भी अवश्य दें
🙏😊
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
maee maah kee jaanalewaa garmee kee prabhaat welaa men murud beech (mahaaraashtr) par sthit hotal “diwaain hom ste” ke andaroonee wishaal dvaar par khadaa aasheesh apane qadamon men lotate anant saagar kee athaah gaharaaee men khoyaa huaa thaa ki achaanak usakee maun saadhanaa ko bhang karatee huee qadamon kee aahat usake nikat hee aakar thahar gaee palatakar dekhaa to ek 17- 18 warsheey pyaaree see kishor way kee baalikaa mobaail haath men lie usee ko nihaar rahee thee
aasheesh ke palatate hee usane apanaa mobaail kaa kaimaraa ऑn karake use dete hue anurodh bhare svar men kahaa -
“ankal, is samudr ke saath meree kuch tasveeren leejiye n” aur binaa aasheesh ke uttar kee prateekshaa kiye phudakatee huee chikane pattharon kee seeढ़ee se neeche utarane lagee use aage bढ़te dekh aasheesh kaa kalejaa kaanp uthaa, ghabaraakar bolaa-
“are bitiyaa bas! ab aur neeche mat jaao, main yaheen tumhaare manapasand chitr kheench loongaa”
“dariye mat ankal, main bahut achchee tairaak hoon aur waise bhee yahaan paanee gaharaa naheen hogaa kuch hee der men laharen waapas chalee jaaengee aur ret dikhane lagegee magar aap kahate hain to yaheen khadee ho jaatee hoon” baalikaa ne muskuraate hue kahaa
aasheesh ne usake wibhinn mudraaon men kaee chitr kheenche aur oopar aane kaa aagrah kiyaa wo usakee baatacheet ke tareeke se bahut prabhaawit huaa thaa pyaar se poochaa-
“tum kahaan rahatee ho bitiyaa aur yahaan kisake saath aaee ho?”
“main munbaee men boreewalee west ke ek flait men rahatee hoon ankal aur apanee kolej kee saheliyon ke saath yahaan aaee hoon”
“dhany hain tumhaare maan-pitaa betee, bahut achche sanskaar die hain tumhen”
“sirph maan kahiye ankal, mere pitaa hamaare saath naheen rahate” ekadam bebaakee se kishoree ne uttar diyaa
“kyon bhalaa?”
“aapake is kyon kaa jawaab denaa mere lie itanaa aasaan naheen ankal aur agar aapako sunanaa hee ho to pahale mere anaginat kyon ke jawaab dene hongeagar aap isake lie taiyaar hain aur aapake paas kuch samay hai to chalie andar baithate hain, waheen charchaa karenge meree saheliyaan jaldee naheen uthane waaleen main to raat men alaarm lagaakar soee thee taaki samudr ke saath sunaharee bhor kaa nazaaraa kaimare men utaar sakoon achchaa huaa yahaan aap mil gae waranaa selphee se hee santosh karanaa padataa”
“main phursat men hee hoon betee, is saagar kaa kinaaraa hee mujhe yahaan kheenchakar laataa hai, aur akele hee chalaa aataa hoon, chalo chalate hain”
kuch hee der men we donon naashte ke lie rakhee huee ek tebal par aamane saamane the aasheesh us baalikaa ke sawaal sunane ko utsuk thaa baithate hee baat chedee-
“haan to bitiyaa, tum kyaa poochanaa chaahatee thee?”
“pratham to yah bataaie ankal ki aap stree ko use kaanoonee taur par mile wisheshaadhikaaron ke alaawaa purush ke samaan adhikaar milane kaa kahaan tak samarthan karate hain?”
aasheesh pahale to baalikaa ke munh se itanaa paripakv sawaal sunakar hairaanee se usakaa munh taakane lagaa, phir jaldee hee sanbhalakar bolaa-
“agar adhikaar maryaadaa kee seemaa rekhaa ke andar hon to pooree tarah samarthan karataa hoon betee, magar tumhaaree umr abhee is tarah ke sawaalon se ulajhane kee to naheen”
“aap sahee kahate hain ankal, magar mujhe paristhitiyon ne samay se pahale paripakv banaa diyaa hai meree saheliyon ke jawaab mujhe santusht naheen kar paate aur aapakee baaton men mujhe apanepan kee jhalak dikhaaee dee to aaj aapake saamane man kee baaten kah rahee hoon ho sakataa hai aap purush hone ke naate meree jijnaasaa shaant kar den”
“bilakul ho sakataa hai betee, bephikr hokar apanee samasyaa bataao”
“jee ankal, aap yah bataaie ki agar shaadee ke baad stree ko apane pati se we adhikaar n milen to use kyaa karanaa chaahie?”
“yah to samay aur paristhitiyon par nirbhar hai betee, naaree to shakti svaroopaa hai, use paristhitiyon ko apane paksh men karane ke prayaas karane chaahiyen”
“aur agar sasuraal men paristhitiyaan anukool n ho paaen yaanee saas-bahoo men harasamay tanaatanee chalatee rahatee ho to pati kee bhoomikaa kyaa honee chaahie?”
“pati kee sthiti to shaadee hote hee chakkee ke do paaton men pisate hue anaaj jaisee ho jaatee hai betee wo bechaaraa kar hee kyaa sakataa hai, siwaay chup rahane ke”
“kyon naheen kar sakataa ankal, abhee aapane stree-purush ke samaan adhikaaron kaa samarthan kiyaa haiphir agar kisee bhee upaay se baat n bane to griih kalah se bachane ke lie kyaa use apanee griihasthee alag naheen kar lenee chaahie?”
“aur agar ladakaa maan-pitaa kaa ikalautaa betaa huaa to?”
“to kyaa? ladakee bhee apane maan-pitaa kee ikalautee santaan ho sakatee haiagar wo shaadee ke baad pati ke saath griihasthee basaane ke sapane sanjoe apanaa pariwaar chodakar aa sakatee hai to ladakaa kyon naheen?"
"magar isase to rishton kee reeढ़ hee toot jaaegee betee bhaarateey sanskriiti aur paramparaaon kee pahachaan hee kho jaaegee"
"aap rishton kee reeढ़ tootane kee baat kah rahe hain ankal, par yadi naaree ko rooढ़iyon kee ragad se mukt naheen kiyaa gayaa to rishte hee rasaatal ko n chale jaaenge?aur paramparaaon kee neenv bhee to naaree ke adhikaaron ko kuchalane ke lie nar-samaaj dvaaraa hee rakhee gaee thee nab wo zamaanaa naheen jab bade pariwaar hote the aur ladakiyon ko shikshaa se adhik ghareloo kaamakaaj men daksh honaa aawashyak hotaa thaa aakhir aaj bhee kyon use har sthiti men sasuraal waalon kee prataadanaa sahate rahane ke lie baadhy kiyaa jaataa hai? jab kaanoon ne stree ko itane wisheshaadhikaar die hain ki ginate-ginate hee thak jaaen to purush samaaj usake svaabhaawik samaan adhikaaron kaa aaj bhee hanan karanaa kyon jaaree rakhe hue hai?"
