कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ७४ / ११४ № 74 of 114 रचना ७४ / ११४
१२ मार्च २०१९ 12 March 2019 १२ मार्च २०१९

परिणय के बाद ( अनूठी प्रेम कहानी ) parinay ke baad ( anoothee prem kahaanee ) परिणय के बाद ( अनूठी प्रेम कहानी )

मीरा ने ज्योंही रसोई का कचरा डालने के लिए घर के पिछवाड़े का द्वार खोला, सामने एक सुदर्शन युवक को उसी तरफ घूरता पाकर सकपका गई. उसने बिना इधर-उधर देखे जल्दी से ढेर पर कचरा डाला और अन्दर जाकर तुरंत द्वार बंद कर दिया. बड़ी मुश्किल से अपनी बढ़ी हुई धड़कनों पर काबू पाया. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो कौन है और उसे इस तरह क्यों घूर रहा था...पहले तो कभी उसे वहाँ नहीं देखा.

मीरा का उस गाँव की निम्न मध्यमवर्गीय कालोनी में छोटा सा दो कमरों का घर था जो तीन तरफ से ईंटों की चारदीवारी से घिरा हुआ था. सामने की तरफ कुछ चौड़ी और पक्की सड़क तथा पिछवाड़े कुछ संकरी और कच्ची गली थी. सामने वाला कमरा कुछ बड़ा और दूसरा छोटा, एक सीध में बने हुए थे. आगे और पीछे का आँगन पक्का था और बगल वाली कच्ची ज़मीन पर नीम का एक बड़ा सा पेड़ लगा हुआ था. छोटे कमरे से बाहर आँगन में निकलते ही एक तरफ क्रमशः रसोईघर और स्नानघर-शौचालय बने हुए थे. आँगन का द्वार कच्ची गली में खुलता था जिसका उपयोग महिलाएँ अक्सर कचरा डालने के लिए ही करती थीं. चूँकि सुबह मुँह-अँधेरे ही सफाई होकर कचरा वहाँ से उठ जाता था तो मीरा जल्दी उठकर सबसे पहले यही काम करती थी ताकि द्वार के सामने गंदगी रह न जाए.

उस कोलोनी के सभी घर लगभग इसी तरह बने हुए थे. पिछवाड़े का द्वार खोलते ही सामने वाले घरों की कतार का पिछवाड़ा नज़र आता था. उसके सामने वाले दो घरों के बीच की खाली ज़मीन पर कोई चारदीवारी नहीं थी बल्कि मालिकों ने अपना अपना हिस्सा कँटीले तारों की बाड़ से घेर रखा था. दाहिनी तरफ वाले घर की स्वामिनी यानी मीना की अम्मा और मीरा की अम्मा के बीच अच्छी दोस्ती थी. वे अक्सर पिछवाड़े से ही एक दूसरी के यहाँ आना जाना करती थीं. मीना, मीरा से कुछ वर्ष बड़ी थी और उसका विवाह हो चुका था, अतः मीरा का उससे अधिक परिचय नहीं था. कभी-कभी वो उनके घर अपनी माँ को बुलाने चली जाती थी तो औपचारिक बातचीत हो जाती थी.

वो युवक मीरा को उसी घर की तरफ वाले हिस्से की बाड़ के अन्दर खड़ा दिखा था. उसने सोचा कोई रिश्तेदार होगा, वो क्यों सर फोड़े...मगर उसका वो घूरना मीरा के मन को विचलित कर रहा था. दूसरे दिन भी जब यही हुआ तो मीरा असमंजस की स्थिति में पहुँच गई. एक महीना पहले ही तो पास के ही शहर में उसकी सगाई हुई है, कहीं वो बिना बात बदनाम न हो जाए, सोचकर उसने अपना कचरा डालने का समय ही बदल दिया. अब वो रात को ही सारे काम निपटाकर कचरा बाहर डाल देती थी. दो दिन ठीक से गुजरे, तीसरे दिन जब वो कचरा डालने लगी तो उसने गली के उस तरफ वाली नाली के रास्ते एक काले साँप को उसी घर में घुसते देखा. मीरा ने घबराकर उन्हें सावधान करने के लिए आगे बढ़कर उस घर का दरवाजा पीटना शुरू कर दिया.

जल्दी ही पिछवाड़े की बत्ती जली और द्वार खुला तो मीरा सामने उसी युवक को देखकर हतप्रभ रह गई और घबराहट में साँप भूलकर उलटे पाँव वापस जाने ही लगी थी कि उस युवक ने उसका रास्ता रोककर पूछा-

“तुम मीरा हो न?”

अपना नाम उस युवक के मुँह से सुनकर मीरा का कलेजा धड़कने लगा. घबराई आवाज़ में उसने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाते हुए प्रति प्रश्न किया-

“मगर मैं तो आपको नहीं जानती, आप कौन हैं, मुझे कैसे जानते हैं और मेरे नाम से आपको क्या लेना?” कहते हुए वो आगे बढ़ने लगी कि युवक ने उसका हाथ पकड़ लिया और चुप रहने का इशारा करते हुए अनुनय के स्वर में कहा-

“चिल्लाना मत मीरा प्लीज़!. मैं श्याम हूँ, तुम्हारा मंगेतर...यहाँ अपनी भाभी को लिवाने आया हूँ. उसी ने मुझे कल तुम्हारे इसी द्वार से बाहर निकलते समय तुम्हारी तरफ इशारा करके यह बात बताई थी. वैसे तो भाभी को लेने भाई साहब ही आते हैं मगर इस बार जानबूझकर मुझे भेजा ताकि मैं अपनी होने वाली दुल्हन को देख सकूँ.”

“हाय राम! आप यहाँ? मुझे जाने दीजिये...कोई देख लेगा.”

“इस अँधेरे में गली में कोई नहीं झाँकेगा...और घर में भी इत्तफाक से अभी कोई नहीं है.” कहते हुए उसने मीरा का हाथ चूम लिया.

“हाय राम! यह आप क्या कर रहे हैं...मुझे जाने दीजिये प्लीज़!”

“यह हाय राम! हाय राम! की रट क्यों लगा रखी है, मेरा नाम श्याम है, हाय श्याम! कहो तो छोड़ दूँगा.”

“हाय राम! मैं आपका नाम कैसे ले सकती हूँ...?”

“फिर वही राम!...मैं कहता हूँ न! जब तक श्याम नहीं कहोगी, जाने न दूँगा.”

“अच्छा श्याम, अब जाने दो, मुझे न देखकर अम्मा बाहर आ जाएगी.” मीरा का हाथ थर-थर काँपने लगा था.

“मीरा, परसों शाम तक मैं वापस चला जाऊँगा... यह तो इत्तफ़ाक ही है कि तुम यहाँ आ गई और मुझ खुशनसीब को यह अवसर मिल गया. कल सुबह तुम अपने उसी समय पर कचरा डालने के लिए बाहर निकलना, मैं तुम्हें वहीँ खड़ा मिलूँगा. तार की बाड़ के पास पत्थर में लिपटा हुआ कागज़ का पुर्जा होगा, तुम उठा लेना और पढ़कर जवाब लिखकर उसी तरीके से वहीँ रख देना. मेरी नज़र इसी तरफ ही लगी रहेगी.” मगर मैं यह पूछना तो भूल ही गया...तुम यहाँ किस प्रयोजन से आई थी...”

“वो... वो...इस तरफ साँप घुसा था...अरे! न जाने कहाँ चला गया होगा.”

“अच्छा वो... उसे तो मैंने ही तुम्हें बुलाने के लिए भेजा था...” कहकर हँसते हुए श्याम ने फिर से उसका हाथ चूम लिया.

मीरा का रोम-रोम पुलक और सिहरन से भर गया. वो हाथ छुड़ाकर तेज़ी से अपने घर में घुस गई.

रात भर वो अपने हाथ को बार बार सहलाती, चूमती और मन ही मन बुदबुदाती रही. “कितना सुदर्शन और सुन्दर है श्याम...मेरा श्याम, और

मैं उसकी मीरा... कितना सुखद अहसास...! काश! वे पल वहीँ ठहर जाते...” नींद तो अब श्याम ने चुरा ही ली थी...सुबह के इंतजार में करवटें बदलती रही.

मुँह-अँधेरे उठकर मीरा ने जल्दी-जल्दी कुछ कचरा इकठ्ठा किया, क्योंकि कल वाला तो वो रात में ही बाहर डाल चुकी थी. जैसे ही द्वार खोला, श्याम को वहीँ खड़े पाया. श्याम ने हवाई चुम्बन उछाला तो उसने शर्माकर पलकें झुका लीं. कनखियों से देखा, श्याम ने पत्थर में लिपटा हुआ कागज़ तार की बाड़ से बाहर सरका दिया और अन्दर चला गया.

मीरा ने इधर-उधर देखा और टहलते हुए वो पत्थर उठाकर वापस अन्दर आकर जल्दी से पत्थर से कागज़ अलग करके छिपा लिया.

अब बारी थी पत्र पढ़ने और उत्तर लिखने की...तो इसके लिए बाथरूम से सुरक्षित स्थान कौनसा हो सकता था भला...?

मीरा कोरा कागज़ और लेखनी हाथ में दबाकर इधर-उधर देखती हुई बाथरूम में बंद हो गई. जल्दी-जल्दी एक ही साँस में पूरा पत्र पढ़ लिया.

“प्यारी मीरा, बहुत बहुत प्यार

मैं जैसा तुम्हें बता चुका हूँ, परसों शाम तक यहाँ से चला जाऊँगा. मगर जाने से पहले एक बार पुनः तुम्हारा हाथ चूमना और जी भरकर सान्निध्य महसूस करना चाहता हूँ. फिर तो विवाह होने तक पत्रों से ही जी बहलाना पड़ेगा. यह गाँव तुम्हारा जाना पहचाना है और तुम बाहर के कार्यों के लिए भी घर से निकलती ही हो, तो कल दिन में कोई ऐसा स्थान तय करके बताना जहाँ हमें पहचाने जाने का कोई डर न हो.

बाकी बातें मिलकर ही होंगी.

सिर्फ तुम्हारा श्याम

यानी अपनी लैला का मजनू”

पत्र पढ़ते-पढ़ते मीरा के पूरे बदन में अजीब सी खुशनुमा खुमारी छाने लगी थी.

उसने उत्तर लिखना शुरू किया-

“मेरे श्याम, यह नहीं हो सकता...जिस गाँव/समाज के बुजुर्ग बच्चों की सगाई भी लड़के-लड़की की अनुपस्थिति में, बिना उनकी स्वीकृति लिए कर देते हों, उस समाज से इतने खुलेपन की उम्मीद तो की नहीं जा सकती और हमारा चोरी छिपे मिलना भी उचित नहीं. मन की मानकर मिलें तो भी तुम इस छोटे से शहर में नए हो तुम्हें तो कोई नहीं पहचान पाएगा मगर मैं कहीं भी आसानी से पहचान ली जाऊँगी. अतः अभी मिलने और प्यार जताने की उम्मीद छोड़ दो. सिर्फ छः महीने की तो बात है, तब तक इंतजार ही करना होगा. यह पत्र भी छिपकर लिख रही हूँ, ताकि किसी का उलाहना न सुनना पड़े.

और हाँ, तुम हमारे प्यार की तुलना लैला-मजनू अथवा अन्य किसी अन्य ऐतिहासिक प्रसिद्ध प्रेमी युगल से कभी मत करना...यह तो तुम जानते ही हो श्याम! कि जिन प्रेम-कहानियों को दुनिया प्यार का प्रतीक मानती चली आई है, उनमें से अधिकांश के नायक-नायिका प्रेम की परिणति यानी परिणय-सूत्र में बंधने से पहले ही जुदाई का ज़हर पीने को मजबूर कर दिए गए. विवाहोपरांत उनका जीवन कैसा होता, यह कोई नहीं बता सकता... लेकिन हमारी कहानी परिणय से शुरू होकर प्रेम की परिणिति तक पहुँचेगी और हमारी प्रेम-कहानी में जुदाई का कोई अध्याय नहीं होगा. यह मीरा अपने श्याम से जुदा होने के लिए नहीं बल्कि एक साथ जीने-मरने के लिए जन्मी है."

