हम बच्चे वे फूल हैं ham bachche we phool hain हम बच्चे वे फूल हैं
हम बच्चे वे फूल हैं, जिनसे महके बाग।
इस कलुषित संसार में, अब तक हैं बेदाग।
अब तक हैं बेदाग, गंध का ध्वज फहराएँ
यत्र-तत्र सर्वत्र, ऐक्य का अलख जगाएँ।
प्राणिमात्र को जो कि, बाँटते हैं केवल गम
उन शूलों के साथ, बाग में रहते हैं हम।
बच्चे क्या जानें भला, कपट, द्वेष या बैर।
सबको अपना मानते, दिखे न कोई गैर।
दिखे न कोई गैर, सभी से हिल मिल जाते
करके मीठी बात, हमेशा मन बहलाते।
जैसा दें आकार, ढलें ये लोए कच्चे
कपट द्वेष या बैर, न जानें भोले बच्चे।
बचपन में पाएँ अगर, ज्ञान संग व्यायाम।
सुंदर होगी भोर हर, सुख देगी हर शाम।
सुख देगी हर शाम, उल्लसित होगा तन-मन।
काँटों को दे मात, खिलेगा कुसुमित यौवन।
अनुशासन की नींव, गढ़ेगी काया कंचन।
ज्ञान और व्यायाम, संग बीते यदि बचपन।
ham bachche we phool hain, jinase mahake baag
is kalushit sansaar men, ab tak hain bedaag
ab tak hain bedaag, gandh kaa dhvaj phaharaaen
yatr-tatr sarvatr, aiky kaa alakh jagaaen
praanimaatr ko jo ki, baantate hain kewal gam
un shoolon ke saath, baag men rahate hain ham
bachche kyaa jaanen bhalaa, kapat, dvesh yaa bair
sabako apanaa maanate, dikhe n koee gair
dikhe n koee gair, sabhee se hil mil jaate
karake meethee baat, hameshaa man bahalaate
jaisaa den aakaar, dhalen ye loe kachche
kapat dvesh yaa bair, n jaanen bhole bachche
bachapan men paaen agar, jnaan sang wyaayaam
sundar hogee bhor har, sukh degee har shaam
sukh degee har shaam, ullasit hogaa tan-man
kaanton ko de maat, khilegaa kusumit yauwan
anushaasan kee neenv, gढ़egee kaayaa kanchan
jnaan aur wyaayaam, sang beete yadi bachapan
हम बच्चे वे फूल हैं, जिनसे महके बाग।
इस कलुषित संसार में, अब तक हैं बेदाग।
अब तक हैं बेदाग, गंध का ध्वज फहराएँ
यत्र-तत्र सर्वत्र, ऐक्य का अलख जगाएँ।
प्राणिमात्र को जो कि, बाँटते हैं केवल गम
उन शूलों के साथ, बाग में रहते हैं हम।
बच्चे क्या जानें भला, कपट, द्वेष या बैर।
सबको अपना मानते, दिखे न कोई गैर।
दिखे न कोई गैर, सभी से हिल मिल जाते
करके मीठी बात, हमेशा मन बहलाते।
जैसा दें आकार, ढलें ये लोए कच्चे
कपट द्वेष या बैर, न जानें भोले बच्चे।
बचपन में पाएँ अगर, ज्ञान संग व्यायाम।
सुंदर होगी भोर हर, सुख देगी हर शाम।
सुख देगी हर शाम, उल्लसित होगा तन-मन।
काँटों को दे मात, खिलेगा कुसुमित यौवन।
अनुशासन की नींव, गढ़ेगी काया कंचन।
ज्ञान और व्यायाम, संग बीते यदि बचपन।