"humm"
"ek sawaal aur -
maan leejiye ankal, agar shaadee ke baad koee patnee lagaataar apane pati ke, usakee baat maanane ke anurodh kee awahelanaa karatee rahe aur maanasik tanaaw kee sthiti men pati any mahilaa kee sahaanubhooti paakar usase prem sambandh sthaapit kar le aur patnee se wimukh hone lage to pataa chalane par usakee patnee ko kyaa karanaa chaahie? yaanee use pati ko dushcharitr karaar dekar apanee zindagee se nishkaasit kar denaa chaahie athawaa maaf karake sanbhalane kaa awasar denaa chaahie?"
"aisaa aksar hotaa rahataa hai betee, agar pati kee kahee gaee baat uchit ho to usakee awahelanaa karane ke kaaran pati ke maanasik tanaaw ke lie pratham driishtayaa patnee hee doshee maanee jaaegee aur agar is sthiti men pati ke kadam bahak jaaen to patnee kaa kartavy use sahaaraa dekar sahee maarg par laanaa aur usakee maang par punah wichaar karake uchit nirnay lenaa chaahie ek chotee see bhool ke lie jeewan se nishkaasit karanaa kadaapi uchit naheen kahaa jaa sakataa"
"bilakul sahee kahaa aapane ankal aur agar yahee bhool unheen paristhitiyon men patnee se ho jaae to pati kaa bhee wahee kartavy ho jaataa hai yaa usake lie alag maapadand honge? sochakar bataaie ankal, kyaa yah prasang naaree ke samaan adhikaaron se alag hai?
jawaab deejiye ankal, jawaab deejiye
magar main jaanatee hoon aap jawaab naheen de paaenge aakhir aap bhee to purush hee hain nkshamaa keejiye, main shaayad kuch adhik hee bol gaee hoon”
“naheen betee, magar in sawaalon kaa mere us sawaal se kyaa sambandh hai?”
“hai ankal bilakul haimeree maan se ek aisee bhool ho gaee thee jise aurat ke lie bahut badee aur purush ke lie yah samaaj maamoolee maanataa hai jab maan ke alag griihasthee basaane ke lie baar-baar anunay winay aur fariyaad ke baawajood pitaajee ne use sasuraal roopee damaghontoo pinjare se mukt karane kaa koee prayaas naheen kiyaa to ek any purush kee sahaanubhooti paakar wo usakee taraph aakarshit ho gaee theepataa chalane par mere pitaa ne use maaf naheen kiyaa aur dushcharitr karaar dekar ghar se nishkaasit kar diyaa unhonne yah naheen sochaa ki us bhool ke mool men unakee hee galatee hai"
"phir to unakaa talaak ho gayaa hogaa?”
“naheen, isake lie kisee ne pahal naheen kee das saal beet chuke hain maan kahatee hai wo chaahatee to harjaa-kharchaa wasool kar sakatee thee magar usane to pyaar kiyaa thaashaudaa kaise karatee?”
“phir gujar-basar kis tarah ho rahee hai beteekyaa tumhaaree maan naukaree karatee hai?”
“jee ankal, wo ek maadhyamik skool men shikshikaa hai shaadee ke baad pitaajee kee shart ke anusaar usane naukaree chod dee theeek baat aur, wo apane maan-pitaa se alag rahate hue bhee paroksh roop se unakee dekharekh karake apanaa farz bakhoobee nibhaa rahee hai"
“wo dekhiye ankal, meree saheliyaan taiyaar hokar aa gaeen naashtaa lag chukaa hai, aap le leejiye, hamen bhee naashtaa karake yah hotal chodanaa hogaa, meraa mobaail nanbar not kar leejiye kabhee mere sawaalon ke jawaab mil jaaen to sanpark kar leejiyegaameraa naam aarchee hai” kahate hue baalikaa apanee saheliyon kee taraph bढ़ gaee
aarchee aasheesh ko baalikaa kee baaton se kuch anumaan to ho gayaa thaa ki yah kahaanee usee se sanbandhit haiab usakaa naam sunate hee use pooraa wishvaas ho gayaa ki aarchee usee kee betee hai achaanak usakaa mastishk sunn hone lagaa aur wo naashtaa bhoolakar apanaa sar pakadakar waapas waheen baith gayaa usakee aankhen mundee jaa rahee theen aur kahaanee 10 saal pahale kee samay rekhaa par pahunch gaee thee
nawee munbaee ke panawel shahar men rahane waalaa aasheesh apane maan-pitaa kee ikalautee santaan thaa kaalej se bee tek kee pढ़aaee pooree hone ke baad wo kisee achchee kanpanee men jॉb karanaa chaahataa thaa magar usake pitaa chaahate the ki wo usake wyawasaay men sahaayataa kare aakhir aage peeche yah sab use hee sanbhaalanaa hai
aasheesh apane pitaa kee ichchaa ke wipareet naheen jaa sakataa thaa atah apanaa kairiyar tyaagakar pitaa ke wyawasaay se jud gayaa kolej chootate hee usake saare mitr choot gae, wo mauj-mastee, aazaadee sab bhool gayaa, bas naheen bhoolaa to murud kaa saagar-kinaaraa jo usake dil-dimaag men gahare rachaa-basaa huaa thaa
wo ganbheer prakriiti kaa yuwak thaa jahaan usake sahapaathee sair-sapaate kaa kaaryakram apanee garl-phrends ke saath banaate the waheen aasheesh apane chunindaa mitron ke saath 15-20 dinon ke antaraal se murud-beech par hee jaanaa pasand karataa thaa aur usake rukane kaa manapasand sthaan “diwaain hom ste” hotal hee huaa karataa thaawyawasaay men aane ke baad usane sheeghr hee apanee ruchi ke kuch mitr banaa lie aur murud-beech par jaane kaa kram jaaree rahaa teen-chaar mitr milakar subah nikal padate, teen ghante safar ke baad bhojan karake shaam tak beech par laharon ke saath athakheliyaan karate aur ek raat hotal men bitaakar agale din waapas ho lete the
prakriiti-premee aasheesh ko agale din kee subah kaa besabree se intazaar rahataa aur wo munh-andhere uthakar mitron ko sotaa chodakar neeche aa jaataa aur bhojan parisar men sthit bade se get ke paas kursee par baithakar raat men jvaar chढ़e saagar kaa subah kee sukhad bayaar men charanon men lotataa huaa roop mugdh hokar aatmasaat karataa rahataa shaam ke samay hotal se kuch door jo laharen chanchalataa kee chunaree oढ़kar uchalakood machaateen we subah kee welaa men punah priy-darshan ke intazaar men shaant aur ganbheer roop dhaaran kar letee theen