सिर्फ तुम्हारी मीरा

छः महीने बीतते देर कहाँ लगती है... मीरा ने श्याम को तो तसल्ली दे दी मगर उसके लिए ये छः महीने छः युगों से कम न थे जैसे-तैसे समय बंजारे ने उसे श्याम से मिलन के पलों तक पहुँचा ही दिया और मीरा श्याम की दिल-दुनिया आबाद करने दुल्हन बनकर ससुराल आ गई.

परिवार में श्याम और उसके अलावा जेठ-जिठानी और उनके दो बच्चे थे. सास-ससुर छः वर्ष पहले ही एक एक करके काल कवलित हो चुके थे. वे किराने के थोक व्यापारी थे. शहर में उनकी छोटी सी दुकान थी, मगर इतनी कमाई हो जाती थी कि गुजर-बसर आसानी से हो सके. जेठानी मीना उसकी पूर्व परिचित थी अतः मीरा को परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में कोई परेशानी नहीं हुई. मीना को वो मायके के रिश्ते से दीदी कहकर ही संबोधित करती थी.

मीरा यह तो जानती थी कि जोड़े ऊपर से ही बनकर आते हैं मगर मिलन का माध्यम तो धरतीवासी ही बनते हैं न... अतः वो जेठ-जिठानी का अपने ऊपर उपकार मानती थी कि उन्होंने बिना दहेज के श्याम के लिए उसे पसंद किया था. मीरा के माँ-पिता भी इतनी आसानी से जाने पहचाने माध्यम से बेटी के लिए बराबरी का वर-घर पाकर निश्चिन्त हो गए थे.

दुकान का लेनदेन और रुपयों का हिसाब जेठजी जयंत रखते थे तो घर खर्च की बागडोर जिठानी मीना के हाथ में थी. शीघ्र ही मीना बड़ी सफाई से मीरा के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाकर घर के सारे कार्य उसके माथे डालती गई.

वो बच्चों में व्यस्त रहने का दिखावा करती और दिन भर मीरा को

आदेश देती रहती. मीरा भी नासमझ तो थी नहीं, कुछ समय प्यार की मार सहती रही मगर जब वो गर्भवती हुई तो उसे कुछ आराम करने की आवश्यकता महसूस होने लगी. उन दिनों मध्यम वर्गीय घरों में घर के सारे काम महिलाओं को ही करने होते थे, कामवालियाँ रखने का न तो रिवाज था न ही हैसियत, अतः एक दिन उसने मीना से कहा कि दीदी मुझसे अब घर के सारे कार्य नहीं होते...आप कुछ सहायता कर दिया करें तो... मेरा शरीर अब कुछ आराम भी चाहता है.

मीरा का इस तरह सामने बोलने से मीना को अपना अपमान महसूस हुआ. तुरंत बोली-

“मीरा मैं भी लम्बे समय से इस घर को सँभाल रही हूँ, अब मुझे आराम करने का पूरा अधिकार है. मैंने तुम्हें मेहनती और समझदार मानकर ही अपनी देवरानी बनाया...क्या मैंने दो बच्चों को जन्म नहीं दिया? घर के कार्य तो तुम्हें करने ही पड़ेंगे.”

मीरा समझ गई कि मीना को देवरानी के रूप में नौकरानी चाहिए थी इसी कारण उसने उसे पसंद किया था...मगर वो भी अपना अधिकार हासिल करना बखूबी जानती थी, इस तरह शोषण कब तक सहती? रात में श्याम से इस बात का जिक्र किया तो श्याम भी चिंतित हो उठा पर घरेलू मामले में सीधे हस्तक्षेप तो कर नहीं सकता था तो मीरा से कह दिया कि उससे जितना बने करके बाकी छोड़ दिया करे. और मीरा ने दूसरे दिन ही बगावत का बिगुल बजा दिया. रसोई के काम आधे अधूरे छोड़कर आराम करने अपने कमरे में चली गई.

मीना को भला यह बात कैसे हज़म होती? बात जयंत के कानों तक पहुँची तो उसने श्याम को बुलाकर ऊँची आवाज़ में कहा-

“देखो श्याम, मीरा का इस तरह का व्यवहार एकदम अनुचित है. उसे यहाँ रहना है तो घर के कार्य करने ही पड़ेंगे. आखिर मीना ने भी बरसों इस घर को सँभाला है, तुम्हारी परवरिश की है...अब उसका आराम करने का पूरा अधिकार है.”

श्याम को भाई की दो टूक बात नहीं सुहाई, मगर वो मजबूर था. अगर गुस्से में अलग होने की बात कहेगा तो भाई साहब उसे खाली हाथ बाहर कर देंगे क्योंकि पिताजी की वसीयत के अनुसार उनके बाद उनकी संपत्ति यानी दुकान और मकान में दोनों भाई बराबरी के साझेदार हैं मगर यदि कोई भाई अलग होना चाहे तो उसे संपत्ति से वंचित होकर खाली हाथ घर छोड़ना पड़ेगा. वे चाहते थे कि दोनों भाई एक दूसरे का सुख दुःख बाँटते हुए आजीवन जुड़े रहें.

श्याम अब जान गया था कि उनकी स्थिति घर में नौकरों जैसी हो चुकी है. आज वो पछता रहा था कि भाई के कहने में आकर उसने अपनी पढ़ाई अधूरी क्यों छोड़ दी...वो स्वयं तो सारे कष्ट झेल लेता मगर मीरा पर अत्याचार होते वो नहीं देख सकता था, आखिर बहुत सोच-विचारकर उसने मीरा को प्रसव होने तक मायके भेजने का मन बनाया और भाई से इसके लिए अनुमति माँगी.

जयंत ने एक कुटिल मुस्कराहट के साथ अपनी स्वीकृति दे दी और श्याम ने मीरा को भारी मन से प्रतिदिन पत्र लिखने और सप्ताहांत में मिलने आते रहने के वादे के साथ उसे मायके भेज दिया.

और यहीं से उनके दर्द की दास्तान शुरू हो गई. मीरा प्रतिदिन नया सवेरा होते ही श्याम को पत्र लिखती और स्वयं डाकखाने जाकर लेटर-बाक्स में डालकर आती और श्याम का उत्तर मिलने का इंतजार करती मगर एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी उसका कोई पत्र न पाकर उसका मन विचलित होने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि श्याम उसे इस तरह क्यों तड़पा रहा है...फिर सोचा, सप्ताहांत में मिलने आएगा तो जी भरकर शिकायत करेगी मगर दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी न श्याम आया न ही उसका पत्र...अब मीरा करे तो क्या करे...तरह-तरह की आशंकाओं से उसका मन बिंधने लगा.

उसकी माँ उसे होने वाले बच्चे का वास्ता देकर उसे खुश रहने की नसीहत देती मगर मीरा की दशा बावलों जैसी हो गई थी उसे तन-बदन और खाने पीने की कोई सुध न रहती. उसे लगता कि नियति ने उन्हें भी बिछुड़ने के लिए ही मिलाया था... क्या परिणय के बाद भी उनका प्रेम खंडित हो जाएगा? यह सोचकर उसके मन में निराशा घर करने लगती और जीवन से मुक्त होने के विचार आते पर अपने पेट में अपने प्यार की निशानी पलती देखकर उन विचारों को झटक देती.

इधर श्याम की दशा भी उससे अलग न थी. वो भी मीरा के पत्र न पाकर दीवानों जैसी स्थिति में पहुँच चुका था. उन दिनों टेलीफोन देश में तो आ चुका था मगर बहुत रईस लोगों के घरों में ही होता था. श्याम आखिर मीरा का हालचाल कैसे जाने... एक बार जयंत से ससुराल जाने की बात की तो उसने बिफरकर कहा-

“कान खोलकर सुन लो श्याम, अगर इस घर में रहना है तो तुम्हें दूसरा विवाह करना पड़ेगा... तुम्हारी भाभी तुम्हारी सेवा नहीं कर सकती और उस विद्रोही लड़की मीरा को मैं इस घर में नहीं देखना चाहता. मैंने अपने एक मित्र दुर्गादास की लड़की रजनी से तुम्हारा रिश्ता तय कर दिया है, वे आर्थिक रूप से हमारी हैसियत के ही हैं और रजनी सुन्दर होने के साथ ही विनम्र और मेहनती भी है. तुम्हारे पास सोचने के लिए दो महीने हैं.

सुनकर श्याम को तो जैसे काठ मार गया. भाई साहब इस हद तक गिर सकते हैं इसपर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. अब उसे आगे कदम बढ़ाने के लिए कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था. उसके लिए मीरा से दूर रहना असंभव था. दूसरे विवाह का तो सवाल ही नहीं उठता था...घर छोड़कर खाली हाथ कहाँ जाएगा...उसे अपने स्वर्गवासी पिता पर भी बहुत क्रोध आया कि ऐसी वसीयत लिखते समय उन्हें यह विचार क्यों नहीं आया कि भाई साहब उसे धोखा भी दे सकते हैं.

ऐसे में उसे स्कूल के दिनों के एकमात्र हमदर्द मित्र अर्जुन की याद आ गई. उनके विचार आपस में बहुत मिलते थे. अर्जुन कक्षाओं में अपनी तिकड़म बाजी से वो छात्रों की हर समस्या का समाधान पलों में खोज लाता था. श्याम की उसने बहुत सहायता की थी. कभी कभी पढ़ाई के सिलसिले में दोनों का एक दूसरे के घर जाना भी हो जाता था मगर पिताजी के अक्सर बीमार रहने के कारण बाद जयंत ने ८ वीं पास करने के बाद श्याम की पढ़ाई छुड़वाकर सहयोग के लिए दुकान में लगा दिया था.

वो अर्जुन से भी गैर जाति का होने के कारण खार खाता था. श्याम से उसकी मित्रता उसे शुरू से ही पसंद नहीं थी अतः पढ़ाई छूटते ही उसकी अर्जुन से हमेशा के लिए दूरी बन गई थी.

श्याम ने एक बार फिर अपनी समस्या के समाधान के लिए अर्जुन से चुपचाप मिलने का मन बनाया और दुकान की छुट्टी के दिन उसके घर जाकर सारी कहानी सुनाकर अपनी समस्या उसके सामने रखी तो अर्जुन की बाँछें खिल गईं. वो चहककर बोल उठा-

“श्याम, तुम जिस लड़की की बात कर रहे हो वो मेरी प्रेमिका है. हम दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. उसके घरवालों को जब हमारे प्रेम के बारे में पता चला तो उन्होंने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी. उनको मेरी जाति पर ऐतराज़ था. उसके बाद हम मिल नहीं पाए न ही उसका कोई समाचार मिला. उसके घरवाले शायद इसी वजह से तुम्हारे बारे में सब जानते हुए भी उसका विवाह करने को तैयार होंगे. मैं स्वयं उसके लिए परेशान हूँ...हम दोनों की समस्या एक ही है दोस्त! अब जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो.

रजनी से विवाह तुम्हें दिखावे के लिए करना होगा. बस किसी तरह एक बार उससे मिलकर सारी बातें बताकर इसके लिए तैयार करना. मैं अभी उससे न तो मिल सकता हूँ, न ही उसके घर जा सकता हूँ मगर विवाह के बाद तुम्हारे घर पर तीनों मिलकर आगे की योजना बनाएँगे. मेरे वहाँ छिपकर आने की युक्ति तुम्हें सोचनी होगी ताकि किसी को हमारी योजना की भनक भी न लगे.”

श्याम ने सोचा भी न था कि उसकी समस्या इतनी आसानी से सुलझ जाएगी. मगर उसके मन में यह शंका भी थी कि क्या ऐसा करना शास्त्र सम्मत होगा? अर्जुन से कहने पर उसने कहा- मैं जानता हूँ मित्र, मगर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई... "यह तो तुम जानते हो न कि सात फेरों के सिवा (जो सात वचनों के साथ संपन्न होते हैं) विवाह पूर्ण नहीं माना जाता..."

"हाँ ...तो..."

"बस वही...कि जब तुम साम, दाम और भेद नीति में सफल नहीं हुए तो अब तुम्हें दंड नीति अपनानी होगी...यानी तुम्हें विवाह का केवल अभिनय करना है. ठीक फेरों के समय रजनी बेहोश होने का नाटक करेगी और तुम्हारे भाई और रजनी के पिता किसी भी तरह विवाह रोकने न देंगे और उसी हालात में एकतरफा मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न हो जाएगा, जो शास्त्रों के अनुसार अधूरा ही माना जाएगा."

