कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ४९ / ६३ № 49 of 63 रचना ४९ / ६३
२१ अगस्त २०१९ 21 August 2019 २१ अगस्त २०१९

हम बच्चे वे फूल हैं ham bachche we phool hain हम बच्चे वे फूल हैं

हम बच्चे वे फूल हैं, जिनसे महके बाग।

इस कलुषित संसार में, अब तक हैं बेदाग।

अब तक हैं बेदाग, गंध का ध्वज फहराएँ

यत्र-तत्र सर्वत्र, ऐक्य का अलख जगाएँ।

प्राणिमात्र को जो कि, बाँटते हैं केवल गम

उन शूलों के साथ, बाग में रहते हैं हम।

बच्चे क्या जानें भला, कपट, द्वेष या बैर।

सबको अपना मानते, दिखे न कोई गैर।

दिखे न कोई गैर, सभी से हिल मिल जाते

करके मीठी बात, हमेशा मन बहलाते।

जैसा दें आकार, ढलें ये लोए कच्चे

कपट द्वेष या बैर, न जानें भोले बच्चे।

बचपन में पाएँ अगर, ज्ञान संग व्यायाम।

सुंदर होगी भोर हर, सुख देगी हर शाम।

सुख देगी हर शाम, उल्लसित होगा तन-मन।

काँटों को दे मात, खिलेगा कुसुमित यौवन।

अनुशासन की नींव, गढ़ेगी काया कंचन।

ज्ञान और व्यायाम, संग बीते यदि बचपन।

ham bachche we phool hain, jinase mahake baag

is kalushit sansaar men, ab tak hain bedaag

ab tak hain bedaag, gandh kaa dhvaj phaharaaen

yatr-tatr sarvatr, aiky kaa alakh jagaaen

praanimaatr ko jo ki, baantate hain kewal gam

un shoolon ke saath, baag men rahate hain ham

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bachche kyaa jaanen bhalaa, kapat, dvesh yaa bair

sabako apanaa maanate, dikhe n koee gair

dikhe n koee gair, sabhee se hil mil jaate

karake meethee baat, hameshaa man bahalaate

jaisaa den aakaar, dhalen ye loe kachche

kapat dvesh yaa bair, n jaanen bhole bachche

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bachapan men paaen agar, jnaan sang wyaayaam

sundar hogee bhor har, sukh degee har shaam

sukh degee har shaam, ullasit hogaa tan-man

kaanton ko de maat, khilegaa kusumit yauwan

anushaasan kee neenv, gढ़egee kaayaa kanchan

jnaan aur wyaayaam, sang beete yadi bachapan

हम बच्चे वे फूल हैं, जिनसे महके बाग।

इस कलुषित संसार में, अब तक हैं बेदाग।

अब तक हैं बेदाग, गंध का ध्वज फहराएँ

यत्र-तत्र सर्वत्र, ऐक्य का अलख जगाएँ।

प्राणिमात्र को जो कि, बाँटते हैं केवल गम

उन शूलों के साथ, बाग में रहते हैं हम।

बच्चे क्या जानें भला, कपट, द्वेष या बैर।

सबको अपना मानते, दिखे न कोई गैर।

दिखे न कोई गैर, सभी से हिल मिल जाते

करके मीठी बात, हमेशा मन बहलाते।

जैसा दें आकार, ढलें ये लोए कच्चे

कपट द्वेष या बैर, न जानें भोले बच्चे।

बचपन में पाएँ अगर, ज्ञान संग व्यायाम।

सुंदर होगी भोर हर, सुख देगी हर शाम।

सुख देगी हर शाम, उल्लसित होगा तन-मन।

काँटों को दे मात, खिलेगा कुसुमित यौवन।

अनुशासन की नींव, गढ़ेगी काया कंचन।

ज्ञान और व्यायाम, संग बीते यदि बचपन।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