yah nazaaraa use bahut priy thaa jab tak mitragan uthakar naashte ke lie neeche pahunchate, wo waheen baithaa rahataa thaaaisee hee us murud-beech kee ek suhaanee subah ko aasheesh apane mitron ko hotal ke kamare men sotaa chodakar neeche aakar saagar se milane us get ke paas pahunchaa to saamane hee use ek yuwatee dhalaan se kuch neeche utarakar selphee letee huee dikhaaee dee
usakee pindaliyaan ghutanon se kuch neeche tak paanee men doobee huee theen wo gahare neele rang ke naait-soot men ek jalaparee jaisee prateet ho rahee thee aasheesh khade hokar mugdh-man us roopasee ko nihaarane lagaaaasheesh prakriiti ke is dohare saundary kaa rasapaan kar hee rahaa thaa ki achaanak yuwatee kaa pair phisalaa yaa wo patthar jisapar wo khadee thee, wo neeche kee taraph girate hue jor se chillaa uthee
hataprabh aasheesh joote utaarakar mobaail waheen patakakar turant daud padaa aur usane kuch neeche utarakar jhukakar apanaa santulan banaate hue yuwatee ko donon baajuon se kasakar pakad liyaa thar-thar kaanpatee yuwatee kee jaan men jaan aaee magar ab aasheesh kee sthiti aisee thee ki wo ghutanon tak paanee men doobee yuwatee ko us dhalaan se oopar kheench naheen paa rahaa thaa adhik jor lagaane par chattaan phisalane kaa dar thaa usane sahaayataa ke lie jor jor se aawaajen lagaaeen magar aasapaas koee n hone se usakee pratidhvani hee waapas sunaaee dee ab wo kyaa karataa usane peeche palatakar chikane pattharon se nirmit dhalaananumaa seeढ़ee ko dekhaa aur yuwatee ko jor se baanhon men bheenchakar peeche kee or khisakate hue chit let gayaa yuwatee usake seene se lagee usake oopar hee padee bhay se kaanp rahee thee
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“bahut bahut dhanyawaad mi”
“aasheeshmeraa naam aasheesh hai mis”
“aap mujhe rachanaa kah sakate hain, aasheesh jee, aaj agar aap wahaan n hote to meraa n jaane kyaa haal hotaa”
“dhanyawaad to ooparawaale ko kahiye rachanaa jee, usake man men kuch to baat hogee jo hamen is tarah milawaayaa aaiye, jab tak hamaare saathee neeche aaen ham wahaan laan men chalate hain”
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sheeghr hee dekhane dikhaane kee aupachaarikataa ke saath sagaaee ho gaee aur shaadee kaa shubh muhoort bhee nikalawaa liyaa gayaa jo chah maheene baad kaa thaa tab tak unhonne har saptaahaant men usee beech par milate rahane kaa ek doosare se waadaa kiyaaaasheesh aur rachanaa ke lie prem riitoo shuroo ho chukee thee saptaah ke paanch din to kaate naheen katate the aur antim do din samay jaise pankh pahan letaa thaa
we aane-jaane ke chand ghanton ke alaawaa saaraa din haathon men haath daale beech par premaalaap men bitaate aur der raat ghar waalon kee hidaayat ke anusaar hotal ke apane-apane kamaron men so jaateunhonne shaadee ke baad haneemoon ke lie bhee aapasee sahamati se murud beech par aanaa tay kiyaa aur aasheesh ne murud ke sabase achche hotal men ek saptaah ke lie kamaraa bhee buk karawaa liyaashamay ne karawat badalee aur chah maheene beetate hee unakaa shubh-wiwaah sanpann ho gayaa is tarah do premee sadaa ke lie ek doosare ke ho gae
shaadee ke kuch maheenon baad hee rachanaa garbhawatee ho gaee aur samay par ek svasth aur sundar baalikaa ko janm diyaa aasheesh to betee paakar phoolaa naheen samaayaa aur un donon ne apane naamon ko milaakar use aarchee naam diyaabachchee ke janm ke saath hee rachanaa kee paariwaarik jawaabadaariyon men wriiddhi hotee gaee aur saath hee naee pareshaanee bhee shuroo ho gaee
usakee saas bahut tunakamijaaj mahilaa thee wo rachanaa kee har gatiwidhi men meen-mekh nikaalanaa aur tokate rahanaa apanaa adhikaar samajhatee thee pahale to rachanaa samay par sab theek hone kee ummeed men chupachaap sahan kar letee thee magar gudiyaa ke janm ke baad usake maanasik shoshan men wriiddhi hotee gaee aur wo us damaghontoo pinjare men band kaidee see chatapataane lagee thee raat men agar wo aasheesh se shikaayat karatee to wo sunee anasunee kar detaa yaa rachanaa ko hee saamanjasy banaae rakhane kee hidaayat detaa rachanaa ab bujhee bujhee see rahane lagee thee usakee baat sunane waalaa koee naheen thaa
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rachanaa ne apanaa saaraa dhyaan ab bitiyaa par hee kendrit kar liyaa jis tarah aasheesh usakee baat sunee-anasunee kar detaa thaa, wo bhee ab saas kee kahee har baat kee awahelanaa karane lagee saas usake wyawahaar kee shikaayat bete se karatee to wo is taraph se bhee kaan band karake chuppee oढ़ letaa ab wo aksar raat ko der se aane lagaa thaa jab ghar pahunchataa tab tak rachanaa bitiyaa ke saath so chukee hotee samay gujarataa rahaa aur unake beech kee khaaee bढ़tee hee chalee gaee
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aise hee ek baar we 7-8 dinon ke lie baahar gae hue the aasheesh din men kewal chuttee ke din hee ghar par rahataa thaa baakee din der raat aanaa hee usakaa niyam ban gayaa thaa ek din wo tabiyat bhaaree hone se din men hee apanaa kaamakaaj karmachaariyon ko samajhaakar aaraam karane ke wichaar se ghar pahunchaa rachanaa ko soochit karanaa usane aawashyak naheen samajhaa mukhy dvaar kee chaabee sabake paas rahatee thee,