"यह बात तो तुमने सोलह आने सत्य कही अर्जुन...मैं आज ही रजनी से मिलने के लिए भाई साहब से बात करूँगा."

उसी दिन श्याम ने जयंत से एक बार रजनी से मिलने की अनुमति माँगी. वो अपनी बात बनती देख इसके लिए सहर्ष तैयार हो गया और दुर्गादास से कहकर एक मंदिर में उनके मिलने की व्यवस्था करवा दी. श्याम ने रजनी को संक्षेप में सारी बातें समझाकर कहा-

“हम विवाह के बाद सबके सामने पति-पत्नी होने का अभिनय करेंगे और कमरे में भाई-बहन की तरह रहकर परिस्थितियों के अनुकूल होने का इंतजार करेंगे.”

रजनी तो अर्जुन के अलावा कहीं भी विवाह होने पर जान देने की योजना मन ही मन बना चुकी थी, अब अचानक खुशियों का खज़ाना अपनी झोली में गिरते देख, ख़ुशी से खिल उठी. वो अपना प्यार पाने के लिए यह अभिनय करने के लिए सहर्ष तैयार हो गई.

दो माह में ही उनका अपूर्ण विवाह उनकी सोची हुई युक्ति से संपन्न हो गया, जो उनके पवित्र उद्देश्य की पूर्णता की साक्षी थी. श्याम का मकान दो मंजिला था. नीचे बैठक और रसोईघर था तथा बीचों-बीच ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं जो दोनों भाइयों के कमरों को विभाजित करती थीं. उसके कमरे की बालकनी से पिछवाड़े की गली दिखाई देती थी, जो अक्सर सुनसान ही रहती थी. विवाह होने के दो दिन बाद ही अर्जुन ने दुकान पर श्याम से मिलकर उसके घर आने के बारे में बात की. श्याम ने कहा कि वो देर रात को पिछवाड़े की गली से उसके घर तक आए. वो बालकनी से रस्सी बाँधकर लटका देगा और वो चढ़कर ऊपर पहुँच जाएगा. किसी को कानोंकान खबर भी न होगी. और उसी रात श्याम के कमरे में दो बिछड़े प्रेमी आमने-सामने खड़े मौन भाषा में अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रहे थे.

सारी रात आगे की योजना पर विचार-विमर्श होता रहा. जब श्याम ने बताया कि इतवार को दुकान बंद होने के कारण सभी देर तक सोते रहते हैं तो तय हुआ कि हर शनिवार की रात गाँव जाने वाली आखिरी बस से वो इसी रास्ते से मीरा के पास जाकर सुबह पहली बस से वापस आया करेगा तब तक अर्जुन अपनी मर्यादा का पालन करते हुए रजनी के पास रहेगा. वो स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुका था और अब अच्छी सी नौकरी के लिए आवेदन और प्रशिक्षण में लगभग एक वर्ष का समय लग सकता था तब तक यही क्रम जारी रहेगा. उसकी नौकरी लगते ही वो रजनी से कोर्ट मैरिज कर लेगा और किसी भी तरीके से रुपयों का इंतजाम करके श्याम के लिए उसके ससुराल के गाँव में ही दुकान खुलवा देगा ताकि वो भाई से अलग रहकर अपना पुश्तैनी कार्य शुरू कर सके.

पैसों की बात सुनते ही रजनी बोल पड़ी-

“मेरे पास जो जेवर हैं ये सभी मैं श्याम भैया के नाम करती हूँ.”

श्याम के विरोध करने पर उसने कहा-

“विधाता ने शायद सोच-समझकर ही हमको एक दूसरे से मिलाया है भैया... कर्ता तो वही एक है मगर जब मिलन-यज्ञ हमारे द्वारा भौतिक साधनों और सहयोग के आदान प्रदान से संभव है तो मैं भी इसमें आहुति अवश्य दूँगी. कुदरत ने मेरा सबसे कीमती जेवर मुझे वापस किया है तो उसके आगे ये सब तुच्छ हैं. अगर हममें से एक ने भी अपने साथी से जुदा होकर अपनी जान दी होती तो बाकी तीन जीवन भी मटियामेट हो जाते.”

“मगर बहन, कोर्ट मैरिज से पहले तुम्हें मेरे साथ गाँव चलना पड़ेगा जहाँ से मैं विधिवत तुम्हारा कन्यादान करके अर्जुन के साथ विदा करूँगा...” श्याम ने भावुक होते हुए कहा.

तीनों की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे.

ooo ooo ooo

उस दिन रात को १२ बजे जब सब गहरी नींद सोए थे, मीरा के घर के मुख्य द्वार पर दस्तक हुई. आगे के कमरे में मीरा ही सोती थी, वो घबराकर सोचने लगी, इस समय कौन आ सकता है...सब गहरी नींद सोए थे तो उसने किसी को नहीं उठाया और डरते-डरते द्वार की दरार से झाँका तो अस्पष्ट सा एक साया दिखाई दिया. उसने पूछा-

“कौन है बाहर?”

“मैं श्याम हूँ मीरा, द्वार खोलो. मीरा की आवाज़ पहचानकर श्याम ने कहा.”

श्याम तो मीरा की नस-नस में समाए हुए थे, उसने श्याम की आवाज़ पहचानकर तुरंत द्वार खोल दिया और हर्ष मिश्रित आश्चर्य से उसे देखती रह गई.

श्याम ने उसे गले लगाकर प्यार किया और घरवालों को इस समय न उठाने के लिए कहा. फिर अपनी सारी कहानी विस्तार से उसे कह सुनाई. उन्हें एक-दूसरे के पत्र न मिलने का कारण भी समझ में आ गया कि जयंत की डाकिये से मिली भगत होगी. मीरा तो खुशी में दीवानी हुई जा रही थी, ३ – ४ घंटे किस तरह गुज़र गए पता ही न चला. श्याम ने हर सप्ताह इसी तरह आते रहने का वादा करके विदा ली और वापस चला गया.

घर में श्याम के आने की किसी को भनक भी न लगी पर सुबह होते ही मीरा ने ख़ुशी से झूमते हुए माँ को सारी बात बता दी. माँ ने उसे गले लगाकर कहा-

बेटी, मेरा मन कहता था कि श्याम ज़रूर आएगा. प्यार अगर सच्चा है तो कुदरत भी उन जोड़ों के लिए सदय हो जाती है.

समय गुजरता रहा. निश्चित तिथि पर मीरा ने सुन्दर सी बच्ची को जन्म दिया, मीरा के चेहरे पर इस समय श्याम की अनुपस्थिति से उदासी छाई हुई थी. उसने तय किया कि बिटिया का नामकरण श्याम की उपस्थिति में ही होगा. सप्ताहांत में श्याम के आने पर आधी रात को बेटी को उन्होंने अपने नामों के प्रथम अक्षर को मिलाकर ‘मीशा’ नाम दिया.

उधर रजनी ने अपनी जी तोड़ मेहनत से मीना का दिल जीत लिया था और अपना प्रेम पाने के लिए कर्मरत योगी की तरह अपनी भूमिका निभा रही थी. एक वर्ष का समय उन चारों के सब्र का इम्तिहान लेते हुए गुजर गया.

०००० ०००० ००००

उस दिन रविवार को जब जयंत और मीना सोकर उठे तो नियमानुसार रजनी को रसोई में न देखकर मीना को आश्चर्य हुआ. चूल्हा अभी तक न जला था, न ही बच्चों के दूध-नाश्ते की कोई तैयारी हुई थी.

उसने भुनभुनाते हुए रजनी के कमरे तक जाकर बाहर से ही आवाज़ लगाई तो कोई जवाब न पाकर गुस्से मे दरवाजा ठोका तो वो खुल गया और मीना गिरते-गिरते बची. मगर कमरा खाली देखकर वो हैरान रह गई और घबराकर जोर से जयंत को आवाजें देने लगी. जयंत तुरंत वहाँ पहुँचा तो वो भी विस्मित रह गया. अन्दर जाकर खिड़की का पर्दा हटाया तो उसे बालकनी से बंधी गाँठें लगी हुई रस्सी लटकती दिखाई दी. अभी वो इस पहेली का हल खोज ही रहा था कि मीना ने बिस्तर पर तकिये के नीचे से एक पत्र निकालकर उसके हाथ में दे दिया.

लिखा था-

आदरणीय भाई साहब, मैं रजनी बहन के साथ इस घर को छोड़कर हमेशा के लिए अपनी मीरा के पास जा रहा हूँ. तुम इसे मेरा पलायन न समझना...मैं चाहता तो किसी भी तरीके से अपना अधिकार ले सकता था, मगर मैं अपने स्वर्गवासी सम्मानित माँ-पिता द्वारा की गई वसीयत को चुनौती नहीं दे सकता और नहीं चाहता की रजनी बहन को उसके प्यार तक पहुँचाने में कोई व्यवधान उपस्थित करे ...आपने एक परिणीता को पति से जुदा करने का जो अपराध किया है उसका दंड कुदरत आपको अवश्य देगी.

-आपका नालायक भाई श्याम

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-कल्पना रामानी, नवी मुंबई

meeraa ne jyonhee rasoee kaa kacharaa daalane ke lie ghar ke pichawaade kaa dvaar kholaa, saamane ek sudarshan yuwak ko usee taraph ghoorataa paakar sakapakaa gaee usane binaa idhar-udhar dekhe jaldee se dher par kacharaa daalaa aur andar jaakar turant dvaar band kar diyaa badee mushkil se apanee bढ़ee huee dhadakanon par kaaboo paayaa use samajh men naheen aa rahaa thaa ki aakhir wo kaun hai aur use is tarah kyon ghoor rahaa thaapahale to kabhee use wahaan naheen dekhaa

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meeraa kaa us gaanv kee nimn madhyamawargeey kaalonee men chotaa saa do kamaron kaa ghar thaa jo teen taraph se eenton kee chaaradeewaaree se ghiraa huaa thaa saamane kee taraph kuch chaudee aur pakkee sadak tathaa pichawaade kuch sankaree aur kachchee galee thee saamane waalaa kamaraa kuch badaa aur doosaraa chotaa, ek seedh men bane hue the aage aur peeche kaa aangan pakkaa thaa aur bagal waalee kachchee zameen par neem kaa ek badaa saa ped lagaa huaa thaa chote kamare se baahar aangan men nikalate hee ek taraph kramashah rasoeeghar aur snaanaghar-shauchaalay bane hue the aangan kaa dvaar kachchee galee men khulataa thaa jisakaa upayog mahilaaen aksar kacharaa daalane ke lie hee karatee theen choonki subah munh-andhere hee saphaaee hokar kacharaa wahaan se uth jaataa thaa to meeraa jaldee uthakar sabase pahale yahee kaam karatee thee taaki dvaar ke saamane gandagee rah n jaae

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us kolonee ke sabhee ghar lagabhag isee tarah bane hue the pichawaade kaa dvaar kholate hee saamane waale gharon kee kataar kaa pichawaadaa nazar aataa thaa usake saamane waale do gharon ke beech kee khaalee zameen par koee chaaradeewaaree naheen thee balki maalikon ne apanaa apanaa hissaa kanteele taaron kee baad se gher rakhaa thaa daahinee taraph waale ghar kee svaaminee yaanee meenaa kee ammaa aur meeraa kee ammaa ke beech achchee dostee thee we aksar pichawaade se hee ek doosaree ke yahaan aanaa jaanaa karatee theen meenaa, meeraa se kuch warsh badee thee aur usakaa wiwaah ho chukaa thaa, atah meeraa kaa usase adhik parichay naheen thaa kabhee-kabhee wo unake ghar apanee maan ko bulaane chalee jaatee thee to aupachaarik baatacheet ho jaatee thee

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wo yuwak meeraa ko usee ghar kee taraph waale hisse kee baad ke andar khadaa dikhaa thaa usane sochaa koee rishtedaar hogaa, wo kyon sar phodemagar usakaa wo ghooranaa meeraa ke man ko wichalit kar rahaa thaa doosare din bhee jab yahee huaa to meeraa asamanjas kee sthiti men pahunch gaee ek maheenaa pahale hee to paas ke hee shahar men usakee sagaaee huee hai, kaheen wo binaa baat badanaam n ho jaae, sochakar usane apanaa kacharaa daalane kaa samay hee badal diyaa ab wo raat ko hee saare kaam nipataakar kacharaa baahar daal detee thee do din theek se gujare, teesare din jab wo kacharaa daalane lagee to usane galee ke us taraph waalee naalee ke raaste ek kaale saanp ko usee ghar men ghusate dekhaa meeraa ne ghabaraakar unhen saawadhaan karane ke lie aage bढ़kar us ghar kaa darawaajaa peetanaa shuroo kar diyaa

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jaldee hee pichawaade kee battee jalee aur dvaar khulaa to meeraa saamane usee yuwak ko dekhakar hataprabh rah gaee aur ghabaraahat men saanp bhoolakar ulate paanv waapas jaane hee lagee thee ki us yuwak ne usakaa raastaa rokakar poochaa-

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“tum meeraa ho n?”