usane lॉk kholakar jaise hee andar prawesh kiyaa, baithak kaa driishy dekhakar jaise use lakawaa maar gayaa rachanaa aur subodh sophe par hee aalingan-baddh hokar premaalaap men wyast the aasheesh par nazar padate hee subodh uthaa aur sar jhukaae hue teer kee bhaanti dvaar se baahar ho gayaausake jaate hee aasheesh gusse ke maare dahaadakar bolaa-
'dhokhebaaz aurat, mujhe tumase aisee neech harakat kee ummeed naheen thee mujhase isee kaaran door bhaagane lagee thee nachchaa huaa tumhaaree asaliyat saamane aa gaeeab tumhen mere ghar men rahane kaa koee adhikaar naheen hai, tum jahaan chaaho jaa sakatee homain tumhen aazaad karataa hoon "
rachanaa hakkee bakkee thar-thar kaanp rahee thee ki yah kyaa ho gayaa wo samajh naheen paa rahee thee ki usase itanee badee galatee kaise ho gaeewo ro-ro kar aasheesh ko saphaaee dene lagee ki subodh pahalee baar hee akele men aayaa thaa aur baaton men wo n jaane kaise bahak gaee unakaa sambandh bolachaal tak hee seemit thaa wo use maaf kar dephir kabhee usake kisee mitr ke saath koee sambandh naheen rakhegee
magar aasheesh naheen pighalaa aur sakht lahaje men kahaa -
“hamaaraa rishtaa samaapt ho chukaa hai, apane pitaa se kaho wo tumhen aakar le jaae”
rachanaa chalee gaeeaasheesh kee duniyaa weeraan ho chukee theeusakaa pyaar aur wafaa se wishvaas uth gayaa thaamaan pitaa ke aane par yahee bataayaa ki wo ghar kee pareshaanee ke kaaran chalee gaee hai kuch din gujarane par maan ne use le aane ke lie kahaa to usane jawaab diyaa ki ab wo yahaan kabhee naheen aaegee
rachanaa ko gae aaj das saal beet chuke hain talaak kee pahal donon men se kisee ne naheen kee aasheesh ne jaise sannyaas oढ़ liyaa thaa ghar men maan-pitaa kee kisee baat kaa jawaab naheen detaa aur har saptaah murud-beech par man kee shaanti kee talaash men chalaa aataa hai magar ab use subah kaa nazaaraa naheen lubhaataa saare rang bujhe-bujhe lagate hain wo pratipal khud se hee sawaal karataa rahataa hai ki usane bhee to pyaar kiyaa thaa aakhir usase bhool kahaan huee?aur aaj aarchee ne use usakee bhool kaa ahasaas dilaa diyaa thaa phir bhee tay naheen kar paa rahaa ki usake sawaalon kaa kyaa jawaab de kabhee pitriitv mom hone lagataa hai to rachanaa kee bewaphaaee yaad karake man shilaa ban jaataa hai betee kaa pyaar use apanee bhool sveekaar kar aage bढ़ne aur nayaa jeewan aarambh karane ko kahataa hai to antar kaa dambhee purush waapas use peeche kheench letaa hai aakhir jaae to kahaan jaae?
samaapt
priy paathak
aap kahaanee ke ant tak pahunche, isake lie dil se dhanyawaad
kriipayaa apanee pratikriyaa bhee awashy den
🙏😊
kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
मई माह की जानलेवा गर्मी की प्रभात वेला में मुरुड़ बीच (महाराष्ट्र) पर स्थित होटल “डिवाइन होम स्टे” के अंदरूनी विशाल द्वार पर खड़ा आशीष अपने क़दमों में लोटते अनंत सागर की अथाह गहराई में खोया हुआ था कि अचानक उसकी मौन साधना को भंग करती हुई क़दमों की आहट उसके निकट ही आकर ठहर गई. पलटकर देखा तो एक १७- १८ वर्षीय प्यारी सी किशोर वय की बालिका मोबाइल हाथ में लिए उसी को निहार रही थी.
आशीष के पलटते ही उसने अपना मोबाइल का कैमरा ऑन करके उसे देते हुए अनुरोध भरे स्वर में कहा -
“अंकल, इस समुद्र के साथ मेरी कुछ तस्वीरें लीजिये न...” और बिना आशीष के उत्तर की प्रतीक्षा किये फुदकती हुई चिकने पत्थरों की सीढ़ी से नीचे उतरने लगी. उसे आगे बढ़ते देख आशीष का कलेजा काँप उठा, घबराकर बोला-
“अरे बिटिया बस! अब और नीचे मत जाओ, मैं यहीं तुम्हारे मनपसंद चित्र खींच लूँगा.”
“डरिये मत अंकल, मैं बहुत अच्छी तैराक हूँ और वैसे भी यहाँ पानी गहरा नहीं होगा. कुछ ही देर में लहरें वापस चली जाएँगी और रेत दिखने लगेगी. मगर आप कहते हैं तो यहीं खड़ी हो जाती हूँ.” बालिका ने मुस्कुराते हुए कहा
आशीष ने उसके विभिन्न मुद्राओं में कई चित्र खींचे और ऊपर आने का आग्रह किया. वो उसकी बातचीत के तरीके से बहुत प्रभावित हुआ था. प्यार से पूछा-
“तुम कहाँ रहती हो बिटिया और यहाँ किसके साथ आई हो?”
“मैं मुंबई में बोरीवली वेस्ट के एक फ़्लैट में रहती हूँ अंकल और अपनी कोलेज की सहेलियों के साथ यहाँ आई हूँ.”
“धन्य हैं तुम्हारे माँ-पिता बेटी, बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं तुम्हें...”
“सिर्फ माँ कहिये अंकल, मेरे पिता हमारे साथ नहीं रहते.” एकदम बेबाकी से किशोरी ने उत्तर दिया.
“क्यों भला?”
“आपके इस क्यों का जवाब देना मेरे लिए इतना आसान नहीं अंकल और अगर आपको सुनना ही हो तो पहले मेरे अनगिनत क्यों के जवाब देने होंगे...अगर आप इसके लिए तैयार हैं और आपके पास कुछ समय है तो चलिए अन्दर बैठते हैं, वहीँ चर्चा करेंगे... मेरी सहेलियाँ जल्दी नहीं उठने वालीं... मैं तो रात में अलार्म लगाकर सोई थी ताकि समुद्र के साथ सुनहरी भोर का नज़ारा कैमरे में उतार सकूँ. अच्छा हुआ यहाँ आप मिल गए वरना सेल्फी से ही संतोष करना पड़ता.”
“मैं फुर्सत में ही हूँ बेटी, इस सागर का किनारा ही मुझे यहाँ खींचकर लाता है, और अकेले ही चला आता हूँ, चलो चलते हैं.”
कुछ ही देर में वे दोनों नाश्ते के लिए रखी हुई एक टेबल पर आमने सामने थे. आशीष उस बालिका के सवाल सुनने को उत्सुक था बैठते ही बात छेड़ी-
“हाँ तो बिटिया, तुम क्या पूछना चाहती थी?”
“प्रथम तो यह बताइए अंकल कि आप स्त्री को. उसे कानूनी तौर पर मिले विशेषाधिकारों के अलावा पुरुष के समान अधिकार मिलने का कहाँ तक समर्थन करते हैं?”
आशीष पहले तो बालिका के मुँह से इतना परिपक्व सवाल सुनकर हैरानी से उसका मुँह ताकने लगा, फिर जल्दी ही सँभलकर बोला-
“अगर अधिकार मर्यादा की सीमा रेखा के अन्दर हों तो पूरी तरह समर्थन करता हूँ बेटी, मगर तुम्हारी उम्र अभी इस तरह के सवालों से उलझने की तो नहीं...”
“आप सही कहते हैं अंकल, मगर मुझे परिस्थितियों ने समय से पहले परिपक्व बना दिया है. मेरी सहेलियों के जवाब मुझे संतुष्ट नहीं कर पाते और आपकी बातों में मुझे अपनेपन की झलक दिखाई दी तो आज आपके सामने मन की बातें कह रही हूँ. हो सकता है आप पुरुष होने के नाते मेरी जिज्ञासा शांत कर दें.”
“बिलकुल हो सकता है बेटी, बेफिक्र होकर अपनी समस्या बताओ.”
“जी अंकल, आप यह बताइए कि अगर शादी के बाद स्त्री को अपने पति से वे अधिकार न मिलें तो उसे क्या करना चाहिए?”
“यह तो समय और परिस्थितियों पर निर्भर है बेटी, नारी तो शक्ति स्वरूपा है, उसे परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के प्रयास करने चाहियें.”
“और अगर ससुराल में परिस्थितियाँ अनुकूल न हो पाएँ यानी सास-बहू में हरसमय तनातनी चलती रहती हो तो पति की भूमिका क्या होनी चाहिए?”
“पति की स्थिति तो शादी होते ही चक्की के दो पाटों में पिसते हुए अनाज जैसी हो जाती है बेटी... वो बेचारा कर ही क्या सकता है, सिवाय चुप रहने के...”
“क्यों नहीं कर सकता अंकल, अभी आपने स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का समर्थन किया है...फिर अगर किसी भी उपाय से बात न बने तो गृह कलह से बचने के लिए क्या उसे अपनी गृहस्थी अलग नहीं कर लेनी चाहिए?”
“और अगर लड़का माँ-पिता का इकलौता बेटा हुआ तो...?”
“तो क्या? लड़की भी अपने माँ-पिता की इकलौती संतान हो सकती है...अगर वो शादी के बाद पति के साथ गृहस्थी बसाने के सपने सँजोए अपना परिवार छोड़कर आ सकती है तो लड़का क्यों नहीं...?"
"मगर इससे तो रिश्तों की रीढ़ ही टूट जाएगी बेटी... भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की पहचान ही खो जाएगी."
"आप रिश्तों की रीढ़ टूटने की बात कह रहे हैं अंकल, पर यदि नारी को रूढ़ियों की रगड़ से मुक्त नहीं किया गया तो रिश्ते ही रसातल को न चले जाएँगे...?और परम्पराओं की नींव भी तो नारी के अधिकारों को कुचलने के लिए नर-समाज द्वारा ही रखी गई थी न...अब वो ज़माना नहीं जब बड़े परिवार होते थे और लड़कियों को शिक्षा से अधिक घरेलू कामकाज में दक्ष होना आवश्यक होता था. आखिर आज भी क्यों उसे हर स्थिति में ससुराल वालों की प्रताड़ना सहते रहने के लिए बाध्य किया जाता है? जब कानून ने स्त्री को इतने विशेषाधिकार दिए हैं कि गिनते-गिनते ही थक जाएँ तो पुरुष समाज उसके स्वाभाविक समान अधिकारों का आज भी हनन करना क्यों जारी रखे हुए है?"
"हुम्म..."
"एक सवाल और -
मान लीजिये अंकल, अगर शादी के बाद कोई पत्नी लगातार अपने पति के, उसकी बात मानने के अनुरोध की अवहेलना करती रहे और मानसिक तनाव की स्थिति में पति अन्य महिला की सहानुभूति पाकर उससे प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर ले और पत्नी से विमुख होने लगे तो पता चलने पर उसकी पत्नी को क्या करना चाहिए? यानी उसे पति को दुश्चरित्र करार देकर अपनी ज़िन्दगी से निष्कासित कर देना चाहिए अथवा माफ़ करके संभलने का अवसर देना चाहिए?"
"ऐसा अक्सर होता रहता है बेटी, अगर पति की कही गई बात उचित हो तो उसकी अवहेलना करने के कारण पति के मानसिक तनाव के लिए प्रथम दृष्टया पत्नी ही दोषी मानी जाएगी. और अगर इस स्थिति में पति के कदम बहक जाएँ तो पत्नी का कर्तव्य उसे सहारा देकर सही मार्ग पर लाना और उसकी माँग पर पुनः विचार करके उचित निर्णय लेना चाहिए. एक छोटी सी भूल के लिए जीवन से निष्कासित करना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता..."
"बिलकुल सही कहा आपने अंकल और अगर यही भूल उन्हीं परिस्थितियों में पत्नी से हो जाए तो पति का भी वही कर्तव्य हो जाता है या उसके लिए अलग मापदंड होंगे? सोचकर बताइए अंकल, क्या यह प्रसंग नारी के समान अधिकारों से अलग है?
जवाब दीजिये अंकल, जवाब दीजिये...
मगर मैं जानती हूँ आप जवाब नहीं दे पाएँगे आखिर आप भी तो पुरुष ही हैं न...क्षमा कीजिये, मैं शायद कुछ अधिक ही बोल गई हूँ...”
“नहीं बेटी, मगर इन सवालों का मेरे उस सवाल से क्या सम्बन्ध है?.”
“है अंकल बिलकुल है...मेरी माँ से एक ऐसी भूल हो गई थी जिसे औरत के लिए बहुत बड़ी और पुरुष के लिए यह समाज मामूली मानता है... जब माँ के अलग गृहस्थी बसाने के लिए बार-बार अनुनय विनय और फ़रियाद के बावजूद पिताजी ने उसे ससुराल रूपी दमघोंटू पिंजरे से मुक्त करने का कोई प्रयास नहीं किया तो एक अन्य पुरुष की सहानुभूति पाकर वो उसकी तरफ आकर्षित हो गई थी...पता चलने पर मेरे पिता ने उसे माफ़ नहीं किया और दुश्चरित्र करार देकर घर से निष्कासित कर दिया. उन्होंने यह नहीं सोचा कि उस भूल के मूल में उनकी ही गलती है."
"फिर तो उनका तलाक हो गया होगा?”
“नहीं, इसके लिए किसी ने पहल नहीं की. दस साल बीत चुके हैं. माँ कहती है वो चाहती तो हर्जा-खर्चा वसूल कर सकती थी मगर उसने तो प्यार किया था...सौदा कैसे करती?”
“फिर गुजर-बसर किस तरह हो रही है बेटी...क्या तुम्हारी माँ नौकरी करती है?”