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apanaa naam us yuwak ke munh se sunakar meeraa kaa kalejaa dhadakane lagaa ghabaraaee aawaaz men usane sveekaarokti men sir hilaate hue prati prashn kiyaa-

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“magar main to aapako naheen jaanatee, aap kaun hain, mujhe kaise jaanate hain aur mere naam se aapako kyaa lenaa?” kahate hue wo aage bढ़ne lagee ki yuwak ne usakaa haath pakad liyaa aur chup rahane kaa ishaaraa karate hue anunay ke svar men kahaa-

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“chillaanaa mat meeraa pleez! main shyaam hoon, tumhaaraa mangetaryahaan apanee bhaabhee ko liwaane aayaa hoon usee ne mujhe kal tumhaare isee dvaar se baahar nikalate samay tumhaaree taraph ishaaraa karake yah baat bataaee thee waise to bhaabhee ko lene bhaaee saahab hee aate hain magar is baar jaanaboojhakar mujhe bhejaa taaki main apanee hone waalee dulhan ko dekh sakoon”

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“haay raam! aap yahaan? mujhe jaane deejiyekoee dekh legaa”

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“is andhere men galee men koee naheen jhaankegaaaur ghar men bhee ittaphaak se abhee koee naheen hai” kahate hue usane meeraa kaa haath choom liyaa

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“haay raam! yah aap kyaa kar rahe hainmujhe jaane deejiye pleez!”

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“yah haay raam! haay raam! kee rat kyon lagaa rakhee hai, meraa naam shyaam hai, haay shyaam! kaho to chod doongaa”

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“haay raam! main aapakaa naam kaise le sakatee hoon?”

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“phir wahee raam!main kahataa hoon n! jab tak shyaam naheen kahogee, jaane n doongaa”

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“achchaa shyaam, ab jaane do, mujhe n dekhakar ammaa baahar aa jaaegee” meeraa kaa haath thar-thar kaanpane lagaa thaa

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“meeraa, parason shaam tak main waapas chalaa jaaoongaa yah to ittafaak hee hai ki tum yahaan aa gaee aur mujh khushanaseeb ko yah awasar mil gayaa kal subah tum apane usee samay par kacharaa daalane ke lie baahar nikalanaa, main tumhen waheen khadaa miloongaa taar kee baad ke paas patthar men lipataa huaa kaagaz kaa purjaa hogaa, tum uthaa lenaa aur pढ़kar jawaab likhakar usee tareeke se waheen rakh denaa meree nazar isee taraph hee lagee rahegee” magar main yah poochanaa to bhool hee gayaatum yahaan kis prayojan se aaee thee”

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“wo wois taraph saanp ghusaa thaaare! n jaane kahaan chalaa gayaa hogaa”

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“achchaa wo use to mainne hee tumhen bulaane ke lie bhejaa thaa” kahakar hansate hue shyaam ne phir se usakaa haath choom liyaa

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meeraa kaa rom-rom pulak aur siharan se bhar gayaa wo haath chudaakar tezee se apane ghar men ghus gaee

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raat bhar wo apane haath ko baar baar sahalaatee, choomatee aur man hee man budabudaatee rahee “kitanaa sudarshan aur sundar hai shyaammeraa shyaam, aur

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main usakee meeraa kitanaa sukhad ahasaas! kaash! we pal waheen thahar jaate” neend to ab shyaam ne churaa hee lee theeshubah ke intajaar men karawaten badalatee rahee

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munh-andhere uthakar meeraa ne jaldee-jaldee kuch kacharaa ikaththaa kiyaa, kyonki kal waalaa to wo raat men hee baahar daal chukee thee jaise hee dvaar kholaa, shyaam ko waheen khade paayaa shyaam ne hawaaee chumban uchaalaa to usane sharmaakar palaken jhukaa leen kanakhiyon se dekhaa, shyaam ne patthar men lipataa huaa kaagaz taar kee baad se baahar sarakaa diyaa aur andar chalaa gayaa

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meeraa ne idhar-udhar dekhaa aur tahalate hue wo patthar uthaakar waapas andar aakar jaldee se patthar se kaagaz alag karake chipaa liyaa

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ab baaree thee patr pढ़ne aur uttar likhane keeto isake lie baatharoom se surakshit sthaan kaunasaa ho sakataa thaa bhalaa?

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meeraa koraa kaagaz aur lekhanee haath men dabaakar idhar-udhar dekhatee huee baatharoom men band ho gaee jaldee-jaldee ek hee saans men pooraa patr pढ़ liyaa

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“pyaaree meeraa, bahut bahut pyaar

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main jaisaa tumhen bataa chukaa hoon, parason shaam tak yahaan se chalaa jaaoongaa magar jaane se pahale ek baar punah tumhaaraa haath choomanaa aur jee bharakar saannidhy mahasoos karanaa chaahataa hoon phir to wiwaah hone tak patron se hee jee bahalaanaa padegaa yah gaanv tumhaaraa jaanaa pahachaanaa hai aur tum baahar ke kaaryon ke lie bhee ghar se nikalatee hee ho, to kal din men koee aisaa sthaan tay karake bataanaa jahaan hamen pahachaane jaane kaa koee dar n ho

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baakee baaten milakar hee hongee

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sirph tumhaaraa shyaam

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yaanee apanee lailaa kaa majanoo”

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patr pढ़te-pढ़te meeraa ke poore badan men ajeeb see khushanumaa khumaaree chaane lagee thee

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usane uttar likhanaa shuroo kiyaa-

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“mere shyaam, yah naheen ho sakataajis gaanv/samaaj ke bujurg bachchon kee sagaaee bhee ladake-ladakee kee anupasthiti men, binaa unakee sveekriiti lie kar dete hon, us samaaj se itane khulepan kee ummeed to kee naheen jaa sakatee aur hamaaraa choree chipe milanaa bhee uchit naheen man kee maanakar milen to bhee tum is chote se shahar men nae ho tumhen to koee naheen pahachaan paaegaa magar main kaheen bhee aasaanee se pahachaan lee jaaoongee atah abhee milane aur pyaar jataane kee ummeed chod do sirph chah maheene kee to baat hai, tab tak intajaar hee karanaa hogaa yah patr bhee chipakar likh rahee hoon, taaki kisee kaa ulaahanaa n sunanaa pade

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aur haan, tum hamaare pyaar kee tulanaa lailaa-majanoo athawaa any kisee any aitihaasik prasiddh premee yugal se kabhee mat karanaayah to tum jaanate hee ho shyaam! ki jin prem-kahaaniyon ko duniyaa pyaar kaa prateek maanatee chalee aaee hai, unamen se adhikaansh ke naayak-naayikaa prem kee parinati yaanee parinay-sootr men bandhane se pahale hee judaaee kaa zahar peene ko majaboor kar die gae wiwaahoparaant unakaa jeewan kaisaa hotaa, yah koee naheen bataa sakataa lekin hamaaree kahaanee parinay se shuroo hokar prem kee pariniti tak pahunchegee aur hamaaree prem-kahaanee men judaaee kaa koee adhyaay naheen hogaa yah meeraa apane shyaam se judaa hone ke lie naheen balki ek saath jeene-marane ke lie janmee hai"

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sirph tumhaaree meeraa

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chah maheene beetate der kahaan lagatee hai meeraa ne shyaam ko to tasallee de dee magar usake lie ye chah maheene chah yugon se kam n the jaise-taise samay banjaare ne use shyaam se milan ke palon tak pahunchaa hee diyaa aur meeraa shyaam kee dil-duniyaa aabaad karane dulhan banakar sasuraal aa gaee

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pariwaar men shyaam aur usake alaawaa jeth-jithaanee aur unake do bachche the saas-sasur chah warsh pahale hee ek ek karake kaal kawalit ho chuke the we kiraane ke thok wyaapaaree the shahar men unakee chotee see dukaan thee, magar itanee kamaaee ho jaatee thee ki gujar-basar aasaanee se ho sake jethaanee meenaa usakee poorv parichit thee atah meeraa ko pariwaar ke saath saamanjasy bithaane men koee pareshaanee naheen huee meenaa ko wo maayake ke rishte se deedee kahakar hee sanbodhit karatee thee

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meeraa yah to jaanatee thee ki jode oopar se hee banakar aate hain magar milan kaa maadhyam to dharateewaasee hee banate hain n atah wo jeth-jithaanee kaa apane oopar upakaar maanatee thee ki unhonne binaa dahej ke shyaam ke lie use pasand kiyaa thaa meeraa ke maan-pitaa bhee itanee aasaanee se jaane pahachaane maadhyam se betee ke lie baraabaree kaa war-ghar paakar nishchint ho gae the

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dukaan kaa lenaden aur rupayon kaa hisaab jethajee jayant rakhate the to ghar kharch kee baagador jithaanee meenaa ke haath men thee sheeghr hee meenaa badee saphaaee se meeraa ke saath bhaawanaatmak rishtaa banaakar ghar ke saare kaary usake maathe daalatee gaee

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wo bachchon men wyast rahane kaa dikhaawaa karatee aur din bhar meeraa ko

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aadesh detee rahatee meeraa bhee naasamajh to thee naheen, kuch samay pyaar kee maar sahatee rahee magar jab wo garbhawatee huee to use kuch aaraam karane kee aawashyakataa mahasoos hone lagee un dinon madhyam wargeey gharon men ghar ke saare kaam mahilaaon ko hee karane hote the, kaamawaaliyaan rakhane kaa n to riwaaj thaa n hee haisiyat, atah ek din usane meenaa se kahaa ki deedee mujhase ab ghar ke saare kaary naheen hoteaap kuch sahaayataa kar diyaa karen to meraa shareer ab kuch aaraam bhee chaahataa hai

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meeraa kaa is tarah saamane bolane se meenaa ko apanaa apamaan mahasoos huaa turant bolee-

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“meeraa main bhee lambe samay se is ghar ko sanbhaal rahee hoon, ab mujhe aaraam karane kaa pooraa adhikaar hai mainne tumhen mehanatee aur samajhadaar maanakar hee apanee dewaraanee banaayaakyaa mainne do bachchon ko janm naheen diyaa? ghar ke kaary to tumhen karane hee padenge”

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meeraa samajh gaee ki meenaa ko dewaraanee ke roop men naukaraanee chaahie thee isee kaaran usane use pasand kiyaa thaamagar wo bhee apanaa adhikaar haasil karanaa bakhoobee jaanatee thee, is tarah shoshan kab tak sahatee? raat men shyaam se is baat kaa jikr kiyaa to shyaam bhee chintit ho uthaa par ghareloo maamale men seedhe hastakshep to kar naheen sakataa thaa to meeraa se kah diyaa ki usase jitanaa bane karake baakee chod diyaa kare aur meeraa ne doosare din hee bagaawat kaa bigul bajaa diyaa rasoee ke kaam aadhe adhoore chodakar aaraam karane apane kamare men chalee gaee

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meenaa ko bhalaa yah baat kaise hazam hotee? baat jayant ke kaanon tak pahunchee to usane shyaam ko bulaakar oonchee aawaaz men kahaa-

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“dekho shyaam, meeraa kaa is tarah kaa wyawahaar ekadam anuchit hai use yahaan rahanaa hai to ghar ke kaary karane hee padenge aakhir meenaa ne bhee barason is ghar ko sanbhaalaa hai, tumhaaree parawarish kee haiab usakaa aaraam karane kaa pooraa adhikaar hai”

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shyaam ko bhaaee kee do took baat naheen suhaaee, magar wo majaboor thaa agar gusse men alag hone kee baat kahegaa to bhaaee saahab use khaalee haath baahar kar denge kyonki pitaajee kee waseeyat ke anusaar unake baad unakee sanpatti yaanee dukaan aur makaan men donon bhaaee baraabaree ke saajhedaar hain magar yadi koee bhaaee alag honaa chaahe to use sanpatti se wanchit hokar khaalee haath ghar chodanaa padegaa we chaahate the ki donon bhaaee ek doosare kaa sukh duhkh baantate hue aajeewan jude rahen

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shyaam ab jaan gayaa thaa ki unakee sthiti ghar men naukaron jaisee ho chukee hai aaj wo pachataa rahaa thaa ki bhaaee ke kahane men aakar usane apanee pढ़aaee adhooree kyon chod deewo svayan to saare kasht jhel letaa magar meeraa par atyaachaar hote wo naheen dekh sakataa thaa, aakhir bahut soch-wichaarakar usane meeraa ko prasaw hone tak maayake bhejane kaa man banaayaa aur bhaaee se isake lie anumati maangee

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jayant ne ek kutil muskaraahat ke saath apanee sveekriiti de dee aur shyaam ne meeraa ko bhaaree man se pratidin patr likhane aur saptaahaant men milane aate rahane ke waade ke saath use maayake bhej diyaa

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aur yaheen se unake dard kee daastaan shuroo ho gaee meeraa pratidin nayaa saweraa hote hee shyaam ko patr likhatee aur svayan daakakhaane jaakar letar-baaks men daalakar aatee aur shyaam kaa uttar milane kaa intajaar karatee magar ek saptaah beet jaane ke baad bhee usakaa koee patr n paakar usakaa man wichalit hone lagaa use samajh naheen aa rahaa thaa ki shyaam use is tarah kyon tadapaa rahaa haiphir sochaa, saptaahaant men milane aaegaa to jee bharakar shikaayat karegee magar do saptaah beet jaane ke baad bhee n shyaam aayaa n hee usakaa patrab meeraa kare to kyaa karetarah-tarah kee aashankaaon se usakaa man bindhane lagaa

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usakee maan use hone waale bachche kaa waastaa dekar use khush rahane kee naseehat detee magar meeraa kee dashaa baawalon jaisee ho gaee thee use tan-badan aur khaane peene kee koee sudh n rahatee use lagataa ki niyati ne unhen bhee bichudane ke lie hee milaayaa thaa kyaa parinay ke baad bhee unakaa prem khandit ho jaaegaa? yah sochakar usake man men niraashaa ghar karane lagatee aur jeewan se mukt hone ke wichaar aate par apane pet men apane pyaar kee nishaanee palatee dekhakar un wichaaron ko jhatak detee

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idhar shyaam kee dashaa bhee usase alag n thee wo bhee meeraa ke patr n paakar deewaanon jaisee sthiti men pahunch chukaa thaa un dinon teleephon desh men to aa chukaa thaa magar bahut raees logon ke gharon men hee hotaa thaa shyaam aakhir meeraa kaa haalachaal kaise jaane ek baar jayant se sasuraal jaane kee baat kee to usane bipharakar kahaa-

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“kaan kholakar sun lo shyaam, agar is ghar men rahanaa hai to tumhen doosaraa wiwaah karanaa padegaa tumhaaree bhaabhee tumhaaree sewaa naheen kar sakatee aur us widrohee ladakee meeraa ko main is ghar men naheen dekhanaa chaahataa mainne apane ek mitr durgaadaas kee ladakee rajanee se tumhaaraa rishtaa tay kar diyaa hai, we aarthik roop se hamaaree haisiyat ke hee hain aur rajanee sundar hone ke saath hee winamr aur mehanatee bhee hai tumhaare paas sochane ke lie do maheene hain

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sunakar shyaam ko to jaise kaath maar gayaa bhaaee saahab is had tak gir sakate hain isapar use wishvaas hee naheen ho rahaa thaa ab use aage kadam bढ़aane ke lie koee maarg naheen soojh rahaa thaa usake lie meeraa se door rahanaa asanbhaw thaa doosare wiwaah kaa to sawaal hee naheen uthataa thaaghar chodakar khaalee haath kahaan jaaegaause apane svargawaasee pitaa par bhee bahut krodh aayaa ki aisee waseeyat likhate samay unhen yah wichaar kyon naheen aayaa ki bhaaee saahab use dhokhaa bhee de sakate hain

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aise men use skool ke dinon ke ekamaatr hamadard mitr arjun kee yaad aa gaee unake wichaar aapas men bahut milate the arjun kakshaaon men apanee tikadam baajee se wo chaatron kee har samasyaa kaa samaadhaan palon men khoj laataa thaa shyaam kee usane bahut sahaayataa kee thee kabhee kabhee pढ़aaee ke silasile men donon kaa ek doosare ke ghar jaanaa bhee ho jaataa thaa magar pitaajee ke aksar beemaar rahane ke kaaran baad jayant ne 8 ween paas karane ke baad shyaam kee pढ़aaee chudawaakar sahayog ke lie dukaan men lagaa diyaa thaa

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wo arjun se bhee gair jaati kaa hone ke kaaran khaar khaataa thaa shyaam se usakee mitrataa use shuroo se hee pasand naheen thee atah pढ़aaee chootate hee usakee arjun se hameshaa ke lie dooree ban gaee thee

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shyaam ne ek baar phir apanee samasyaa ke samaadhaan ke lie arjun se chupachaap milane kaa man banaayaa aur dukaan kee chuttee ke din usake ghar jaakar saaree kahaanee sunaakar apanee samasyaa usake saamane rakhee to arjun kee baanchen khil gaeen wo chahakakar bol uthaa-

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“shyaam, tum jis ladakee kee baat kar rahe ho wo meree premikaa hai ham donon ek hee kaalej men pढ़te the usake gharawaalon ko jab hamaare prem ke baare men pataa chalaa to unhonne usakee pढ़aaee chudawaa dee unako meree jaati par aitaraaz thaa usake baad ham mil naheen paae n hee usakaa koee samaachaar milaa usake gharawaale shaayad isee wajah se tumhaare baare men sab jaanate hue bhee usakaa wiwaah karane ko taiyaar honge main svayan usake lie pareshaan hoonham donon kee samasyaa ek hee hai dost! ab jaisaa main kahataa hoon waisaa karo

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rajanee se wiwaah tumhen dikhaawe ke lie karanaa hogaa bas kisee tarah ek baar usase milakar saaree baaten bataakar isake lie taiyaar karanaa main abhee usase n to mil sakataa hoon, n hee usake ghar jaa sakataa hoon magar wiwaah ke baad tumhaare ghar par teenon milakar aage kee yojanaa banaaenge mere wahaan chipakar aane kee yukti tumhen sochanee hogee taaki kisee ko hamaaree yojanaa kee bhanak bhee n lage”

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shyaam ne sochaa bhee n thaa ki usakee samasyaa itanee aasaanee se sulajh jaaegee magar usake man men yah shankaa bhee thee ki kyaa aisaa karanaa shaastr sammat hogaa? arjun se kahane par usane kahaa- main jaanataa hoon mitr, magar meree baat abhee pooree naheen huee "yah to tum jaanate ho n ki saat pheron ke siwaa (jo saat wachanon ke saath sanpann hote hain) wiwaah poorn naheen maanaa jaataa"

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"haan to"

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"bas waheeki jab tum saam, daam aur bhed neeti men saphal naheen hue to ab tumhen dand neeti apanaanee hogeeyaanee tumhen wiwaah kaa kewal abhinay karanaa hai theek pheron ke samay rajanee behosh hone kaa naatak karegee aur tumhaare bhaaee aur rajanee ke pitaa kisee bhee tarah wiwaah rokane n denge aur usee haalaat men ekataraphaa mantrochchaar ke saath wiwaah sanpann ho jaaegaa, jo shaastron ke anusaar adhooraa hee maanaa jaaegaa"

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"yah baat to tumane solah aane saty kahee arjunmain aaj hee rajanee se milane ke lie bhaaee saahab se baat karoongaa"

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usee din shyaam ne jayant se ek baar rajanee se milane kee anumati maangee wo apanee baat banatee dekh isake lie saharsh taiyaar ho gayaa aur durgaadaas se kahakar ek mandir men unake milane kee wyawasthaa karawaa dee shyaam ne rajanee ko sankshep men saaree baaten samajhaakar kahaa-

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“ham wiwaah ke baad sabake saamane pati-patnee hone kaa abhinay karenge aur kamare men bhaaee-bahan kee tarah rahakar paristhitiyon ke anukool hone kaa intajaar karenge”

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rajanee to arjun ke alaawaa kaheen bhee wiwaah hone par jaan dene kee yojanaa man hee man banaa chukee thee, ab achaanak khushiyon kaa khazaanaa apanee jholee men girate dekh, kushee se khil uthee wo apanaa pyaar paane ke lie yah abhinay karane ke lie saharsh taiyaar ho gaee

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do maah men hee unakaa apoorn wiwaah unakee sochee huee yukti se sanpann ho gayaa, jo unake pawitr uddeshy kee poornataa kee saakshee thee shyaam kaa makaan do manjilaa thaa neeche baithak aur rasoeeghar thaa tathaa beechon-beech oopar jaane ke lie seeढ़iyaan theen jo donon bhaaiyon ke kamaron ko wibhaajit karatee theen usake kamare kee baalakanee se pichawaade kee galee dikhaaee detee thee, jo aksar sunasaan hee rahatee thee wiwaah hone ke do din baad hee arjun ne dukaan par shyaam se milakar usake ghar aane ke baare men baat kee shyaam ne kahaa ki wo der raat ko pichawaade kee galee se usake ghar tak aae wo baalakanee se rassee baandhakar latakaa degaa aur wo chढ़kar oopar pahunch jaaegaa kisee ko kaanonkaan khabar bhee n hogee aur usee raat shyaam ke kamare men do bichade premee aamane-saamane khade maun bhaashaa men apanee kushee kaa izahaar kar rahe the

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saaree raat aage kee yojanaa par wichaar-wimarsh hotaa rahaa jab shyaam ne bataayaa ki itawaar ko dukaan band hone ke kaaran sabhee der tak sote rahate hain to tay huaa ki har shaniwaar kee raat gaanv jaane waalee aakhiree bas se wo isee raaste se meeraa ke paas jaakar subah pahalee bas se waapas aayaa karegaa tab tak arjun apanee maryaadaa kaa paalan karate hue rajanee ke paas rahegaa wo snaatak kee pढ़aaee pooree kar chukaa thaa aur ab achchee see naukaree ke lie aawedan aur prashikshan men lagabhag ek warsh kaa samay lag sakataa thaa tab tak yahee kram jaaree rahegaa usakee naukaree lagate hee wo rajanee se kort mairij kar legaa aur kisee bhee tareeke se rupayon kaa intajaam karake shyaam ke lie usake sasuraal ke gaanv men hee dukaan khulawaa degaa taaki wo bhaaee se alag rahakar apanaa pushtainee kaary shuroo kar sake

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paison kee baat sunate hee rajanee bol padee-

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“mere paas jo jewar hain ye sabhee main shyaam bhaiyaa ke naam karatee hoon”

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shyaam ke wirodh karane par usane kahaa-

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“widhaataa ne shaayad soch-samajhakar hee hamako ek doosare se milaayaa hai bhaiyaa kartaa to wahee ek hai magar jab milan-yajn hamaare dvaaraa bhautik saadhanon aur sahayog ke aadaan pradaan se sanbhaw hai to main bhee isamen aahuti awashy doongee kudarat ne meraa sabase keematee jewar mujhe waapas kiyaa hai to usake aage ye sab tuchch hain agar hamamen se ek ne bhee apane saathee se judaa hokar apanee jaan dee hotee to baakee teen jeewan bhee matiyaamet ho jaate”

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“magar bahan, kort mairij se pahale tumhen mere saath gaanv chalanaa padegaa jahaan se main widhiwat tumhaaraa kanyaadaan karake arjun ke saath widaa karoongaa” shyaam ne bhaawuk hote hue kahaa

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teenon kee aankhon men kushee ke aansoo the

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ooo ooo ooo

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us din raat ko 12 baje jab sab gaharee neend soe the, meeraa ke ghar ke mukhy dvaar par dastak huee aage ke kamare men meeraa hee sotee thee, wo ghabaraakar sochane lagee, is samay kaun aa sakataa haishab gaharee neend soe the to usane kisee ko naheen uthaayaa aur darate-darate dvaar kee daraar se jhaankaa to aspasht saa ek saayaa dikhaaee diyaa usane poochaa-

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“kaun hai baahar?”