“जी अंकल, वो एक माध्यमिक स्कूल में शिक्षिका है. शादी के बाद पिताजी की शर्त के अनुसार उसने नौकरी छोड़ दी थी...एक बात और, वो अपने माँ-पिता से अलग रहते हुए भी परोक्ष रूप से उनकी देखरेख करके अपना फ़र्ज़ बखूबी निभा रही है..."
“वो देखिये अंकल, मेरी सहेलियाँ तैयार होकर आ गईं. नाश्ता लग चुका है, आप ले लीजिये, हमें भी नाश्ता करके यह होटल छोड़ना होगा, मेरा मोबाइल नंबर नोट कर लीजिये. कभी मेरे सवालों के जवाब मिल जाएँ तो संपर्क कर लीजियेगा...मेरा नाम आर्ची है...” कहते हुए बालिका अपनी सहेलियों की तरफ बढ़ गई.
आर्ची... आशीष को बालिका की बातों से कुछ अनुमान तो हो गया था कि यह कहानी उसी से संबंधित है...अब उसका नाम सुनते ही उसे पूरा विश्वास हो गया कि आर्ची उसी की बेटी है. अचानक उसका मस्तिष्क सुन्न होने लगा और वो नाश्ता भूलकर अपना सर पकड़कर वापस वहीं बैठ गया. उसकी आँखें मुंदी जा रही थीं और कहानी १० साल पहले की समय रेखा पर पहुँच गई थी.
नवी मुंबई के पनवेल शहर में रहने वाला आशीष अपने माँ-पिता की इकलौती संतान था. कालेज से बी. टेक की पढ़ाई पूरी होने के बाद वो किसी अच्छी कंपनी में जॉब करना चाहता था मगर उसके पिता चाहते थे कि वो उसके व्यवसाय में सहायता करे. आखिर आगे पीछे यह सब उसे ही सँभालना है.
आशीष अपने पिता की इच्छा के विपरीत नहीं जा सकता था अतः अपना कैरियर त्यागकर पिता के व्यवसाय से जुड़ गया. कोलेज छूटते ही उसके सारे मित्र छूट गए, वो मौज-मस्ती, आज़ादी सब भूल गया, बस नहीं भूला तो मुरुड़ का सागर-किनारा जो उसके दिल-दिमाग में गहरे रचा-बसा हुआ था.
वो गंभीर प्रकृति का युवक था. जहाँ उसके सहपाठी सैर-सपाटे का कार्यक्रम अपनी गर्ल-फ्रेंड्स के साथ बनाते थे वहीं आशीष अपने चुनिन्दा मित्रों के साथ १५-२० दिनों के अंतराल से मुरुड़-बीच पर ही जाना पसंद करता था और उसके रुकने का मनपसंद स्थान “डिवाइन होम स्टे” होटल ही हुआ करता था.व्यवसाय में आने के बाद उसने शीघ्र ही अपनी रुचि के कुछ मित्र बना लिए और मुरुड़-बीच पर जाने का क्रम जारी रहा. तीन-चार मित्र मिलकर सुबह निकल पड़ते, तीन घंटे सफ़र के बाद भोजन करके शाम तक बीच पर लहरों के साथ अठखेलियाँ करते और एक रात होटल में बिताकर अगले दिन वापस हो लेते थे.
प्रकृति-प्रेमी आशीष को अगले दिन की सुबह का बेसब्री से इंतज़ार रहता और वो मुँह-अँधेरे उठकर मित्रों को सोता छोड़कर नीचे आ जाता और भोजन परिसर में स्थित बड़े से गेट के पास कुर्सी पर बैठकर रात में ज्वार चढ़े सागर का सुबह की सुखद बयार में चरणों में लोटता हुआ रूप मुग्ध होकर आत्मसात करता रहता. शाम के समय होटल से कुछ दूर जो लहरें चंचलता की चुनरी ओढ़कर उछलकूद मचातीं वे सुबह की वेला में पुनः प्रिय-दर्शन के इंतज़ार में शांत और गंभीर रूप धारण कर लेती थीं.
यह नज़ारा उसे बहुत प्रिय था. जब तक मित्रगण उठकर नाश्ते के लिए नीचे पहुँचते, वो वहीं बैठा रहता था.ऐसी ही उस मुरुड़-बीच की एक सुहानी सुबह को आशीष अपने मित्रों को होटल के कमरे में सोता छोड़कर नीचे आकर सागर से मिलने उस गेट के पास पहुँचा तो सामने ही उसे एक युवती ढलान से कुछ नीचे उतरकर सेल्फी लेती हुई दिखाई दी.
उसकी पिंडलियाँ घुटनों से कुछ नीचे तक पानी में डूबी हुई थीं. वो गहरे नीले रंग के नाइट-सूट में एक जलपरी जैसी प्रतीत हो रही थी. आशीष खड़े होकर मुग्ध-मन उस रूपसी को निहारने लगा.आशीष प्रकृति के इस दोहरे सौंदर्य का रसपान कर ही रहा था कि अचानक युवती का पैर फिसला या वो पत्थर जिसपर वो खड़ी थी, वो नीचे की तरफ गिरते हुए जोर से चिल्ला उठी.
हतप्रभ आशीष जूते उतारकर मोबाइल वहीं पटककर तुरंत दौड़ पड़ा और उसने कुछ नीचे उतरकर झुककर अपना संतुलन बनाते हुए युवती को दोनों बाजुओं से कसकर पकड़ लिया. थर-थर काँपती युवती की जान में जान आई. मगर अब आशीष की स्थिति ऐसी थी कि वो घुटनों तक पानी में डूबी युवती को उस ढलान से ऊपर खींच नहीं पा रहा था. अधिक जोर लगाने पर चट्टान फिसलने का डर था. उसने सहायता के लिए जोर जोर से आवाजें लगाईं मगर आसपास कोई न होने से उसकी प्रतिध्वनि ही वापस सुनाई दी. अब वो क्या करता. उसने पीछे पलटकर चिकने पत्थरों से निर्मित ढलाननुमा सीढ़ी को देखा और युवती को जोर से बाँहों में भींचकर पीछे की ओर खिसकते हुए चित लेट गया. युवती उसके सीने से लगी उसके ऊपर ही पड़ी भय से काँप रही थी.
अब वे खतरे से बाहर आ गए थे. आशीष ने उसने युवती के हाथ में मोबाइल देखकर कहा-“प्लीज़ आप रिलेक्स हो जाइये और होटल मैनेजर को काल कीजिये मेरा मोबाइल ऊपर दूर पड़ा है.”युवती ने अपनी बढ़ी हुई धडकन पर काबू पाकर मैनेजर को काल करके अपनी स्थिति बयान कर दी.कुछ ही पलों में सिक्योरिटी के जवानों सहित मैनेजर भी वहाँ दौड़ा आया.