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“main shyaam hoon meeraa, dvaar kholo meeraa kee aawaaz pahachaanakar shyaam ne kahaa”

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shyaam to meeraa kee nas-nas men samaae hue the, usane shyaam kee aawaaz pahachaanakar turant dvaar khol diyaa aur harsh mishrit aashchary se use dekhatee rah gaee

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shyaam ne use gale lagaakar pyaar kiyaa aur gharawaalon ko is samay n uthaane ke lie kahaa phir apanee saaree kahaanee wistaar se use kah sunaaee unhen ek-doosare ke patr n milane kaa kaaran bhee samajh men aa gayaa ki jayant kee daakiye se milee bhagat hogee meeraa to khushee men deewaanee huee jaa rahee thee, 3 – 4 ghante kis tarah guzar gae pataa hee n chalaa shyaam ne har saptaah isee tarah aate rahane kaa waadaa karake widaa lee aur waapas chalaa gayaa

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ghar men shyaam ke aane kee kisee ko bhanak bhee n lagee par subah hote hee meeraa ne kushee se jhoomate hue maan ko saaree baat bataa dee maan ne use gale lagaakar kahaa-

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betee, meraa man kahataa thaa ki shyaam zaroor aaegaa pyaar agar sachchaa hai to kudarat bhee un jodon ke lie saday ho jaatee hai

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samay gujarataa rahaa nishchit tithi par meeraa ne sundar see bachchee ko janm diyaa, meeraa ke chehare par is samay shyaam kee anupasthiti se udaasee chaaee huee thee usane tay kiyaa ki bitiyaa kaa naamakaran shyaam kee upasthiti men hee hogaa saptaahaant men shyaam ke aane par aadhee raat ko betee ko unhonne apane naamon ke pratham akshar ko milaakar ‘meeshaa’ naam diyaa

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likhaa thaa-

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aadaraneey bhaaee saahab, main rajanee bahan ke saath is ghar ko chodakar hameshaa ke lie apanee meeraa ke paas jaa rahaa hoon tum ise meraa palaayan n samajhanaamain chaahataa to kisee bhee tareeke se apanaa adhikaar le sakataa thaa, magar main apane svargawaasee sammaanit maan-pitaa dvaaraa kee gaee waseeyat ko chunautee naheen de sakataa aur naheen chaahataa kee rajanee bahan ko usake pyaar tak pahunchaane men koee wyawadhaan upasthit kare aapane ek parineetaa ko pati se judaa karane kaa jo aparaadh kiyaa hai usakaa dand kudarat aapako awashy degee

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-aapakaa naalaayak bhaaee shyaam

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priy paathak, aapane kahaanee pढ़ee aapakaa hraday-tal se saadar aabhaar apanee reting dekar tippanee karanaa aur mitron ko sheyar karanaa n bhoolen

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-kalpanaa raamaanee, nawee munbaee

मीरा ने ज्योंही रसोई का कचरा डालने के लिए घर के पिछवाड़े का द्वार खोला, सामने एक सुदर्शन युवक को उसी तरफ घूरता पाकर सकपका गई. उसने बिना इधर-उधर देखे जल्दी से ढेर पर कचरा डाला और अन्दर जाकर तुरंत द्वार बंद कर दिया. बड़ी मुश्किल से अपनी बढ़ी हुई धड़कनों पर काबू पाया. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो कौन है और उसे इस तरह क्यों घूर रहा था...पहले तो कभी उसे वहाँ नहीं देखा.

मीरा का उस गाँव की निम्न मध्यमवर्गीय कालोनी में छोटा सा दो कमरों का घर था जो तीन तरफ से ईंटों की चारदीवारी से घिरा हुआ था. सामने की तरफ कुछ चौड़ी और पक्की सड़क तथा पिछवाड़े कुछ संकरी और कच्ची गली थी. सामने वाला कमरा कुछ बड़ा और दूसरा छोटा, एक सीध में बने हुए थे. आगे और पीछे का आँगन पक्का था और बगल वाली कच्ची ज़मीन पर नीम का एक बड़ा सा पेड़ लगा हुआ था. छोटे कमरे से बाहर आँगन में निकलते ही एक तरफ क्रमशः रसोईघर और स्नानघर-शौचालय बने हुए थे. आँगन का द्वार कच्ची गली में खुलता था जिसका उपयोग महिलाएँ अक्सर कचरा डालने के लिए ही करती थीं. चूँकि सुबह मुँह-अँधेरे ही सफाई होकर कचरा वहाँ से उठ जाता था तो मीरा जल्दी उठकर सबसे पहले यही काम करती थी ताकि द्वार के सामने गंदगी रह न जाए.

उस कोलोनी के सभी घर लगभग इसी तरह बने हुए थे. पिछवाड़े का द्वार खोलते ही सामने वाले घरों की कतार का पिछवाड़ा नज़र आता था. उसके सामने वाले दो घरों के बीच की खाली ज़मीन पर कोई चारदीवारी नहीं थी बल्कि मालिकों ने अपना अपना हिस्सा कँटीले तारों की बाड़ से घेर रखा था. दाहिनी तरफ वाले घर की स्वामिनी यानी मीना की अम्मा और मीरा की अम्मा के बीच अच्छी दोस्ती थी. वे अक्सर पिछवाड़े से ही एक दूसरी के यहाँ आना जाना करती थीं. मीना, मीरा से कुछ वर्ष बड़ी थी और उसका विवाह हो चुका था, अतः मीरा का उससे अधिक परिचय नहीं था. कभी-कभी वो उनके घर अपनी माँ को बुलाने चली जाती थी तो औपचारिक बातचीत हो जाती थी.

वो युवक मीरा को उसी घर की तरफ वाले हिस्से की बाड़ के अन्दर खड़ा दिखा था. उसने सोचा कोई रिश्तेदार होगा, वो क्यों सर फोड़े...मगर उसका वो घूरना मीरा के मन को विचलित कर रहा था. दूसरे दिन भी जब यही हुआ तो मीरा असमंजस की स्थिति में पहुँच गई. एक महीना पहले ही तो पास के ही शहर में उसकी सगाई हुई है, कहीं वो बिना बात बदनाम न हो जाए, सोचकर उसने अपना कचरा डालने का समय ही बदल दिया. अब वो रात को ही सारे काम निपटाकर कचरा बाहर डाल देती थी. दो दिन ठीक से गुजरे, तीसरे दिन जब वो कचरा डालने लगी तो उसने गली के उस तरफ वाली नाली के रास्ते एक काले साँप को उसी घर में घुसते देखा. मीरा ने घबराकर उन्हें सावधान करने के लिए आगे बढ़कर उस घर का दरवाजा पीटना शुरू कर दिया.

जल्दी ही पिछवाड़े की बत्ती जली और द्वार खुला तो मीरा सामने उसी युवक को देखकर हतप्रभ रह गई और घबराहट में साँप भूलकर उलटे पाँव वापस जाने ही लगी थी कि उस युवक ने उसका रास्ता रोककर पूछा-

“तुम मीरा हो न?”

अपना नाम उस युवक के मुँह से सुनकर मीरा का कलेजा धड़कने लगा. घबराई आवाज़ में उसने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाते हुए प्रति प्रश्न किया-

“मगर मैं तो आपको नहीं जानती, आप कौन हैं, मुझे कैसे जानते हैं और मेरे नाम से आपको क्या लेना?” कहते हुए वो आगे बढ़ने लगी कि युवक ने उसका हाथ पकड़ लिया और चुप रहने का इशारा करते हुए अनुनय के स्वर में कहा-

“चिल्लाना मत मीरा प्लीज़!. मैं श्याम हूँ, तुम्हारा मंगेतर...यहाँ अपनी भाभी को लिवाने आया हूँ. उसी ने मुझे कल तुम्हारे इसी द्वार से बाहर निकलते समय तुम्हारी तरफ इशारा करके यह बात बताई थी. वैसे तो भाभी को लेने भाई साहब ही आते हैं मगर इस बार जानबूझकर मुझे भेजा ताकि मैं अपनी होने वाली दुल्हन को देख सकूँ.”

“हाय राम! आप यहाँ? मुझे जाने दीजिये...कोई देख लेगा.”

“इस अँधेरे में गली में कोई नहीं झाँकेगा...और घर में भी इत्तफाक से अभी कोई नहीं है.” कहते हुए उसने मीरा का हाथ चूम लिया.

“हाय राम! यह आप क्या कर रहे हैं...मुझे जाने दीजिये प्लीज़!”

“यह हाय राम! हाय राम! की रट क्यों लगा रखी है, मेरा नाम श्याम है, हाय श्याम! कहो तो छोड़ दूँगा.”

“हाय राम! मैं आपका नाम कैसे ले सकती हूँ...?”

“फिर वही राम!...मैं कहता हूँ न! जब तक श्याम नहीं कहोगी, जाने न दूँगा.”

“अच्छा श्याम, अब जाने दो, मुझे न देखकर अम्मा बाहर आ जाएगी.” मीरा का हाथ थर-थर काँपने लगा था.

“मीरा, परसों शाम तक मैं वापस चला जाऊँगा... यह तो इत्तफ़ाक ही है कि तुम यहाँ आ गई और मुझ खुशनसीब को यह अवसर मिल गया. कल सुबह तुम अपने उसी समय पर कचरा डालने के लिए बाहर निकलना, मैं तुम्हें वहीँ खड़ा मिलूँगा. तार की बाड़ के पास पत्थर में लिपटा हुआ कागज़ का पुर्जा होगा, तुम उठा लेना और पढ़कर जवाब लिखकर उसी तरीके से वहीँ रख देना. मेरी नज़र इसी तरफ ही लगी रहेगी.” मगर मैं यह पूछना तो भूल ही गया...तुम यहाँ किस प्रयोजन से आई थी...”

“वो... वो...इस तरफ साँप घुसा था...अरे! न जाने कहाँ चला गया होगा.”

“अच्छा वो... उसे तो मैंने ही तुम्हें बुलाने के लिए भेजा था...” कहकर हँसते हुए श्याम ने फिर से उसका हाथ चूम लिया.

मीरा का रोम-रोम पुलक और सिहरन से भर गया. वो हाथ छुड़ाकर तेज़ी से अपने घर में घुस गई.

रात भर वो अपने हाथ को बार बार सहलाती, चूमती और मन ही मन बुदबुदाती रही. “कितना सुदर्शन और सुन्दर है श्याम...मेरा श्याम, और

मैं उसकी मीरा... कितना सुखद अहसास...! काश! वे पल वहीँ ठहर जाते...” नींद तो अब श्याम ने चुरा ही ली थी...सुबह के इंतजार में करवटें बदलती रही.

मुँह-अँधेरे उठकर मीरा ने जल्दी-जल्दी कुछ कचरा इकठ्ठा किया, क्योंकि कल वाला तो वो रात में ही बाहर डाल चुकी थी. जैसे ही द्वार खोला, श्याम को वहीँ खड़े पाया. श्याम ने हवाई चुम्बन उछाला तो उसने शर्माकर पलकें झुका लीं. कनखियों से देखा, श्याम ने पत्थर में लिपटा हुआ कागज़ तार की बाड़ से बाहर सरका दिया और अन्दर चला गया.

मीरा ने इधर-उधर देखा और टहलते हुए वो पत्थर उठाकर वापस अन्दर आकर जल्दी से पत्थर से कागज़ अलग करके छिपा लिया.

अब बारी थी पत्र पढ़ने और उत्तर लिखने की...तो इसके लिए बाथरूम से सुरक्षित स्थान कौनसा हो सकता था भला...?

मीरा कोरा कागज़ और लेखनी हाथ में दबाकर इधर-उधर देखती हुई बाथरूम में बंद हो गई. जल्दी-जल्दी एक ही साँस में पूरा पत्र पढ़ लिया.