भीड़ देखकर कुछ लोग भी एकत्रित हो गए. अजीब नज़ारा था मगर उन्हें सुरक्षित ऊपर खींच लिया गया. दोनों के वस्त्र गीले हो चुके थे. एक दूसरे को देखकर उस स्पर्श का अहसास करके दोनों के होठों पर मुस्कान उभर आई. भीड़ छंटते ही आशीष ने उसे ऊपर जाकर तुरंत वस्त्र बदलने के लिए कहा मगर युवती को अभी भी बेहाल देखकर उसने उसका हाथ पकड़कर सीढियों से ऊपर तक पहुँचाया.
इत्तफाक से दोनों के कमरे एक ही गैलरी में थे. दोनों अपने अपने कमरे की और मुड़ गए.आशीष ने देखा, उसके साथी अभी तक आराम फरमा रहे थे. उसने बेआवाज़ वस्त्र बदले और पुनः नीचे आ गया.युवती के उस स्पर्श के अहसास से उसके होंठ रह रह कर मुस्कुरा उठते थे. और जैसा उसका अनुमान था, वस्त्र बदलकर वो युवती भी नीचे पहुँच गई और आशीष के निकट आकर शर्म से नज़रें नीची किये हुए ही बोली-
“बहुत बहुत धन्यवाद मि...”
“आशीष...मेरा नाम आशीष है मिस...”
“आप मुझे रचना कह सकते हैं, आशीष जी, आज अगर आप वहाँ न होते तो मेरा न जाने क्या हाल होता.”
“धन्यवाद तो ऊपरवाले को कहिये रचना जी, उसके मन में कुछ तो बात होगी जो हमें इस तरह मिलवाया... आइये, जब तक हमारे साथी नीचे आएँ हम वहाँ लान में चलते हैं.”
लॉन में साथ-साथ टहलते हुए ही उनके बीच परिचय से लेकर विचारों का आदान-प्रदान होता रहा. रचना मुंबई के ही बोरीवली वेस्ट में रहती थी और एक माध्यमिक स्कूल में शिक्षण कार्य करती थी. वो भी अपने माँ-पिता की इकलौती बेटी थी. यहाँ अपने स्कूल की शिक्षिकाओं के साथ घूमने आई थी. अब घर में उसके लिए वर खोजने की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी.
आशीष के माँ-पिता ने तो उसके लिए सुन्दर सुशिक्षित लड़कियों के चित्रों का ढेर ही लगा दिया था. बस उसकी पसंद और सहमति की ही देर थी. मगर अब एक दूसरे के उस मादक स्पर्श से दोनों के मन में प्रेम का बीज प्रस्फुटित होने लगा था जो उनके तन मन को उद्वेलित किये जा रहा था.
प्रेम के इज़हार के लिए पहल आशीष को ही करनी थी, फिर दुबारा यह अवसर मिले न मिले यह सोचकर आशीष ने बिना किसी भूमिका के रचना के आगे विवाह का प्रस्ताव रख दिया. रचना ने नज़रें झुकाकर मौन स्वीकृति दे दी. आशीष ने उत्साह पूर्वक प्यार से उसका हाथ थामा और दोनों निकट ही एक झूले पर बैठकर भविष्य के सपनों में खो गए.अब घर वालों को सूचित करना ही बाकी था.
एक ही जाति के होने से उनके मिलन में किसी रुकावट की संभावना नहीं के बराबर थी. दोनों एक दूसरे से जुदा होना चाहते तो नहीं थे मगर दोनों के मित्रगण साथ थे, अतः सदा के लिए एक दूसरे का होने के वादे और मोबाइल नंबरों के आदान प्रदान के साथ वे अपने अपने कमरों की ओर बढ़ गए.अब दोनों को घर पहुँचकर अपने अपने परिजनों को अपनी पसंद पर मुहर लगाने के लिए तैयार करने की जल्दी थी.
आशीष की माँ ने उसकी पसंद का स्वागत करते हुए एक ही शर्त रखी कि शादी के बाद रचना नौकरी नहीं करेगी, ताकि पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करना आसान हो. रचना के माँ-पिता के लिए बेटी की प्रसन्नता ही सबसे बढ़कर थी. बस रचना को इतनी पढ़ाई के बाद घर बैठना गवारा नहीं था, लेकिन अपने प्यार की खातिर उसने अपने सपनों की बलि देना भी स्वीकार कर लिया.
शीघ्र ही देखने दिखाने की औपचारिकता के साथ सगाई हो गई और शादी का शुभ मुहूर्त भी निकलवा लिया गया जो छः महीने बाद का था. तब तक उन्होंने हर सप्ताहांत में उसी बीच पर मिलते रहने का एक दूसरे से वादा किया.आशीष और रचना के लिए प्रेम ऋतू शुरू हो चुकी थी. सप्ताह के पाँच दिन तो काटे नहीं कटते थे और अंतिम दो दिन समय जैसे पंख पहन लेता था.
वे आने-जाने के चंद घंटों के अलावा सारा दिन हाथों में हाथ डाले बीच पर प्रेमालाप में बिताते और देर रात घर वालों की हिदायत के अनुसार होटल के अपने-अपने कमरों में सो जाते.उन्होंने शादी के बाद हनीमून के लिए भी आपसी सहमति से मुरुड बीच पर आना तय किया और आशीष ने मुरुड के सबसे अच्छे होटल में एक सप्ताह के लिए कमरा भी बुक करवा लिया.समय ने करवट बदली और छः महीने बीतते ही उनका शुभ-विवाह संपन्न हो गया. इस तरह दो प्रेमी सदा के लिए एक दूसरे के हो गए.
शादी के कुछ महीनों बाद ही रचना गर्भवती हो गई और समय पर एक स्वस्थ और सुन्दर बालिका को जन्म दिया. आशीष तो बेटी पाकर फूला नहीं समाया और उन दोनों ने अपने नामों को मिलाकर उसे आर्ची नाम दिया.बच्ची के जन्म के साथ ही रचना की पारिवारिक जवाबदारियों में वृद्धि होती गई और साथ ही नई परेशानी भी शुरू हो गई.
उसकी सास बहुत तुनकमिजाज महिला थी. वो रचना की हर गतिविधि में मीन-मेख निकालना और टोकते रहना अपना अधिकार समझती थी. पहले तो रचना समय पर सब ठीक होने की उम्मीद में चुपचाप सहन कर लेती थी मगर गुड़िया के जन्म के बाद उसके मानसिक शोषण में वृद्धि होती गई और वो उस दमघोंटू पिंजरे में बंद कैदी सी छटपटाने लगी थी. रात में अगर वो आशीष से शिकायत करती तो वो सुनी अनसुनी कर देता या रचना को ही सामंजस्य बनाए रखने की हिदायत देता. रचना अब बुझी बुझी सी रहने लगी थी. उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था...
एक दिन रात को प्रेमालाप के पलों में रचना ने आशीष को प्यार से अपनी परेशानी बताकर गृहस्थी अलग बसाने की बात कही तो वो भड़क गया और बोला-“यह तुम क्या कह रही हो रचना...मैं अपने माँ-पिता का इकलौता बेटा हूँ, यह नहीं हो सकता. फिर कभी यह बात अपने मुँह से न निकालना..."
रंग में भंग होते ही दोनों मुँह फेरकर सो गए. रचना को अब आशीष से विरक्ति सी होने लगी थी, रात को उसके पास जाने से कतराने लगी. दिन में बाहर से सब ठीक लगता. कभी-कभी मित्रगण सपत्नीक आते तो उसकी उदासी कुछ कम हो जाती. मगर एक दिन आशीष के नजदीकी मित्र सुबोध ने उसकी मनोदशा को ताड़ लिया और पत्नी के सामने ही उसे विश्वास में लेकर उसके मन की बात जान ली.
उसके बाद सुबोध जब-तब उसे कुरेदकर सहानुभूति जताता रहता. धीरे-धीरे रचना उसकी ओर आकर्षित होने लगी और आशीष से विकर्षण बढ़ता गया. उनके प्यार को तो जैसे दीमक चाट गई थी.आशीष रचना के इस व्यवहार से दुखी रहने लगा. वो स्थिति सुधारने के लिए हर संभव प्रयास करता मगर प्रेम इज़हार के समय रचना अपनी माँग प्रस्तुत कर देती और मुँह फेरकर सो जाती. उनका सम्बन्ध अब नाम मात्र को ही रह गया था, मगर आशीष ने इसकी भनक अपने माँ-पिता को नहीं लगने दी.
रचना ने अपना सारा ध्यान अब बिटिया पर ही केन्द्रित कर लिया. जिस तरह आशीष उसकी बात सुनी-अनसुनी कर देता था, वो भी अब सास की कही हर बात की अवहेलना करने लगी. सास उसके व्यवहार की शिकायत बेटे से करती तो वो इस तरफ से भी कान बंद करके चुप्पी ओढ़ लेता. अब वो अक्सर रात को देर से आने लगा था. जब घर पहुँचता तब तक रचना बिटिया के साथ सो चुकी होती. समय गुजरता रहा और उनके बीच की खाई बढ़ती ही चली गई.
आर्ची आठ साल की हो चुकी थी और प्रायमरी स्कूल की दूसरी कक्षा में पहुँच गई थी.आशीष का मित्रों से मिलना अब घर पर ही कभी कभी होता था, मुरुड बीच पर भी अब उसका मन जाने को तैयार नहीं होता था. हाँ, सुबोध का उसके घर आना जाना बढ़ गया था. वो उसके पड़ोस में ही रहता था और हर सप्ताह पत्नी सहित आ जाया करता था.आशीष के माँ-पिता अक्सर अपने वरिष्ठ मित्रों के साथ घूमने चले जाते थे.
ऐसे ही एक बार वे ७-८ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. आशीष दिन में केवल छुट्टी के दिन ही घर पर रहता था. बाकी दिन देर रात आना ही उसका नियम बन गया था. एक दिन वो तबियत भारी होने से दिन में ही अपना कामकाज कर्मचारियों को समझाकर आराम करने के विचार से घर पहुँचा. रचना को सूचित करना उसने आवश्यक नहीं समझा. मुख्य द्वार की चाबी सबके पास रहती थी,
उसने लॉक खोलकर जैसे ही अन्दर प्रवेश किया, बैठक का दृश्य देखकर जैसे उसे लकवा मार गया. रचना और सुबोध सोफे पर ही आलिंगन-बद्ध होकर प्रेमालाप में व्यस्त थे. आशीष पर नज़र पड़ते ही सुबोध उठा और सर झुकाए हुए तीर की भांति द्वार से बाहर हो गया.उसके जाते ही आशीष गुस्से के मारे दहाड़कर बोला-
'धोखेबाज़ औरत, मुझे तुमसे ऐसी नीच हरकत की उम्मीद नहीं थी. मुझसे इसी कारण दूर भागने लगी थी न...अच्छा हुआ तुम्हारी असलियत सामने आ गई...अब तुम्हें मेरे घर में रहने का कोई अधिकार नहीं है, तुम जहाँ चाहो जा सकती हो...मैं तुम्हें आज़ाद करता हूँ ."
रचना हक्की बक्की थर-थर काँप रही थी कि यह क्या हो गया... वो समझ नहीं पा रही थी कि उससे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई...वो रो-रो कर आशीष को सफाई देने लगी कि सुबोध पहली बार ही अकेले में आया था और बातों में वो न जाने कैसे बहक गई. उनका सम्बन्ध बोलचाल तक ही सीमित था. वो उसे माफ़ कर दे...फिर कभी उसके किसी मित्र के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखेगी.
मगर आशीष नहीं पिघला और सख्त लहजे में कहा -
“हमारा रिश्ता समाप्त हो चुका है, अपने पिता से कहो वो तुम्हें आकर ले जाए...”
रचना चली गई...आशीष की दुनिया वीरान हो चुकी थी...उसका प्यार और वफ़ा से विश्वास उठ गया था...माँ पिता के आने पर यही बताया कि वो घर की परेशानी के कारण चली गई है. कुछ दिन गुजरने पर माँ ने उसे ले आने के लिए कहा तो उसने जवाब दिया कि अब वो यहाँ कभी नहीं आएगी.
रचना को गए आज दस साल बीत चुके हैं. तलाक की पहल दोनों में से किसी ने नहीं की. आशीष ने जैसे संन्यास ओढ़ लिया था. घर में माँ-पिता की किसी बात का जवाब नहीं देता और हर सप्ताह मुरुड-बीच पर मन की शान्ति की तलाश में चला आता है मगर अब उसे सुबह का नज़ारा नहीं लुभाता. सारे रंग बुझे-बुझे लगते हैं. वो प्रतिपल खुद से ही सवाल करता रहता है कि उसने भी तो प्यार किया था... आखिर उससे भूल कहाँ हुई...?और आज आर्ची ने उसे उसकी भूल का अहसास दिला दिया था. फिर भी तय नहीं कर पा रहा कि उसके सवालों का क्या जवाब दे... कभी पितृत्व मोम होने लगता है तो रचना की बेवफाई याद करके मन शिला बन जाता है. बेटी का प्यार उसे अपनी भूल स्वीकार कर आगे बढ़ने और नया जीवन आरम्भ करने को कहता है तो अंतर का दम्भी पुरुष वापस उसे पीछे खींच लेता है. आखिर जाए तो कहाँ जाए...?
समाप्त
प्रिय पाठक
आप कहानी के अंत तक पहुंचे, इसके लिए दिल से धन्यवाद
कृपया अपनी प्रतिक्रिया भी अवश्य दें
🙏😊
कल्पना रामानी
नवी मुंबई