“प्यारी मीरा, बहुत बहुत प्यार

मैं जैसा तुम्हें बता चुका हूँ, परसों शाम तक यहाँ से चला जाऊँगा. मगर जाने से पहले एक बार पुनः तुम्हारा हाथ चूमना और जी भरकर सान्निध्य महसूस करना चाहता हूँ. फिर तो विवाह होने तक पत्रों से ही जी बहलाना पड़ेगा. यह गाँव तुम्हारा जाना पहचाना है और तुम बाहर के कार्यों के लिए भी घर से निकलती ही हो, तो कल दिन में कोई ऐसा स्थान तय करके बताना जहाँ हमें पहचाने जाने का कोई डर न हो.

बाकी बातें मिलकर ही होंगी.

सिर्फ तुम्हारा श्याम

यानी अपनी लैला का मजनू”

पत्र पढ़ते-पढ़ते मीरा के पूरे बदन में अजीब सी खुशनुमा खुमारी छाने लगी थी.

उसने उत्तर लिखना शुरू किया-

“मेरे श्याम, यह नहीं हो सकता...जिस गाँव/समाज के बुजुर्ग बच्चों की सगाई भी लड़के-लड़की की अनुपस्थिति में, बिना उनकी स्वीकृति लिए कर देते हों, उस समाज से इतने खुलेपन की उम्मीद तो की नहीं जा सकती और हमारा चोरी छिपे मिलना भी उचित नहीं. मन की मानकर मिलें तो भी तुम इस छोटे से शहर में नए हो तुम्हें तो कोई नहीं पहचान पाएगा मगर मैं कहीं भी आसानी से पहचान ली जाऊँगी. अतः अभी मिलने और प्यार जताने की उम्मीद छोड़ दो. सिर्फ छः महीने की तो बात है, तब तक इंतजार ही करना होगा. यह पत्र भी छिपकर लिख रही हूँ, ताकि किसी का उलाहना न सुनना पड़े.

और हाँ, तुम हमारे प्यार की तुलना लैला-मजनू अथवा अन्य किसी अन्य ऐतिहासिक प्रसिद्ध प्रेमी युगल से कभी मत करना...यह तो तुम जानते ही हो श्याम! कि जिन प्रेम-कहानियों को दुनिया प्यार का प्रतीक मानती चली आई है, उनमें से अधिकांश के नायक-नायिका प्रेम की परिणति यानी परिणय-सूत्र में बंधने से पहले ही जुदाई का ज़हर पीने को मजबूर कर दिए गए. विवाहोपरांत उनका जीवन कैसा होता, यह कोई नहीं बता सकता... लेकिन हमारी कहानी परिणय से शुरू होकर प्रेम की परिणिति तक पहुँचेगी और हमारी प्रेम-कहानी में जुदाई का कोई अध्याय नहीं होगा. यह मीरा अपने श्याम से जुदा होने के लिए नहीं बल्कि एक साथ जीने-मरने के लिए जन्मी है."

सिर्फ तुम्हारी मीरा

छः महीने बीतते देर कहाँ लगती है... मीरा ने श्याम को तो तसल्ली दे दी मगर उसके लिए ये छः महीने छः युगों से कम न थे जैसे-तैसे समय बंजारे ने उसे श्याम से मिलन के पलों तक पहुँचा ही दिया और मीरा श्याम की दिल-दुनिया आबाद करने दुल्हन बनकर ससुराल आ गई.

परिवार में श्याम और उसके अलावा जेठ-जिठानी और उनके दो बच्चे थे. सास-ससुर छः वर्ष पहले ही एक एक करके काल कवलित हो चुके थे. वे किराने के थोक व्यापारी थे. शहर में उनकी छोटी सी दुकान थी, मगर इतनी कमाई हो जाती थी कि गुजर-बसर आसानी से हो सके. जेठानी मीना उसकी पूर्व परिचित थी अतः मीरा को परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में कोई परेशानी नहीं हुई. मीना को वो मायके के रिश्ते से दीदी कहकर ही संबोधित करती थी.

मीरा यह तो जानती थी कि जोड़े ऊपर से ही बनकर आते हैं मगर मिलन का माध्यम तो धरतीवासी ही बनते हैं न... अतः वो जेठ-जिठानी का अपने ऊपर उपकार मानती थी कि उन्होंने बिना दहेज के श्याम के लिए उसे पसंद किया था. मीरा के माँ-पिता भी इतनी आसानी से जाने पहचाने माध्यम से बेटी के लिए बराबरी का वर-घर पाकर निश्चिन्त हो गए थे.

दुकान का लेनदेन और रुपयों का हिसाब जेठजी जयंत रखते थे तो घर खर्च की बागडोर जिठानी मीना के हाथ में थी. शीघ्र ही मीना बड़ी सफाई से मीरा के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाकर घर के सारे कार्य उसके माथे डालती गई.

वो बच्चों में व्यस्त रहने का दिखावा करती और दिन भर मीरा को

आदेश देती रहती. मीरा भी नासमझ तो थी नहीं, कुछ समय प्यार की मार सहती रही मगर जब वो गर्भवती हुई तो उसे कुछ आराम करने की आवश्यकता महसूस होने लगी. उन दिनों मध्यम वर्गीय घरों में घर के सारे काम महिलाओं को ही करने होते थे, कामवालियाँ रखने का न तो रिवाज था न ही हैसियत, अतः एक दिन उसने मीना से कहा कि दीदी मुझसे अब घर के सारे कार्य नहीं होते...आप कुछ सहायता कर दिया करें तो... मेरा शरीर अब कुछ आराम भी चाहता है.

मीरा का इस तरह सामने बोलने से मीना को अपना अपमान महसूस हुआ. तुरंत बोली-

“मीरा मैं भी लम्बे समय से इस घर को सँभाल रही हूँ, अब मुझे आराम करने का पूरा अधिकार है. मैंने तुम्हें मेहनती और समझदार मानकर ही अपनी देवरानी बनाया...क्या मैंने दो बच्चों को जन्म नहीं दिया? घर के कार्य तो तुम्हें करने ही पड़ेंगे.”

मीरा समझ गई कि मीना को देवरानी के रूप में नौकरानी चाहिए थी इसी कारण उसने उसे पसंद किया था...मगर वो भी अपना अधिकार हासिल करना बखूबी जानती थी, इस तरह शोषण कब तक सहती? रात में श्याम से इस बात का जिक्र किया तो श्याम भी चिंतित हो उठा पर घरेलू मामले में सीधे हस्तक्षेप तो कर नहीं सकता था तो मीरा से कह दिया कि उससे जितना बने करके बाकी छोड़ दिया करे. और मीरा ने दूसरे दिन ही बगावत का बिगुल बजा दिया. रसोई के काम आधे अधूरे छोड़कर आराम करने अपने कमरे में चली गई.

मीना को भला यह बात कैसे हज़म होती? बात जयंत के कानों तक पहुँची तो उसने श्याम को बुलाकर ऊँची आवाज़ में कहा-

“देखो श्याम, मीरा का इस तरह का व्यवहार एकदम अनुचित है. उसे यहाँ रहना है तो घर के कार्य करने ही पड़ेंगे. आखिर मीना ने भी बरसों इस घर को सँभाला है, तुम्हारी परवरिश की है...अब उसका आराम करने का पूरा अधिकार है.”

श्याम को भाई की दो टूक बात नहीं सुहाई, मगर वो मजबूर था. अगर गुस्से में अलग होने की बात कहेगा तो भाई साहब उसे खाली हाथ बाहर कर देंगे क्योंकि पिताजी की वसीयत के अनुसार उनके बाद उनकी संपत्ति यानी दुकान और मकान में दोनों भाई बराबरी के साझेदार हैं मगर यदि कोई भाई अलग होना चाहे तो उसे संपत्ति से वंचित होकर खाली हाथ घर छोड़ना पड़ेगा. वे चाहते थे कि दोनों भाई एक दूसरे का सुख दुःख बाँटते हुए आजीवन जुड़े रहें.

श्याम अब जान गया था कि उनकी स्थिति घर में नौकरों जैसी हो चुकी है. आज वो पछता रहा था कि भाई के कहने में आकर उसने अपनी पढ़ाई अधूरी क्यों छोड़ दी...वो स्वयं तो सारे कष्ट झेल लेता मगर मीरा पर अत्याचार होते वो नहीं देख सकता था, आखिर बहुत सोच-विचारकर उसने मीरा को प्रसव होने तक मायके भेजने का मन बनाया और भाई से इसके लिए अनुमति माँगी.

जयंत ने एक कुटिल मुस्कराहट के साथ अपनी स्वीकृति दे दी और श्याम ने मीरा को भारी मन से प्रतिदिन पत्र लिखने और सप्ताहांत में मिलने आते रहने के वादे के साथ उसे मायके भेज दिया.

और यहीं से उनके दर्द की दास्तान शुरू हो गई. मीरा प्रतिदिन नया सवेरा होते ही श्याम को पत्र लिखती और स्वयं डाकखाने जाकर लेटर-बाक्स में डालकर आती और श्याम का उत्तर मिलने का इंतजार करती मगर एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी उसका कोई पत्र न पाकर उसका मन विचलित होने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि श्याम उसे इस तरह क्यों तड़पा रहा है...फिर सोचा, सप्ताहांत में मिलने आएगा तो जी भरकर शिकायत करेगी मगर दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी न श्याम आया न ही उसका पत्र...अब मीरा करे तो क्या करे...तरह-तरह की आशंकाओं से उसका मन बिंधने लगा.

उसकी माँ उसे होने वाले बच्चे का वास्ता देकर उसे खुश रहने की नसीहत देती मगर मीरा की दशा बावलों जैसी हो गई थी उसे तन-बदन और खाने पीने की कोई सुध न रहती. उसे लगता कि नियति ने उन्हें भी बिछुड़ने के लिए ही मिलाया था... क्या परिणय के बाद भी उनका प्रेम खंडित हो जाएगा? यह सोचकर उसके मन में निराशा घर करने लगती और जीवन से मुक्त होने के विचार आते पर अपने पेट में अपने प्यार की निशानी पलती देखकर उन विचारों को झटक देती.

इधर श्याम की दशा भी उससे अलग न थी. वो भी मीरा के पत्र न पाकर दीवानों जैसी स्थिति में पहुँच चुका था. उन दिनों टेलीफोन देश में तो आ चुका था मगर बहुत रईस लोगों के घरों में ही होता था. श्याम आखिर मीरा का हालचाल कैसे जाने... एक बार जयंत से ससुराल जाने की बात की तो उसने बिफरकर कहा-

“कान खोलकर सुन लो श्याम, अगर इस घर में रहना है तो तुम्हें दूसरा विवाह करना पड़ेगा... तुम्हारी भाभी तुम्हारी सेवा नहीं कर सकती और उस विद्रोही लड़की मीरा को मैं इस घर में नहीं देखना चाहता. मैंने अपने एक मित्र दुर्गादास की लड़की रजनी से तुम्हारा रिश्ता तय कर दिया है, वे आर्थिक रूप से हमारी हैसियत के ही हैं और रजनी सुन्दर होने के साथ ही विनम्र और मेहनती भी है. तुम्हारे पास सोचने के लिए दो महीने हैं.

सुनकर श्याम को तो जैसे काठ मार गया. भाई साहब इस हद तक गिर सकते हैं इसपर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. अब उसे आगे कदम बढ़ाने के लिए कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था. उसके लिए मीरा से दूर रहना असंभव था. दूसरे विवाह का तो सवाल ही नहीं उठता था...घर छोड़कर खाली हाथ कहाँ जाएगा...उसे अपने स्वर्गवासी पिता पर भी बहुत क्रोध आया कि ऐसी वसीयत लिखते समय उन्हें यह विचार क्यों नहीं आया कि भाई साहब उसे धोखा भी दे सकते हैं.

ऐसे में उसे स्कूल के दिनों के एकमात्र हमदर्द मित्र अर्जुन की याद आ गई. उनके विचार आपस में बहुत मिलते थे. अर्जुन कक्षाओं में अपनी तिकड़म बाजी से वो छात्रों की हर समस्या का समाधान पलों में खोज लाता था. श्याम की उसने बहुत सहायता की थी. कभी कभी पढ़ाई के सिलसिले में दोनों का एक दूसरे के घर जाना भी हो जाता था मगर पिताजी के अक्सर बीमार रहने के कारण बाद जयंत ने ८ वीं पास करने के बाद श्याम की पढ़ाई छुड़वाकर सहयोग के लिए दुकान में लगा दिया था.

वो अर्जुन से भी गैर जाति का होने के कारण खार खाता था. श्याम से उसकी मित्रता उसे शुरू से ही पसंद नहीं थी अतः पढ़ाई छूटते ही उसकी अर्जुन से हमेशा के लिए दूरी बन गई थी.

श्याम ने एक बार फिर अपनी समस्या के समाधान के लिए अर्जुन से चुपचाप मिलने का मन बनाया और दुकान की छुट्टी के दिन उसके घर जाकर सारी कहानी सुनाकर अपनी समस्या उसके सामने रखी तो अर्जुन की बाँछें खिल गईं. वो चहककर बोल उठा-

“श्याम, तुम जिस लड़की की बात कर रहे हो वो मेरी प्रेमिका है. हम दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. उसके घरवालों को जब हमारे प्रेम के बारे में पता चला तो उन्होंने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी. उनको मेरी जाति पर ऐतराज़ था. उसके बाद हम मिल नहीं पाए न ही उसका कोई समाचार मिला. उसके घरवाले शायद इसी वजह से तुम्हारे बारे में सब जानते हुए भी उसका विवाह करने को तैयार होंगे. मैं स्वयं उसके लिए परेशान हूँ...हम दोनों की समस्या एक ही है दोस्त! अब जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो.

रजनी से विवाह तुम्हें दिखावे के लिए करना होगा. बस किसी तरह एक बार उससे मिलकर सारी बातें बताकर इसके लिए तैयार करना. मैं अभी उससे न तो मिल सकता हूँ, न ही उसके घर जा सकता हूँ मगर विवाह के बाद तुम्हारे घर पर तीनों मिलकर आगे की योजना बनाएँगे. मेरे वहाँ छिपकर आने की युक्ति तुम्हें सोचनी होगी ताकि किसी को हमारी योजना की भनक भी न लगे.”

श्याम ने सोचा भी न था कि उसकी समस्या इतनी आसानी से सुलझ जाएगी. मगर उसके मन में यह शंका भी थी कि क्या ऐसा करना शास्त्र सम्मत होगा? अर्जुन से कहने पर उसने कहा- मैं जानता हूँ मित्र, मगर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई... "यह तो तुम जानते हो न कि सात फेरों के सिवा (जो सात वचनों के साथ संपन्न होते हैं) विवाह पूर्ण नहीं माना जाता..."

"हाँ ...तो..."

"बस वही...कि जब तुम साम, दाम और भेद नीति में सफल नहीं हुए तो अब तुम्हें दंड नीति अपनानी होगी...यानी तुम्हें विवाह का केवल अभिनय करना है. ठीक फेरों के समय रजनी बेहोश होने का नाटक करेगी और तुम्हारे भाई और रजनी के पिता किसी भी तरह विवाह रोकने न देंगे और उसी हालात में एकतरफा मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न हो जाएगा, जो शास्त्रों के अनुसार अधूरा ही माना जाएगा."

"यह बात तो तुमने सोलह आने सत्य कही अर्जुन...मैं आज ही रजनी से मिलने के लिए भाई साहब से बात करूँगा."

उसी दिन श्याम ने जयंत से एक बार रजनी से मिलने की अनुमति माँगी. वो अपनी बात बनती देख इसके लिए सहर्ष तैयार हो गया और दुर्गादास से कहकर एक मंदिर में उनके मिलने की व्यवस्था करवा दी. श्याम ने रजनी को संक्षेप में सारी बातें समझाकर कहा-

“हम विवाह के बाद सबके सामने पति-पत्नी होने का अभिनय करेंगे और कमरे में भाई-बहन की तरह रहकर परिस्थितियों के अनुकूल होने का इंतजार करेंगे.”

रजनी तो अर्जुन के अलावा कहीं भी विवाह होने पर जान देने की योजना मन ही मन बना चुकी थी, अब अचानक खुशियों का खज़ाना अपनी झोली में गिरते देख, ख़ुशी से खिल उठी. वो अपना प्यार पाने के लिए यह अभिनय करने के लिए सहर्ष तैयार हो गई.

दो माह में ही उनका अपूर्ण विवाह उनकी सोची हुई युक्ति से संपन्न हो गया, जो उनके पवित्र उद्देश्य की पूर्णता की साक्षी थी. श्याम का मकान दो मंजिला था. नीचे बैठक और रसोईघर था तथा बीचों-बीच ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं जो दोनों भाइयों के कमरों को विभाजित करती थीं. उसके कमरे की बालकनी से पिछवाड़े की गली दिखाई देती थी, जो अक्सर सुनसान ही रहती थी. विवाह होने के दो दिन बाद ही अर्जुन ने दुकान पर श्याम से मिलकर उसके घर आने के बारे में बात की. श्याम ने कहा कि वो देर रात को पिछवाड़े की गली से उसके घर तक आए. वो बालकनी से रस्सी बाँधकर लटका देगा और वो चढ़कर ऊपर पहुँच जाएगा. किसी को कानोंकान खबर भी न होगी. और उसी रात श्याम के कमरे में दो बिछड़े प्रेमी आमने-सामने खड़े मौन भाषा में अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रहे थे.

सारी रात आगे की योजना पर विचार-विमर्श होता रहा. जब श्याम ने बताया कि इतवार को दुकान बंद होने के कारण सभी देर तक सोते रहते हैं तो तय हुआ कि हर शनिवार की रात गाँव जाने वाली आखिरी बस से वो इसी रास्ते से मीरा के पास जाकर सुबह पहली बस से वापस आया करेगा तब तक अर्जुन अपनी मर्यादा का पालन करते हुए रजनी के पास रहेगा. वो स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुका था और अब अच्छी सी नौकरी के लिए आवेदन और प्रशिक्षण में लगभग एक वर्ष का समय लग सकता था तब तक यही क्रम जारी रहेगा. उसकी नौकरी लगते ही वो रजनी से कोर्ट मैरिज कर लेगा और किसी भी तरीके से रुपयों का इंतजाम करके श्याम के लिए उसके ससुराल के गाँव में ही दुकान खुलवा देगा ताकि वो भाई से अलग रहकर अपना पुश्तैनी कार्य शुरू कर सके.

पैसों की बात सुनते ही रजनी बोल पड़ी-

“मेरे पास जो जेवर हैं ये सभी मैं श्याम भैया के नाम करती हूँ.”

श्याम के विरोध करने पर उसने कहा-

“विधाता ने शायद सोच-समझकर ही हमको एक दूसरे से मिलाया है भैया... कर्ता तो वही एक है मगर जब मिलन-यज्ञ हमारे द्वारा भौतिक साधनों और सहयोग के आदान प्रदान से संभव है तो मैं भी इसमें आहुति अवश्य दूँगी. कुदरत ने मेरा सबसे कीमती जेवर मुझे वापस किया है तो उसके आगे ये सब तुच्छ हैं. अगर हममें से एक ने भी अपने साथी से जुदा होकर अपनी जान दी होती तो बाकी तीन जीवन भी मटियामेट हो जाते.”

“मगर बहन, कोर्ट मैरिज से पहले तुम्हें मेरे साथ गाँव चलना पड़ेगा जहाँ से मैं विधिवत तुम्हारा कन्यादान करके अर्जुन के साथ विदा करूँगा...” श्याम ने भावुक होते हुए कहा.

तीनों की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे.

ooo ooo ooo

उस दिन रात को १२ बजे जब सब गहरी नींद सोए थे, मीरा के घर के मुख्य द्वार पर दस्तक हुई. आगे के कमरे में मीरा ही सोती थी, वो घबराकर सोचने लगी, इस समय कौन आ सकता है...सब गहरी नींद सोए थे तो उसने किसी को नहीं उठाया और डरते-डरते द्वार की दरार से झाँका तो अस्पष्ट सा एक साया दिखाई दिया. उसने पूछा-

“कौन है बाहर?”

“मैं श्याम हूँ मीरा, द्वार खोलो. मीरा की आवाज़ पहचानकर श्याम ने कहा.”

श्याम तो मीरा की नस-नस में समाए हुए थे, उसने श्याम की आवाज़ पहचानकर तुरंत द्वार खोल दिया और हर्ष मिश्रित आश्चर्य से उसे देखती रह गई.

श्याम ने उसे गले लगाकर प्यार किया और घरवालों को इस समय न उठाने के लिए कहा. फिर अपनी सारी कहानी विस्तार से उसे कह सुनाई. उन्हें एक-दूसरे के पत्र न मिलने का कारण भी समझ में आ गया कि जयंत की डाकिये से मिली भगत होगी. मीरा तो खुशी में दीवानी हुई जा रही थी, ३ – ४ घंटे किस तरह गुज़र गए पता ही न चला. श्याम ने हर सप्ताह इसी तरह आते रहने का वादा करके विदा ली और वापस चला गया.

घर में श्याम के आने की किसी को भनक भी न लगी पर सुबह होते ही मीरा ने ख़ुशी से झूमते हुए माँ को सारी बात बता दी. माँ ने उसे गले लगाकर कहा-

बेटी, मेरा मन कहता था कि श्याम ज़रूर आएगा. प्यार अगर सच्चा है तो कुदरत भी उन जोड़ों के लिए सदय हो जाती है.

समय गुजरता रहा. निश्चित तिथि पर मीरा ने सुन्दर सी बच्ची को जन्म दिया, मीरा के चेहरे पर इस समय श्याम की अनुपस्थिति से उदासी छाई हुई थी. उसने तय किया कि बिटिया का नामकरण श्याम की उपस्थिति में ही होगा. सप्ताहांत में श्याम के आने पर आधी रात को बेटी को उन्होंने अपने नामों के प्रथम अक्षर को मिलाकर ‘मीशा’ नाम दिया.

उधर रजनी ने अपनी जी तोड़ मेहनत से मीना का दिल जीत लिया था और अपना प्रेम पाने के लिए कर्मरत योगी की तरह अपनी भूमिका निभा रही थी. एक वर्ष का समय उन चारों के सब्र का इम्तिहान लेते हुए गुजर गया.

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उस दिन रविवार को जब जयंत और मीना सोकर उठे तो नियमानुसार रजनी को रसोई में न देखकर मीना को आश्चर्य हुआ. चूल्हा अभी तक न जला था, न ही बच्चों के दूध-नाश्ते की कोई तैयारी हुई थी.

उसने भुनभुनाते हुए रजनी के कमरे तक जाकर बाहर से ही आवाज़ लगाई तो कोई जवाब न पाकर गुस्से मे दरवाजा ठोका तो वो खुल गया और मीना गिरते-गिरते बची. मगर कमरा खाली देखकर वो हैरान रह गई और घबराकर जोर से जयंत को आवाजें देने लगी. जयंत तुरंत वहाँ पहुँचा तो वो भी विस्मित रह गया. अन्दर जाकर खिड़की का पर्दा हटाया तो उसे बालकनी से बंधी गाँठें लगी हुई रस्सी लटकती दिखाई दी. अभी वो इस पहेली का हल खोज ही रहा था कि मीना ने बिस्तर पर तकिये के नीचे से एक पत्र निकालकर उसके हाथ में दे दिया.

लिखा था-

आदरणीय भाई साहब, मैं रजनी बहन के साथ इस घर को छोड़कर हमेशा के लिए अपनी मीरा के पास जा रहा हूँ. तुम इसे मेरा पलायन न समझना...मैं चाहता तो किसी भी तरीके से अपना अधिकार ले सकता था, मगर मैं अपने स्वर्गवासी सम्मानित माँ-पिता द्वारा की गई वसीयत को चुनौती नहीं दे सकता और नहीं चाहता की रजनी बहन को उसके प्यार तक पहुँचाने में कोई व्यवधान उपस्थित करे ...आपने एक परिणीता को पति से जुदा करने का जो अपराध किया है उसका दंड कुदरत आपको अवश्य देगी.

-आपका नालायक भाई श्याम

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-कल्पना रामानी, नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